एक आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या

बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के अरेराज कस्बे में एक आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या हो गयी। इन दिनों आरटीआई एक्टिविस्ट भी लगभग उसी तरह के खतरों की जद में हैं, जिस तरह का खतरा निष्पक्ष और सत्ता विरोधी पत्रकार झेलते हैं। मगर आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या पर उतना शोर नहीं मचता जितना पत्रकारों और लेखकों की हत्या पर मचता है।
आरटीआई एक्टिविस्ट राजेन्द्र सिंह उसी अरेराज के रहने वाले हैं, जिस इलाके के जितवारपुर गांव के रवीश कुमार NDTV इंडिया के मशहूर एंकर हैं। वे भी अक्सर सत्ता पक्ष के लोगों के ट्रोल का शिकार होते हैं। उन्हें मारने की धमकी भी दी जाती है। इसकी वजह यह है कि केंद्र की सरकार अक्सरहाँ रवीश के निशाने पर रहती हैं। वे तार्किक रूप से सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों की आलोचना करते हैं और उन्हें उनके वादों की याद दिलाते हैं।
राजेन्द्र सिंह का कद इतना बड़ा नहीं था। उनके निशाने पर अरेराज कस्बे के ठेकेदार, अपराधी और पुलिस प्रशासन के लोग हुआ करते थे। वे आरटीआई के जरिये स्थानीय स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार उजागर किया करते थे। मगर यह बात स्थानीय दबंगों और उन्हें शरण देने वाले पुलिस अधिकारियों को इतनी नागवार गुजरती कि वे उनकी हत्या करने का मन बनाने लगे थे।
उन पर पहले भी तीन बार हमले हो चुके थे। उन्होंने पिछले साल अक्टूबर महीने में मुजफ्फरपुर के डीआईजी को पत्र लिखकर सूचित भी किया था कि उनकी जान को खतरा है। उनके फेसबुक प्रोफाइल से उनकी तस्वीर डाउनलोड कर कुछ लोग स्टूडियो से उसका प्रिंट आउट लेने लगे थे। पत्नी को भी लगने लगा था कि उनके पति की जान खतरे में है। उनका अपना भाई सम्पत्ति के लोभ में उनके विरोधियों से मिल गया था।
भाई ने उनकी गैर हाजिरी में उनके घर से आरटीआई एप्लीकेशन वाली फ़ाइल उठा ली थी। उन्होंने जब पुलिस में शिकायत की तो पुलिस ने कोम्प्रोमाईज़ कर लेने कहा। कहते हैं उस फ़ाइल में उस मामले के दस्तावेज भी थे जिसमें उन्होंने एक स्थानीय पुलिस इंस्पेक्टर के खिलाफ जानकारी मांगी थी कि उनके द्वारा बरामद शीशम की लकड़ी और गांजे का क्या हुआ। वह संबंधित पुलिस अधिकारी पिछले दिनों अरेराज का डीएसपी बन गया और उनकी हत्या की जांच उन्हीं को सौंपी गई है।
यह जानकारी भी सामने आ रही है कि राजेन्द्र सिंह की हत्या से महज एक हफ्ता पहले उस इलाके में एक पंचायत भी हुई थी। जिसमें पुलिस अधिकारियों ने राजेन्द्र सिंह से कहा था कि वे उनके खिलाफ चल रहे तमाम मामलों को उठा लें, पुलिस भी उनके खिलाफ चल रहे मामले हटा लेगी। दरअसल राजेन्द्र सिंह के ऊपर कई झूठे मामले पुलिस ने लाद रखे थे।
राजेन्द्र सिंह द्वारा उठाये गए एक अवैध नियुक्ति के मामले की वजह से एक स्थानीय BEO को जेल भी जाना पड़ा था। इन उदाहरणों से आप समझ सकते हैं, राजेन्द्र सिंह ने आरटीआई को कितना ताकतवर हथियार बना रखा था।
फिर 19 जून को उनकी हत्या हो गयी और जैसा कि बताया गया है उनकी हत्या की जांच के लिये गठित समिति में वह पुलिस अधिकारी भी जिसके खिलाफ राजेन्द्र सिंह आरटीआई के जरिये सक्रिय थे। जो एक हफ्ते पहले पंचायत में उनसे मामले उठा लेने की बात कह रहा था और राजेंद्र सिंह ने कहा था चाहे जान चली जाए वह इन मामलों को वापस नहीं लेगा। NAPM के कार्यकर्ताओं ने उस अधिकारी को मामले से अलग करने की मांग की है।
राजेन्द्र सिंह की हत्या की खबरों से मोतीहारी के अखबार भरे पड़े हैं, मगर दिल्ली तो क्या पटना में भी जेनुइन सवाल नहीं उठ पा रहे। एक अजीब सी मुर्दा शांति है और उनकी पत्नी और उनके मित्रों शुभचिंतकों को लग रहा है इस मुर्दा शांति में सच्चाई के एक सिपाही की हत्या का सवाल भी दफ्न हो जायेगा।

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