नीलहे गये-मिलहे आये #चंपारण-गांधी के बाद -3

 

हालांकि यह क्षणिक मामला था. सिर्फ बदला लेने के लिये नील प्लांटर सालों तक खेती नहीं कर सकते थे. तमाम कोशिशों के बावजूद नील प्लांटरों के घाटे की भरपाई नहीं हो सकी. 1920 के बाद धीरे-धीरे नील प्लांटरों ने अपनी कोठियों को बेचकर यहां से जाना शुरू कर दिया. चंपारण के किसानों की असली परेशानी इसके बाद शुरू हुई. इसका जिक्र 1950 की लोहिया आयोग रिपोर्ट में मिलता है.

लोहिया आयोग रिपोर्ट एक स्वतंत्र जांच रिपोर्ट है, जिसे प्रख्यात समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया की अध्यक्षता में 1950 में तैयार किया गया था और इस जांच टीम में खुर्शीद एडी नैरोजी और रामनंदन मिश्र सदस्य थे. इस रिपोर्ट की टैग लाइन थी, ब्रिटिश और कांग्रेसी हुकूमत में चंपारण के किसानों की कंगाली, एक केस स्टडी. जैसा कि टैग लाइन से जाहिर है, यह रिपोर्ट चंपारण के किसानों की कंगाली पर बात करती है. और इस कंगाली के लिए सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत को जिम्मेदार नहीं मानती, बल्कि कांग्रेसी सरकार को भी दोषी बताती है.

यहां कांग्रेसी सरकार से आशय सिर्फ आजादी के बाद की कांग्रेसी सरकार नहीं है, बल्कि आजादी के पहले की प्रांतीय सरकार को भी संदेह के घेरे में रखा गया है. यह आरोप बहुत ही बेचैन कर देने वाला है. क्योंकि भले 1917 के चंपारण सत्याग्रह में गांधी ने कांग्रेस के नाम का जिक्र नहीं किया था. मगर उस वक्त जो लोग इस आंदोलन में प्रभावी भूमिका में थे वे या तो पहले से कांग्रेस के सदस्य थे या बाद के दिनों में कांग्रेस के सदस्य बने. इनमें ब्रजकिशोर प्रसाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना मजहरूल हक जैसे नाम प्रमुख हैं. इस लिहाज से अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो उसके मन में चंपारण के किसानों के प्रति सहानुभूति का भाव होना चाहिये था. तो क्या कांग्रेसी सरकारों ने सत्ता हासिल करने के बाद इन रैयतों के पक्ष में सकारात्मक फैसले नहीं लिये, इनकी कंगाली को और बढ़ावा दिया.

इस रिपोर्ट के तीसरे अध्याय का नाम है ‘नई बेड़ियां’. इस अध्याय की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है.

“निलहा गये, मिलहा आये
रैयतों से छिनी ढाई लाख एकड़ जमीन
सरकारी ऋण चुकाने में जमीन गयी
चीनी मिल मालिक 40 हजार एकड़ पर काबिज
चीनी मिलों ने 10 हजार परिवारों को भूमिहीन किया
1930 की महामंदी का करारा आघात-धान की कीमत 45 प्रतिशत गिरी”

चंपारण के किसान कैसे नयी बेड़ियों में जकड़ गये यह समझने के लिए इस पूरे अध्याय को पढ़ना चाहिये-

“गांधी जी के प्रयासों से व्यापक जनजागरण पैदा हुआ. सूखी हड्डियों में भी जान आ गयी. सिर्फ चंपारण में ही नहीं पूरे भारत में आशा और उत्साह की नई लहर उठी. फिर भी, गांधीजी ने खुद महसूस किया कि, ‘अगर वे रैयतों के लिए कुछ राहत हासिल करने में सफल हो भी जायें, तो भी वे इसका पूरा लाभ नहीं ले पायेंगे और वे नये बंधनों में जकड़ जायेंगे’ गांधी जी की यह चिंता बिल्कुल जायज थी. परवर्ती इतिहास नये बंधनों की उत्पत्ति का इतिहास है.

