वुलर झील में एक छोटा सा स्कूल और कश्मीर के सवालों का ‘नोटबुक’

पु्ष्यमित्र

चिनार के पत्ते जब नोटबुक में पड़े मिलते हैं तो मीठी यादें जगाते हैं, अगर उनका सूखा ढेर बिखरा हो तो वे सुलग भी उठते हैं और सबकुछ तबाह कर देते हैं। यही तो कहानी है आज के कश्मीर की। धरती का स्वर्ग माने जाने वाले कश्मीर में इन दिनों शोलों के भड़कने का मौसम है। मगर कल रिलीज हुई फ़िल्म ‘नोटबुक’ शबनम की तरह ठंडे हाथों से जख्मों को सहलाती हुई हमारे मन में मीठा प्रेम जगाती है।

गुलज़ार की माचिस से लेकर, फ़िज़ा से होते हुए हैदर तक कश्मीर के वाजिब सवालों को लेकर कई सेंसिबल फिल्में बनी हैं। मगर मैं आज जिस नोटबुक फ़िल्म को देखकर लौटा हूँ, मुमकिन है मेरा क्षणिक आवेग हो, मगर यह जख्मों पर मरहम रखने वाली शायद अकेली फिल्म है।

यह सच है कि यह फ़िल्म तल्ख सवालों को बेबाक तरीके से सामने नहीं रखती, बल्कि एक सरल और मधुर सा समाधान पेश करती है। मगर उस समाधान में और इस फ़िल्म की छोटी सी कहानी में छिपे छोटे-छोटे अनुभवों में कहीं न कहीं गांधी नजर आते हैं। यही तो भारत है।

दिलचस्प है कि यह फ़िल्म पहली नजर में एक सरल सी प्रेम कथा लगती है। मुमकिन है एक आम दर्शक इस अनूठी प्रेम कथा के मेलोडी के साथ ही वापस लौट आये। मगर इस फ़िल्म में टुकड़े-टुकड़े में  कश्मीर, वहां के सवाल, कश्मीरी पंडितों का पलायन, आतंकवाद का खौल वगैरह दिखता है। और अंत में जब स्कूल के बच्चे एक पिस्तौल को बुरा सामान समझ कर वुलर झील में गिरा देते हैं, जैसे किसी बदबूदार कचरे को फेंक रहे हों, तो फिल्मकार एक झटके में अपनी बात कह जाता है।

वैसे तो इस फ़िल्म की कहानी 2014 में बेस्ट स्क्रीनप्ले का एकेडमी अवार्ड पाने वाली थाईलैंड की फ़िल्म ‘टीचर्स डायरी’ पर आधारित या कहें, प्रेरित है। मगर यह उस फिल्म का रीमेक नहीं है। निर्देशक ने मूल कथा को कश्मीर के वुलर झील में स्थित एक स्कूल में फिट किया है। जहां एक युवक आर्मी की नौकरी छोड़कर कश्मीरी बच्चों को पढ़ाने जाता है। वीराने में स्थित उस स्कूल में उसे उससे पहले वहां काम करने वाली एक शिक्षिका की नोटबुक मिलती है। वह उसे पढ़ता है। नोटबुक उसे न सिर्फ उस स्कूल और वहां पढ़ने वाले बच्चों से भावनात्मक रूप से जुड़ने में मदद करती है, बल्कि कई मुश्किलों से उबारती भी है। वह मन ही मन उस नोटबुक वाली शिक्षिका से प्रेम करने लगता है। और उस नोटबुक में अपने अनुभव भी जोड़ता है। जब वह शिक्षक वहां से जाता है और शिक्षिका फिर लौट आती है, तो वह भी उसी तरह उस शिक्षक के प्रेम में पड़ जाती है और अंत में दोनों का मिलन होता है।

मगर जैसा कि पहले कह चुका हूँ, यह कहानी महज इतनी सी नहीं है। इसके बीच में कश्मीर है। शिक्षक कश्मीरी पंडित है, शिक्षिका मुसलमान। बच्चे हैं, इनमें एक का पिता चाहता है कि उसका बेटा पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई लड़े। बेहतरीन संवाद है और खूबसूरत सिनेमेटोग्राफी है, जो इस फ़िल्म को एक विलक्षण अनुभव में बदल देते हैं।

पटकथा में कुछ कमियां जरूर हैं, जैसे दोनों नायक नायिका का मिलते-जुलते तरीके से ब्रेकअप होता दिखाया गया है। शिक्षिका के वापस आने पर शिक्षक क्यों गायब है, यह बहुत कॉन्विनसिंग नहीं लगता। मगर शुरुआत से ही फ़िल्म में इतनी मधुरता है कि ये कमियां दब जाती हैं।

फ़िल्म में नायक ज़हीर और नायिका प्रनूतन(नूतन की पोती) ने अच्छी अदाकारी की है। दिलचस्प है कि इस फ़िल्म को सलमान खान ने प्रोड्यूस किया है। फ़िल्म बजरंगी भाईजान जैसी भव्य तो नहीं है, न ही उतनी लाउड। मगर धीरे से बात वही कहती है, जो बजरंगी भाईजान का मैसेज है। प्रेम ही समाधान है। पता नहीं आज के जमाने के युवा इस ओल्ड फैशन लव स्टोरी को कितना पसंद करेंगे। मगर निर्देशक नितिन कक्कड़ ने जिस खूबी से इस फ़िल्म में कश्मीर के सवालों को गूंथा है और सिनेमेटोग्राफर मनोज कुमार खतोई ने कश्मीर के जो रंग दिखाए हैं, वह तो सचमुच अलौकिक अनुभव है।

 

 

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