इस कोकिला की कूक अब भी बिहार के लोकमानस में गहराई से रची-बसी है

पांच मार्च को पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी की जयंती पर पढिये यह विशेष आलेख

निराला बिदेसिया

सप्ताह दिन पहले हार्डडिस्क गुम हो गया है. इस तनाव से दो दिनों तक गुजरने के बाद अब सामान्य होने में लगा हुआ था कि आज सुबह से ही एकदम से मन उसमें अटक-सा गया है. उस हार्डडिस्क में विंध्यवासिनी देवी से 12 साल पहले 18 फरवरी 2006 को हुई दो घंटे की बातचीत का आडियो था. मन उस दिन की ही मुलाकात में अटका हुआ है. वहीं फंसा हुआ है. उस दोपहरी अपने भाई के साथ गया था तो उनसे क्या-क्या बात हुई थी, याद कर रहा हूं.

तब माइंड पत्रिका के साथ जुड़ा हुआ था तो उस पत्रिका में प्रकाशित इंटरव्यू के पन्ने सामने खुले हुए हैं लेकिन पत्रिका में तो संक्षिप्त संपादित अंश था. बातचीत को बचाकर रखा था कि कभी एडिट कर के ऑडियो वर्जन ही साझा करूंगा. उस रोज के सारे दृश्य याद आ रहे हैं. वह बीमार थी. पटना कंकड़बाग में उनके घर पर पहुंचा. वे उठकर आयीं. बातचीत करने लगीं. और बतियाते-बतियाते गाने लगीं.

एक-एक कर कई गीत सुनाने लगीं. सुराजी गीत. विद्यापति के गीत, मगही गीत, चैती, फाग, गारी, जानकी विवाह के गीत. चट से भोजपुरी में गातीं, अगले गीत का बोल मगही में होता, फिर मैथिली में, बज्जिका में. पल भर में भाषा बदलती और पूरा का पूरा टोन फ्लेवर बदल देतीं. पूरा का पूरा अंदाज ही. भाषा और गायकी के साथ अपनी आवाज में संबंधित भाषाभाषी इलाके के पूरे सांस्कृतिक परिवेष को समाहित कर ले रही थीं.

सुबह से विंध्यवासिनी की किताब पढ़ रहा हूं, उनके गीत सुन रहा हूं, उन्हें याद कर रहा हूं. उनसे मिलकर लौटा था तो सोचा था कि फिर मिलूंगा. लेकिन दुबारा मिलने की सोचता रहा और एक रोज खबर आयी कि वे दुनिया से विदा हो गयीं.

लोकसंगीत, लोकभाषा से एक अनुरागी रिश्ता है तो हर कुछ दिनों पर नये पुराने कलाकारों से मिलना होते रहता है. आज के कुछेक, विशेषकर भोजपुरी लोकगीत गायक-गायिकाओं से मुलाकात होती है तो वे बेतरतीब आग्रहों के साथ बताते हैं कि बस! फलां अलबम आ जाये तो छा जायेंगे. जो इस क्षेत्र में खुर्राट हो चुके हैं, उनका भी अमूमन जवाब होता है- फलां अलबम आ रहा है न…! गाना गा भर लेना, अलबमों की संख्या अधिक से अधिक बढ़ा लेना, अधिक से अधिक कार्यक्रमों को अपने पाले में कर लेना, यही पड़ाव और प्रस्थान बिंदु की तरह हो गया है.

ऐसे में विंध्यवासिनी से हुई इकलौती मुलाकात बार-बार याद आती है. अब के समय में उनके व्यक्तित्व, कृतित्व को याद करना कल्पनालोक में विचरने-सा लगता है.

18 फरवरी 2006 को दुपहरिया का समय था. पटना के कंकड़बाग मोहल्ले के वकील साहब की हवेली में उनसे मिलने पहुंचा था. तब उम्र के 86वें साल में बिहार की स्वर कोकिला विंध्यवासिनी कई बीमारियों की जकड़न में थी. न ठीक से बैठने की स्थिति थी, न बोलने-बतियाने की ताकत. लेकिन बच्चों जैसी उमंग, उत्साह लिये सामने आयीं. गरजे-बरसे रे बदरवा, हरि मधुबनवा छाया रे…, हमसे राजा बिदेसी जन बोल…, हम साड़ी ना पहिनब बिदेसी हो पिया देसी मंगा द… जैसे कई गीतों को सुनाने लगीं. तन एकदम साथ नहीं दे रहा था, गले को बार-बार पानी से तर करतीं लेकिन मन और मिजाज ऐसा कि मना करने पर भी रूक नहीं रही थीं. एक के बाद एक गीत सुनाते गयीं.