नीलहे उत्पादकों के जाते-जाते चीनी मिल मालिक आ गये. ‘निलहा गये-मिलहा आये’ यह चंपारण के गांवों में प्रचलित लोकोक्ति बन गयी. एक के बाद दूसरा, 1920 के दशक के अंत तक जिले के विभिन्न केंद्रों में नौ चीनी मिलों ने काम करना शुरू कर दिया और उनके पास कुल मिलाकर 40 हजार एकड़ का फार्म हो गया. फैक्टरी मालिकों के हाथ में जमीन का ऐसा संकेंद्रण आश्चर्यजनक है. चीनी मिल के नजदीक किसी किसान का सामान्य आचरण तो यह होगा कि वह हर कीमत पर जमीन बचाये रखेगा, क्योंकि उसे अपनी फसल की अधिक कीमत मिलेगी. बिहार के दूसरे जिलों में, जहां चंपारण के इन मिल मालिकों की फैक्टरियां हैं, वे फार्म नहीं बना पाये हैं. चंपारण में वे ऐसा कर सके और क्या उन्होंने जमीन अधिग्रहीत करने के लिए लुभावनी कीमतें अदा कीं- ये प्रश्न तुरंत हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं.

इन प्रश्नों का उत्तर आयोग के समक्ष 10 हजार लोगों ने जो बयान दिये, उसमें निहित है. उनकी बातों से कड़ियां जुड़ती हैं कि इतिहास और प्रकृति की शक्तियों से मिलकर देश की आम आर्थिक स्थिति में कैसे इन चीनी मिलों ने 30 रुपये से लेकर 200 रुपये प्रति एकड़ के बीच की कीमत में जमीन हासिल कर ली, जिसका औसत मूल्य अभी 1000 रुपये प्रति एकड़ से कम नहीं है. चीनी मिलों को चालीस हजार एकड़ जमीन पर अपना अधिकार जमाने के लिए बीस लाख रुपये से अधिक नहीं देने पड़े. इस संपत्ति की कीमत अभी चार करोड़ से कम नहीं होगी(1950). हम इस बात को दावे के साथ कह सकते हैं कि चंपारण की चीनी भी उसी प्रकार मानव रक्त से सनी है, जिस प्रकार आज से कई दशक पूर्व नील चंपारणवासियों के रक्त में सना रहता था.

अंग्रेज उत्पादकों ने पट्टेदारों को आर्थिक और शारीरिक रूप से बिल्कुल खोखला बना दिया. 1867 से 1917 तक के पचास वर्षों तक किसानों ने जो संघर्ष किया उससे वे पूरी तरह अशक्त हो गये और सहरबेसी और तावान के रूप में नीलहों ने उन्हें जो अंतिम चोटें दीं, उससे वे सूदखोरों के चंगुल में जा फंसे. 1918 तक के दस वर्षों में उन किसानों ने भोगाधिकारी रेहन पर 84 लाख रुपये कर्ज पर लिये थे और सूदखोरों को 104 हजार एकड़ सौंप दी.

दूसरे, किसानों को संभलने का मौका मिलता उसके पहले ही 1930 की मंदी ने उन पर करारा आघात कर दिया. उनकी मुख्य फसल धान की कीमत 45 फीसदी गिर गयी. 1918 में जो चावल साढ़े सात सेर प्रति रुपया बिकता था, वह 1931 में 13 सेर प्रति रुपया बिकने लगा. और इन सबसे ऊपर मार्च 1931 में ऐसा झंझावात आया जिसमें उनकी रब्बी फसल बरबाद हो गयी. जिले के केंद्र से होकर गुजरने वाली 10 मील चौड़ी पट्टी वाला क्षेत्र दुष्प्रभावित हुआ. इस आपदा के अलावा मोतीहारी थाना के कुछ हिस्सों में एक किस्म का अ-प्राधिकृत ‘लगान नहीं अभियान’ भी चल रहा था, हालांकि कांग्रेस ने सिर्फ चौकीदार-कर न देने का आह्वान किया था.

