मोकामा घाट वाला वह बाघ बहादुर जिसे दुनिया ‘जिम कार्बेट’ के नाम से जानती थी

जिम कार्बेट. यह नाम लेते ही कई कहानियां सामने तैरने लगती हैं. भारत में बाघवाला सबसे मशहूर आदमी. ‘माई इंडिया’ और ‘मैनइटर ऑफ कुमायूं’ जैसे बेस्टसेलर किताबों के लेखक. बाघों के मशहूर शिकारी के साथ ही बाघों को बचाने में जीवन लगानेवाले नायक के रूप में भी जाना जाता है. नायक भी. बात जब चलती तो जिम कार्बेट का नाम तुरंत उत्तराखण्ड के गढ़वाल जिले से जुड़ता है, जहां उन्होंने आदमखोर बाघों को मारा था, जिनमें रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ भी शामिल था. लेकिन इन सभी कहानियों के बीच यह कम लोगों को मालूम है कि दुनिया भर में ख्यातिप्राप्त बाघ वाला वह फिरंगी आदमी बहुत ही खामोशी के साथ दो दशक तक बिहार को कर्मभूमि बनाकर दुनिया भर में बाघ के लिए मशहूर हुआ था.

निराला बिदेसिया

भारत में या अब तो दुनिया में ही बाघों की बात चलती है तो उनकी विविध प्रजातियां, उनकी विलुप्त होती दुनिया, उनका महत्व, उनके संकट आदि से बात शुरू होती है, वहीं खत्म भी हो जाती है. लेकिन बाघों की बात चलती है तो उसके साथ एक इंसान का नाम भी जरूरी से जुड़ता है और उसका नाम जोड़े बिना बाघ की कहानी अधूरी-सी लगती है. वह जरूरी नाम होता है जिम कार्बेट का. वह जिम कार्बेट, जिसे बाघों के शिकारी के रूप में जाना जाता है लेकिन वह सच का एक पहलू है. सच यह है कि वह महज शौकिया और अय्याश शिकारी नहीं था और न ही अमानवीय हंटर था.

निराला

खैर, वह बातें बाद में. उससे ज्यादा दिलचस्प व महत्वपूर्ण बात दूसरी है. वह यह कि जिस जिम कार्बेट जिसके नाम पर उत्तराखंड में जिम कार्बेट रिजर्व है, जिनके नाम पर फिलहाल दुनिया में मौजूद बाघ की पांच प्रजातियों में से एक पैंथेरिया टिग्रेस कारबेटी है, उस जिम कार्बेट ने बहुत ही खामोशी के साथ, चुपचाप बिहार में दो दशक तक रहकर अपना काम किया, यहीं रहकर बाघों की दुनिया को समझा और दुनिया में ख्याति भी प्राप्त की. जिम कार्बेट वह शिकारी थे, जिन्होंने बाघों का सबसे ज्यादा शिकार किया लेकिन उन्होंने ही दुनिया को बताया कि ‘ ए टाइगर इज ज लार्ज हर्टेड जेंटलमैन विद बाउंडलेस एंड एनॉर्मस स्ट्रेंथ.’’

कार्बेट दो दशक तक मोकामा रेलवे स्टेशन पर रहकर काम किये और उनकी ख्याति उस वक्त उस पूरे इलाके में एक उदार अधिकारी की बनी रही. जिम कार्बेट के बारे में ऐसी कई रोचक जानकारी रांची सेंट्रल यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक मयंक ने पिछले दिनों एक बतकही में दी थी. बकौल मयंक, जिम कार्बेट को महज शिकारी की तरह देखा जाता है और यही धारणा उनके बारे में बना ली गयी है जबकि कार्बेट कोई शौकिया शिकारी नहीं थे. उन्होंने कुमायुं में जाकर चंपावत जैसे बाघ को मारा, जिसने 500 के करीब लोगों को मारा था.

कुमायूं में उस चीते को मारा, जिसकी वजह से पूरे इलाके में दहशत रहता था. ऐसे ही कई और बाघों को मारा. मयंक बताते हैं कि वे बचपन में शौकिया शिकारी थे लेकिन 1875 में जन्मे कार्बेट जब 21 साल की उम्र में बिहार के मोकामा में आये, तब से वे दूसरी वजहों से बाघों का शिकार करने लगे. उन्हें देश भर में बाघों को मारने के लिए बुलाया जाता था और वे उसी बाघ को मारते थे, जो मैनइटर होते थे और जिनकी वजह से लोगों को खतरा रहता था.

बिहार में रहकर कार्बेट बार-बार कुमायु जाते रहे, बाघों का शिकार करते रहे और फिर उन अनुभवों को बिहार में लौटकर मैनइटर ऑफ कुमायूं, ‘द टेंपल टाइगर’ एंड मैनइटर ऑफ कुमायूं द जंगल लोर, द ट्री टॉप से लेकर माई इंडिया तक में व्यक्त करते रहे. इनमें ‘माई इंडिया’ तो उनकी एक ऐसी रचना हुई, जिससे उस समय के देश के सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक हालात को सबसे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है और बहुत हद तक बिहार को भी.