दरअसल, लोक संगीत की लोक देवी विंध्यवासिनी ऐसी ही थीं. अपने रोम-रोम में लोकसंगीत को जिंदगी की आखिरी बेला तक रचाये-बसाये रहीं. जिन दिनों कैसेट, सीडी, रिकार्ड का चलन नहीं था, उस दौर में रेडियो के सहारे विंध्यवासिनी बिहार के लोकजुबान और दिलों पर राज करती थीं. वह सिर्फ गा भर नहीं रही थी, उसी दौरान लोक रामायण की रचना भी कर रही थीं, ऋतुरंग जैसे गीतिका काव्य भी रच रही थी. पटना में विंध्य कला केंद्र के माध्यम से कई-कई विंध्यवासिनी को तैयार कर रही थीं.

पांच मार्च 1920 को मुजफ्फरपुर में जन्मीं थीं विंध्यवासिनी. आजादी से पहले का समय था. तब की परिस्थितियों के अनुसार इतना आसान नहीं था कि वह गीत-गवनई की दुनिया में आयें. सामाजिक और पारिवारिक बंदिशें उन्हें इस बात का इजाजत नहीं देती थीं लेकिन संयोग देखिए कि बचपने से ही संगीत के सपनों के साथ जीनेवाली विंध्यवासिनी को शादी के बाद उनके पति सहदेवेश्वर चंद्र वर्मा ने ही प्रथम गुरू, मेंटर और मार्गदर्शक की भूमिका निभाकर बिहार में लोकक्रांति के लिए संभावनाओं के द्वार खोलें.

स्व. वर्मा खुद पारसी थियेटरों के जाने-माने निर्देशक हुआ करते थे. विंध्यवासिनी को संगीत नाटक अकादमी सम्मान, पद्मश्री सम्मान, बिहार रत्न सम्मान, देवी अहिल्या बाई सम्मान, भिखारी ठाकुर सम्मान आदि मिलें. विंध्यवासिनी कहती थीं कि इन सबसे कभी किसी कलाकार का आकलन नहीं होगा. न ही सीडी-रिकार्ड आदि से, जिसकी उम्र बहुत कम होती है. जो पारंपरिकता को बचाये-बनाये रखने और बढ़ाने के लिए काम करेगा, दुनिया उसे ही याद करेगी. विंध्यवासिनी उसी के लिए आखिरी समय तक काम करते रहीं.

वह भी एक किसी एक भाषा, बोली को पकड़कर नहीं बल्कि जितने अधिकार से वे मैथिली गीतों को गाती-रचती थीं, वही अधिकार उन्हें भोजपुरी में भी प्राप्त था. डिजिटल डोक्यूमेंटेशन के पापुलर फार्मेट में जाये तो विंध्यवासिनी ने दो मैथिली फिल्मों- भैया और कन्यादान में गीत गाये, छठी मईया की महिमा हिंदी अलबम तैयार किये तथा डाक्टर बाबू में पार्श्व गायन-लेखन किया. लेकिन इस कोकिला की कूक अब भी बिहार के लोकमानस में गहराई से रची-बसी है.

विंध्यवासिनी देवी बिहार की लोकभाषाओं के बीच मिलान करानेवाली, एक दूसरे इलाके को अबुझपन—अजनबीनपन से निकाल अपनी लोकगायकी से जोड़नेवाली ब्रिज की तरह थीं. आजादी के पहले से लेकर उसके बाद के कालखंड में विंध्यवासिनी ने ही पहली बार महिला कलाकारों के लिए एक लीक तैयार की थी, जिस पर चलकर आज महिला लोकसंगीत कलाकारों की बड़ी फौज सामने दिखती है, भले ही भटकाव ज्यादा है, मौलिकता नगण्य…

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