उसके बाद 1934 में भूकंप हुआ, धरती में दरारें पड़ीं और बालू ऊपर आया जो खेती की हुई जमीन के बड़े हिस्से पर फैल गया. निम्नलिखित आंकड़े नुकसान की कुछ झलक दिखाते हैं-

सरकार ने डेढ़ प्रतिशत की दर पर 79 हजार रुपये प्राकृतिक आपदा ऋण के बतौर दिये. सरकार ने प्राकृतिक आपदा ऋण में से साढ़े छह प्रतिशत की दर पर 1,27 हजार रुपये दिये. ग्रामीण क्षेत्रों में मकानों की मरम्मत के लिए वायसराय भूकंप राहत कोष से 4,69 हजार रुपये, बालू हटाने के लिए प्रांतीय सरकार की ओर से 10,66,133 रुपये का ऋण दिया गया. गैर सरकारी सहायता कोषों से भी कई लाख रुपये दिये गये.

निजी सूदखोरों और तथाकथित सहकारी बैंकों ने मिलकर बड़ी मात्रा में कृषि योग्य जमीन चीनी मिलों को सौंप दी. उदाहरण स्वरूप, मोतीहारी थाना में लक्ष्मण टोला के भोलादास के घर की दस से ज्यादा चीजें सहकारी बैंक ने 100 रुपए के ऋण के एवज में ले ली और उसे मोतीहारी मिल को बेच दिया. इसके साक्ष्य हैं कि बालू हटाने के लिये जो सरकारी ऋण मिला उससे भी एक पट्टेदार कैसे अपनी जोत बेचने को मजबूर हो गया. अकहा गांव, थाना-मोतीहारी, विष्णुपुर टोला के तपेश्वर सहनी ने बताया कि उसने अपनी जमीन पर 1934 के भूकंप में भर आये बालू को हटाने के लिए 10-15 रुपये प्रति बीघा की दर से ऋण लिया था. लेकिन वह भारी मात्रा में बालू हटाने में सफल नहीं हो सका और सरकार ने जब उसे ऋण लौटाने के लिए कहा तो उसने अपनी जमीन को मोतीहारी मिल को 0-8-0 से लेकर 0-12-0 प्रति कट्ठा की दर से बेच दिया. इन सब चीजों से जमीन का भारी संकेंद्रण हुआ. जैसा कि अन्यत्र बताया गया है, हमारे हिसाब से गांधी के चंपारण छोड़ने के बाद लगभग ढाई लाख एकड़ जमीन रैयतों के हाथ से निकल कर सूदखोरों, मिलों तथा भू-स्वामियों के पास चली गयी.

इन्हीं कष्टों को झेलता मानव समुदाय कलकत्ता, बंबई, कानपुर और लंदन के पूंजीपतियों को मिला और उन्होंने इसका भरपूर इस्तेमाल किया. उस स्थिति में भी अनेक रूपों में बल प्रयोग किया गया. आम तौर पर मिल मालिक किसान की जमीन की घेराबंदी कर लेते थे, अपनी जमीन पर आने-जाने से रोक देते थे और फिर उन्हें अपनी जोत सौंप देने अथवा सस्ती दर पर बेच देने के लिए बाध्य करते थे. अपनी जमीन बेचने के लिये पट्टेदारों को मजबूर करने के ये तरीके अपनाये जाते थे-

  1. किसानों को अपनी जमीन पर आना-जाना बंद कर देना
  2. किसानों के खिलाफ झूठे मुकदमे चलाना
  3. जबरन जमीन दखल करना
  4. पानी का रास्ता रोकना
  5. गैर-मजरुआ जमीन पर अधिकार करना
  6. किसानों की फसल बरबाद करना
  7. किसानों को जंगली जानवर न मारने देना
  8. राज के अमलों की सहायता से किसानों की जमीन को नीलामी पर चढ़ाना और
  9. किसानों के पारिवारिक झगड़े से लाभ उठाना