सबसे रोचक यह है कि बाघों के शिकार की वजह से दुनिया भर में मशहूर हुए जिम कार्बेट मोकामा स्टेशन पर ट्रांसशिपमेंट इंसपेक्ट के रूप में मोकामा स्टेशन पर 21 साल की उम्र में काम करने आये. जब जिम कार्बेट मोकामा पहुंचे तो उनके पूर्ववर्ती अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि तुम यहां क्यों फंसने आये हो, सुबह वापस जाओ, यह काम करने की जगह नहीं. लेकिन उसी वक्त मोकामा स्टेशन के मास्टर ने रामशरण ने कार्बेट को कहा कि साहब आप रहिए, सब मिलकर संभाल लिया जाएगा. कार्बेट कहीं वापस नहीं गये, वहीं रह गये.

उनका काम मोकामा घाट से सिमरिया घाट तक रेलवे के माल को एक पार से दूसरे पार भेजना-भिजवाना रहता था. इस काम को उन्होंने स्थानीय मजदूरों की सहायता से 20 सालों तक किया और यह अभी भी रिकार्ड है कि 20 सालों में कोई एक मजदूर एक बार भी जो कार्बेट के साथ काम करने आया, वह कार्बेट के वहां रहने तक कभी साथ छोड़कर, काम छोड़कर नहीं गया. इसकी कई वजहें थी. एक तो कारबेट उन बिहारी मजदूरों के साथ बिहारी जैसे बन गये थे और दूसरे वे उनके हितों की रक्षा के पक्ष में उतरनेवाले में दुनिया के दुर्लभ फिरंगी अधिकारियों में से थे.

एक बार की बात है कि मजदूरों को मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ. मजदूरों के सामने संकट गहराता गया. दूसरी ओर अंग्रेज सरकार कार्बेट का वेतन तो भेजने को तैयार थी लेकिन मजदूरों के पैसे में विलंब करने के मूड में थी. कार्बेट ने रात बारह बजे टेलीग्राम किया कि अगर कल दिन के बारह बजे तक मजदूरों का पैसा नहीं आएगा तो काम ठप होगा और मेरा पैसा मजदूरों के पैसे के साथ ही भेजने की जरूरत है.

दुनिया के मशहूर शिकारी और बाघ के साथ खेलनेवाले कार्बेट का यह मानवीय पक्ष था. ऐसी कई घटनाएं बिहार में रहते हुए घटी, जिसका जिक्र उन्होंने माई इंडिया में विस्तार से किया है. वे कुमायूं में जाकर शिकार करते थे, दुनिया भर में जाने जाते थे लेकिन बिहार रहते हुए बिहार को समझने की केाशिश करते थे, बिहारी बने रहते थे.

उनकी किताब माई इंडिया में ‘माई लाईफ एट मोकामा घाट’ को पढ़ते हुए साफ होता है कि वे कितनी बारीक नजरों से बिहार को देख समझ रहे थे. वे कपड़े देखकर, कंधे पर गमछा रखने, किसी के उठने-बैठने के अंदाज से उसकी जाति तक का पता लगा लेने जैसी बातें लिखे हैं.
जिम कार्बेट पर गहराई से शोध व अध्ययन करनेवाले सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड के अंग्रेजी विभाग में सहायक प्राध्यापक मयंक रंजन कहते हैं कि

यह दुर्भाग्य है कि जिस बिहार में ही कार्बेट ने अपना जीवन गुजार दिया. जहां रहकर दुनिया भर में बाघवाले आदमी बन गये, उस बिहार में लोग उनके बारे में नहीं जानते. उनकी चर्चा कभी नहीं होती. और अपने देश में भी जो कार्बेट के बारे में जानते हैं वे एक शिकारी के रूप में ही जानते हैं.

प्रो मयंक कहते हैं, भारत में अंग्रेजी लेखकों पर जार्ज ऑरवेल और रूडयार्ड किपलिंग पर ही बात शुरू होकर खत्म हो जाती है, उन पर ढेरो काम भी मिलेंगे लेकिन जिम कार्बेट की तरह न तो ईमानदारी से समझनेवाला कोई इकोलॉजिस्ट लेखक था, ना भारतीय मर्म को समझनेवाला और उसमें रमनेवाला कोई अंगे्रेज लेखक भारत आया और न ही उतना लोकप्रिय हो सका, जिसका एक नमूना यह है कि 1996 तक ही ‘मैनइटर ऑफ कुमायूं’ की छह लाख प्रतियां बिक चुकी थी.

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