चौबीस साल साल से बिहार की नदियों पर कोई अध्ययन नहीं हुआ है नीतीश जी

नीतीश कुमार जी की मासूमियत का कोई जवाब नहीं. कल वे एनआईटी में छात्रों से बोल आये कि आपको बिहार की नदियों पर अध्ययन करना चाहिए. मगर उनकी सरकार का जल संसाधन विभाग नदियों पर क्यों अध्ययन नहीं करता, इस बारे में वे कुछ नहीं बोले. हकीकत यह है कि 1994 के बाद बिहार की नदियों पर कोई अध्ययन नहीं हुआ है. जबकि कायदे से हर दस साल में जलसंसाधन विभाग को इरिगेशन कमीशन का गठन कर इन नदियों का अध्ययन कराना चाहिए था. नीतीश कुमार ने कल ठीक कहा कि हम पुराने आंकड़ों से बाढ़ के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं. मगर क्या इसमें उनकी सरकार का दोष नहीं है. वे क्यों नया इरिगेशन कमीशन गठित नहीं करते. पढिये

पुष्यमित्र

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जरूर मानते हैं कि नदियों का छिछलापन और इसके बेड में गाद का जमा होना आज की तारीख में बाढ़ की सबसे बड़ी वजह है. मगर राज्य की नदियों के जल में गाद की मात्रा को लेकर 1994 के बाद कोई अध्ययन नहीं हुआ है. राज्य का जल संसाधन विभाग भी बाढ़ से सुरक्षा के मामले में सिर्फ तटबंधों के सुदृढ़ीकरण का ही काम करता है. नदियों के गाद कम करने को लेकर विभाग के पास न कोई योजना है, न कार्यप्रणाली. विभाग में कभी इन कामों के लिए एडवांस प्लानिंग डिपार्टमेंट हुआ करता था, उसे भी 25 साल पहले बंद कर दिया गया है. यह उस राज्य की हालत है, जहां हर साल बाढ़ से अनुमानतः 30 अरब का नुकसान होता है और दसियों लाख लोग प्रभावित होते हैं.

अगर आप बिहार की नदियों में गाद की मात्रा पर जानकारी हासिल करना चाहें तो पता चलेगा कि सेकेंड बिहार इरिगेशन कमीशन, 1994 के बाद इस विषय़ पर कोई जमीनी अध्ययन नहीं हुआ है. जबकि इन चौबीस सालों में बिहार की नदियों का सर्वाधिक नुकसान हुआ है, गाद भरने की वजह से हालात बद से बदतर हुई है. मगर राज्य का जल संसाधन विभाग यह बता पाने में पूरी तरह अक्षम है कि मौजूदा वक्त में बिहार की नदियों में गाद की मात्रा कितनी है. यह भी विडंबनापूर्ण तथ्य है कि हर साल बाढ़ की तबाही झेलने वाले इस राज्य में अब तक बाढ़ के प्रभाव और इसकी वजहों पर एक ही सरकारी अध्ययन हुआ है. पहले बिहार इरिगेशन कमीशन में बाढ़ पर अध्ययन नहीं हुआ था. जबकि कायदे से ऐसे राज्य में हर दस साल पर इरिगेशन कमीशन का गठन कर अध्ययन होना चाहिये था.

राज्य का जल संसाधन विभाग जिसका काम राज्य की तमाम नदियों की सेहत का ख्याल रखना था का सारा जोर तटबंधों की सुरक्षा और नहरों के जरिये सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने तक रहता है. जबकि विशेषज्ञों ने काफी पहले मान लिया है कि तटबंधों की मदद से बाढ़ से सुरक्षा नहीं हो सकती. नदी विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं, आप चाहे लोहे के तटबंध बना लें, मगर नदियों को रोक नहीं सकते. संयोगवश आज की तारीख में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस राय से सहमत हैं और मानते हैं कि नदियों का छिछला होना और उसके बेड में गाद का भर जाना ही बाढ़ की सबसे बड़ी वजह है. मगर विभाग इस दिशा में अभी सोचने के लिए भी तैयार नहीं है.

विभाग में ज्यादातर टेंडर वर्क होते हैं, शोधपरक कार्यों और भविष्य की योजनाओं के लिए कोई काम नहीं होता. काफी पहले विभाग में एक एडवांस प्लानिंग डिपार्टमेंट हुआ करता था, मगर 90 के दशक में उसे भी बंद करा दिया गया. अब सारा काम इंप्लीमेंटेशन का है. शोध और नयी सोच को लागू करने के लिए कोई गुंजाइश नहीं है. जाहिर सी बात है, ऐसे में सारा काम पुराने तरीके और पुराने ख्यालों से चल रहा है.

सेकेंड बिहार इरिगेशन कमीशन, 1994

इस कमीशन की रिपोर्ट में नदियों के डिस्चार्ज, सिल्टेशन, बाढ़ प्रभावित इलाके, बाढ़ की वजहें और सिंचाई परियोजनाओं की स्थिति पर विशद अध्ययन किया गया है. तीन हजार पन्नों की इस रिपोर्ट का प्रकाशन छह वोल्यूम में किया गया. पहले कमीशन की रिपोर्ट 1971 में की गयी थी. उसमें बाढ़ के मसले पर अध्ययन नहीं किया गया था. विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार जैसे बाढ़ प्रभावित राज्यों में हर दस साल पर ऐसे अध्ययन होने चाहिये. ताकि बाढ़ से मुकाबले में मदद मिल सके.
बिहार की नदियों में सिल्टेशन के बारे में क्या कहती है सेकेंड बिहार इरिगेशन कमीशन की रिपोर्ट
1. गंगा को छोड़ कर बिहार से गुजरने वाली तमाम नदियां मिल कर हर साल 1,24,000 एकड़ प्रति फीट की दर से सिल्ट जमा करती है.
2. गंगा नदी में मौजूद सिल्ट का 40 फीसदी हिस्सा बिहार की दूसरी नदियों से उसे हासिल होता है.
3. गंगा बरसात के दिनों में 55 फीसदी पानी और फरवरी से मई के बीच 70 फीसदी पानी बिहार की नदियों से हासिल करती है.

 

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