लौरिया चीनी मिल, जो डालमिया प्रतिष्ठान का एक अंग है, के मालिकों ने कैसे फर्म बनाये, इससे जुड़ी एक छोटी सी कहानी इस प्रकार है- 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में मिस्टर शॉ ने एक फार्म बनाया जिसे पर्से प्रतिष्ठान कहा जाता था. फ्रांसिस विलियम्स इसके उत्तराधिकारी थे जिन्होंने हरपुरवा, सिरकहिया और मटियरिया में गांवों को उजाड़ कर बलपूर्वक दखल करके और गैर-मजरुआ जमीन जोतकर ब्रांच फर्म स्थापित किया. पकड़ी के हरिजनों से यह दुखद कथा सुनाई- कोठी ने दो पीढ़ी पहले चार बीघा जमीन ले लिया और उसके लिए कोई पैसा नहीं दिया. पूरा गांव जलाकर उजाड़ दिया गया. उस विदेशी ने लगभग सौ लोगों को उजाड़ कर उनकी जमीन पर अपना बंगला बनवाया. उसने तीन कुओं को भरवा दिया जिनके चिह्न अभी भी मौजूद हैं. आने-जाने का रास्ता बंद कर दिया और अन्य कई तरीकों से उसने लोगों को परेशान किया.

1943 में यह फार्म तीन लाख रुपये में मेसर्स डालमिया को बेच दिया गया. फार्म खरीदने के बाद मिल मालिकों ने हरिजनों के तीन छोटे गांवों को उजाड़ दिया, जो उस समय तक पकड़ी में मौजूद थे. फिरंगी और जगीरा कोई मुआवजा दिये बगैर उस जमीन पर खेती करते थे. इसके बाद उस जमीन पर बसे रैयतों को अपनी जमीन बेचने के लिए मजबूर किया जाने लगा. उन्हें अपना हल-बैल ले जाने की अनुमति भी नहीं दी गयी. पट्टेदारों के खिलाफ झूठे आपराधिक मुकदमे शुरू हुए और यहां-वहां पट्टेदारों की जमीन को जबरन जोत लिया गया. उदाहरणस्वरूप बगहा थानान्तर्गत बगोरा गांव के निवासी रामफल कमकर की मौत हुई तो उसके दो नाबालिग बच्चे रह गये. परिवार में और कोई नहीं था. उसकी जमीन जोत ली गयी. उसके दो बच्चों को गांव से भगा दिया गया. जहां यह चीनी मिलें थीं, वहां की विधवाओं और बच्चों से ऐसी कहानियां सुनने को मिली हैं.

प्रसंगवश यहां हमें बताया गया कि गन्ना ले जाने वाली रेल लाइनों के लिए चीनी मिल की ओर से सुरक्षात्मक प्रबंध किये गये थे. लेकिन हर वर्ष जानलेवा दुर्घटनाएं होती थीं. इस वर्ष रेल इंजन की चपेट में आकर एक हरिजन लड़का और गाय कटकर मर गये. इसके अलावा चीनी मिल के अन्य फार्मों पर भी मिल मालिकों द्वारा विभिन्न किस्म की बदसलूकियों के बारे में गंभीर किस्म की शिकायतें सुनने को मिलीं. इस चीनी मिल द्वारा अधिग्रहित जमीन की सूची इस प्रकार है-

विदेशी प्लांटर से खरीदी गयी जमीन –                          1840 एकड़
बलपूर्वक कब्जा की गयी जमीन-                                   350 एकड़
सस्ती दर पर खरीदी गयी जमीन-                                 390 एकड़
बेतिया राज से बंदोबस्त की गयी जमीन-                       200 एकड़
गैरमजरुआ जमीन-                                                     800 एकड़

इस प्रकार चीनी मिलों के लिए 40 हजार एकड़ जमीन अधिग्रहित की गयी और उसके लिए 20 लाख रुपये से ज्यादा का भुगतान नहीं किया गया. इस संपत्ति की कीमत अभी चार करोड़ रुपये से कम नहीं हो सकती है.

चीनी मिल के फार्मों की सूची और उनके अंतर्गत जमीन की मोटामोटी तस्वीर इस प्रकार है

  1. चकिया-               ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन लिमिटेड-                            1200 एकड़
  2. सुगौली-               अमजद अली-                                                             1200 एकड़
  3. लौरिया-              शांति प्रसाद जैन-                                                        3500 एकड़
  4. मझौलिया-         मोतीलाल पद्मपत-                                                     4000 एकड़
  5. चनपटिया-         ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन लिमिटेड-                            300 एकड़
  6. नरकटियागंज-    बिड़ला ब्रदर्स-                                                             3000 एकड़
  7. हरिनगर-            राजा नारायणलाल पित्ती-                                           10,000 एकड़
  8. बगहा-               खेतान ब्रदर्स-                                                              4000 एकड़
  9. मोतीहारी-          रामेश्वरलाल नोपानी-                                                 12000 एकड़

कुल-                                                                              39000 एकड़      

उपरोक्त तालिका बताती है कि सबसे बड़ा फार्म कलकत्ता के रामेश्वरलाल नोपानी का है. उनका 12 हजार एकड़ का फार्म चंपारण जिला मुख्यालय मोतीहारी शहर के ठीक नाक तले है. इस फार्म ने गांव के गांव निगल लिये और अपने पीछे निर्धनता का हुजूम खड़ा कर दिया, जो उसके लिए सस्ते श्रम का स्रोत बना.

ऐतिहासिक रूप से चीनी मिल के ये फार्म नीलहे प्लांटरों के फार्म की अगली कड़ी हैं. पहले यह बताया जा चुका है कि उन यूरोपीय उत्पादकों ने कैसे छल-बल से ये फार्म हासिल किये थे. पूरी उन्नीसवीं सदी चंपारण के किसानों पर ढाई गयी अमानवीय क्रूरता की कहानियों से भरी पड़ी है.

इस अध्याय में पेश तथ्य इस बात की ओर हमारा ध्यान खीचते हैं कि भले ही चंपारण सत्याग्रह के बाद तिनकठिया प्रथा खत्म हो गयी. नील की खेती बंद होने के बाद नीलहे प्लांटर बेरोजगार हुए और झख मार कर चंपारण छोड़ चले गये. मगर चंपारण के किसानों के दुखों का अंत नहीं हुआ. विदेशी नील प्लांटरों की जगह देसी चीनी मिल मालिकों ने ले ली. एक आकलन के मुताबिक चंपारण में नीलहे प्लांटर एक लाख एकड़ जमीन पर नील की खेती करवाते थे, इनमें से 39 हजार एकड़ जमीन पर चीनी मिल मालिकों के फार्म हाउस बन गये.

विपरीत परिस्थितियां, हादसे और सरकारी तंत्र के असहयोग की वजह से चंपारण के किसानों को अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ा. मिल मालिकों के पास तो जमीन का छोटा अंश आया. पहले जिक्र किया जा चुका है कि गांधी के चंपारण छोड़ने के अगले दस सालों में यहां के किसानों को ढाई लाख एकड़ जमीन से हाथ गंवाना पड़ा.

बहरहाल नील प्लांटरों के जाने के बाद चीनी मिल मालिक नये शोषक बन कर उभरे और उनकी शोषणवृत्ति आज भी कायम है, तभी तो ऐन चंपारण सत्याग्रह की सौंवी वर्षगांठ पर दो मिल मजदूरों ने आत्मदाह कर लिया. यह कोई अचानक घटी घटना नहीं थी और न ही आवेश में उठाया गया कदम. ये मिल मजदूर दो-तीन साल से सरकार को इस बात की चेतावनी दे रहे थे कि अगर मामला सुलझा नहीं तो ये आत्मदाह करेंगे.

आप सोचिये कि आज भी जब जमींदारी खत्म हो गयी. चीनी मिल मालिकों के हजारों एकड़ के फार्म हैं. सौ से दो सौ एकड़ के फार्म के टुकड़ों पर इनका फार्म आफिस है, जहां इनके फार्म मैनेजर और कारिंदे काम करते हैं. ठीक वैसे ही जैसे 1917 से पहले नील कोठियां थीं और उन कोठियों के मैनेजर और कारिंदे किसानों का शोषण करते थे. आप सोचिये कि इन फार्मों पर खेती कैसे होती होगी. उस इलाके में सिर्फ मजदूर होते होंगे किसान नहीं. लोग बताते हैं कि उनकी स्थित गुलामों से बेहतर नहीं होती.

किसान नेता पंडित रामानंद मिश्र ने जनमत में लिखे एक आलेख में इस बात का बखूबी वर्णन किया था. आजादी के ठीक बाद प्रकाशित इस आलेख में उन्होंने लिखा था…

‘गांधी जी के आंदोलन के बाद प्रत्यक्ष रूप से चंपारण में शांति हुई. पर यह शांति कब्रिस्तान की शांति थी. पिछले सौ वर्षों में अंग्रेज कोठीवालों ने चंपारण का खून चूस लिया था. वे चंपारण से गये मगर चंपारण को निर्जीव करके गये. नतीजा यह हुआ कि अगले तीस वर्षों में दूसरे तरह के लोग आये और उनकी जमीन को हड़प कर गये. वहां के किसानों में वह शक्ति नहीं बची कि वे अपनी जमीनों की हिफाजत कर सकें. कांग्रेस मंत्रिमंडल आया, गया और फिर आया. देश की राजनीतिक आबोहवा में आसमान जमीन का फर्क हुआ- फिर भी उनकी हालत ज्यों की त्यों बनी रही.

आज सारा चंपारण फार्मों से भरा है. पूंजीपति, जमींदार, नेता, व्यापारी तरह-तरह के लोग कलकत्ता, बम्बई, मुजफ्फरपुर, पटना, छपरा, शाहाबाद से आकर चंपारण के हर कोने में फार्म बनाकर बैठे हैं. किसी भी तरह कहीं भी जिसकी पहुंच हो सकती थी, वह चंपारण की जरखेज जमीनों की लालच में वहां जा पहुंचा है. कलकत्ते के नोपानी साहब, बम्बई का पित्ती परिवार, हिंदुस्तान के मशहूर बिड़लाओं के वहां फार्म हैं. इसी तरह राजेंद्र प्रसाद, प्रधानमंत्री बापू श्रीकृष्ण सिंह(उस वक्त मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहते थे.- लेखक), श्रीमती सुंदरी देवी, पं. प्रजापति मिश्र(ये भी बड़े किसान नेता थे.- ले.), हरिवंश सहाय(चंपारण सत्याग्रह के आंदोलनकारी- ले.), प्रो. अब्दुल बारी और श्री कमलनाथ तिवारी के फार्म खुल चुके हैं. माननीय डॉक्टर महमूद और श्री अनुग्रह नारायण सिंह के परिवार की ओर से भी कहा जाता है कि दरख्वास्तें पड़ी हुई हैं. मैं इसे चंपारण का चीरहरण कहता हूं. आज तो हालत ऐसी है कि मालूम होता है मानों चंपारण कोई अबला विधवा है- जो पाता है, जमीन ले भागता है. महात्मा गांधी से लेकर देश के सभी बड़े नेताओं ने माना है कि किसान ही जमीन का मालिक है. फिर काश्तकारी का नैतिक हक किसानों को क्यों नहीं.

वे आगे लिखते हैं-

‘इन बातों को देखते हुए क्या किसी जनता की सरकार के लिये इन फार्मों को सहयोगी प्रथा पर खेती करने के लिए किसानों को वापस करने में जरा भी हिचकिचाहट होनी चाहिए. संभवतः डॉ. राजेंद्र प्रसाद या श्रीबाबू के फार्म जायज और मुनासिब तरीके से बने हों, परंतु इससे हमारे दावे में कोई फर्क नहीं पड़ता. हमारा तो नैतिक आधार पर दावा है कि चंपारण की जमीन चंपारण के किसानों की होनी चाहिए. फिर यह भी प्रश्न उठता है, इन महानुभावों के फार्म दूसरे जिलों में क्यों न बनें, चंपारण में ही क्यों.’

लोहिया की रिपोर्ट और रामानंद मिश्र के सवाल सचमुच असहज करने वाले हैं. इस रिपोर्ट ने एक तरफ तो उन परिस्थितियों का वर्णन किया है, जिसमें फंस कर चंपारण के किसान फिर से भूमिहीन हो गये और उन्हें औने-पौने दाम में अपनी जमीन चीनी मिल मालिकों और दूसरे बड़े लोगों के हाथ बेचनी पड़ी या उनसे हड़प ली गयी. एक तरह से चंपारण में उससे भी बदतर स्थिति हो गयी जो 1917 से पहले थी. किसान गरीब हो गये, भूमिहीन मजदूर बन गये. दुःखद है कि इस बीच दो बार बनी कांग्रेस की सरकार ने उन्हें इस स्थिति से बचाने के बदले उनकी इस मजबूरी का फायदा उठाया और अपने बड़े नेताओं को वहां फार्म बनाने में मदद की. लोहिया रिपोर्ट के मुताबिक 1950 में बिहार के 28 मंत्रियों और विधायकों और कई बड़े कांग्रेसी नेताओं के वहां फार्म थे. इन सभी फार्मों की कुल जमीन 1952 एकड़ थी. दिलचस्प है कि ऐसे फार्म सिर्फ चंपारण में ही थे, दूसरे जिलों में नहीं.

इनमें साठी फार्म का किस्सा सबसे विवादास्पद साबित हुआ. वहां का नील प्लांटर जब देश छोड़कर जाने लगा तो उसने अपनी जमीन बेतिया स्टेट को वापस कर दी. उस वक्त बेतिया स्टेट कोर्ट ऑफ वार्ड्स के तहत आता था और सरकार द्वारा विपिन बिहारी वर्मा नामक कांग्रेसी नेता जो शिकारपुर स्टेट से संबंधित थे, को उसका मैनेजर नियुक्त किया गया. बेतिया स्टेट की तरफ से वह जमीन एक बड़े राजनेता के नजदीकी रिश्तेदार को गिफ्ट कर दिया गया. मगर जल्द ही इस फैसले का चौतरफा विरोध होने लगा और यह एक राजनीतिक सवाल बन गया तो जमीन पाने वाले ने उस जमीन को एक व्यवसायी के हाथों बेच दिया. दिलचस्प है कि आज भी साठी में उस व्यवसायी का फार्म हाउस है, जहां मैं पिछले साल घूमकर आया हूं.

यह स्थिति दुखद इसलिए है कि साठी ही चंपारण का वह गांव था जिसने सबसे पहले नील की खेती का जुआ उतारकर फेंका था. शेख गुलाब उसी इलाके के थे. उनके नेतृत्व में 1907 में ही आंदोलन हुआ था और वहां के प्लांटर ने थक हार कर नील की खेती से तौबा कर ली थी. वही साठी आज 111 साल बाद भी जमीन के संकट से जूझ रहा है. साठी में कई दफा आंदोलन हुए, मगर आजादी के बाद की सरकारों ने किसानों को उनका हक दिलाने में जरा भी दिलचस्पी नहीं ली.

 

 

 

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