अंगरेज कमिश्नर को अपना कुत्ता नहीं दिया, मगर गांधी ने कहा तो सिगार पीना छोड़ दिया

पुष्यमित्र

अगर आप बिहार के रहने वाले हैं तो आपने पटना के सदाकत आश्रम का नाम जरूर सुना होगा. 1921 में इस आश्रम की स्थापना महात्मा गांधी के हाथों से हुई थी, फिर यह आजादी के दीवानों की गतिविधियों का केंद्र रहा. राजेंद्र बाबू जब राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त हुए तो उन्होंने इसी सदाकत आश्रम को अपना ठिकाना बनाया और आखिर वक्त यहीं गुजारा. आजादी के बाद से यह आश्रम कांग्रेस पार्टी का मुख्यालय रहा है. मगर क्या आपने कभी सोचा कि इसका नाम सदाकत क्यों पड़ा और सदाकत का अर्थ क्या होता है?

जैसे ही आप सदाकत शब्द की पड़ताल करना शुरू करेंगे तो इस आश्रम की कहानी खुलती जायेगी और आपकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से होगी जिसे हमने आज भुला दिया. जी हां, सदाकत का अर्थ है, सच्चाई. यह उर्दू भाषा का शब्द है. और उर्दू के सदाकत और संस्कृत के आश्रम के जुड़ने से जो यह परिसर बना है, उसके पीछे मौलाना मजहरूल हक का नाम है, जो एक वक्त में बिहार के स्वतंत्रता संग्राम की धुरी हुआ करते थे. उसी मौलाना ने बिहार में आजादी की गतिविधियों के संचालन के लिए 20 बीघा जमीन का दान किया था, जिस पर यह सदाकत यानी सच्चा आश्रम बना. आज उसी मौलाना मजहरूल हक की जयंती है.

सदाकत आश्रम परिसर में मौलाना मजहरूल हक पुस्तकालय

सिर्फ सदाकत आश्रम ही नहीं मजहरूल हक की एक और निशानी इसी पटना शहर में है, वह है सिकंदर मंजिल. जब गांधी 1917 में पहली पहल पटना आये थे, और राजेंद्र बाबू के नौकर ने उनका यथोचित सम्मान नहीं किया था तो उसी सिकंदर मंजिल में हक साहब उन्हें अपने साथ ले गये थे. उस वक्त हक साहब की अलग शान हुआ करती थी. वे जमींदार के बेटे थे और पटना के नामी वकील और जाने-माने पोलिटीशियन थे. कहते हैं, गांधी ने जब उन्हें सिगार पीते देखा तो उनके आलीशान ड्राइंग रूम के फर्श पर बैठ गये और कहा कि जब तक वे सिगार पीना नहीं छोड़ेंगे, मैं फर्श पर से नहीं उठूंगा. गांधी की एक जिद पर उन्होंने सिगार पीना हमेशा के लिए छोड़ दिया. आज आप उस ड्राइंग रूम को तलाशने जायेंगे तो पता चलेगा कि वहां ईंटें रखी हैं और नये सिरे से कुछ बनाने की कोशिश की जा रही है.

दरअसल फ्रेजर रोड स्थित सिकंदर मंजिल का मालिक आज कोई और है, जिसने काफी पहले इसे खरीद लिया था. अब उस भवन में उस व्यक्ति का भरा-पूरा परिवार रहता है और ग्राउंड फ्लोर पर कई दुकानें खुल गयी हैं. इस बीच रेनोवेशन के नाम पर या कुछ और बनाने के इरादे से उस ड्राइंग रूम को ध्वस्त कर दिया गया है, जहां गांधी हक साहब के साथ काफी देर बैठे थे.

वैसे तो हक साहब को सादगी और सरलता की प्रतिमूर्ति माना जाता है. मगर यह उनके गांधी से मिलने के बाद का किस्सा है. पहले वे ऐसे नहीं थे. अलमस्त और मनमौजी किस्म के व्यक्ति थे. बचपन से ही. एक नील जमींदार के पुत्र हक बचपन में एक फकीर से प्रभावित हो गये थे और उनके पीछे-पीछे पूर्वी बंगाल(फिलहाल बांग्लादेश) की तरफ चले गये. वहां वे एक गांव में रहने लगे थे. वहां उन्होंने प्रवचन देना सीख लिया, जो आगे राजनीतिक जीवन में उनके काम आया. जमींदार पिता ने उन्हें ढुंढवा कर फिर से पटना बुलाया और पढ़ाई से नाता जोड़ा. पटना में कुछ साल हुई पढ़ाई के बाद उन्हें उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ भेज दिया गया. मगर वहां भी उनका मन नहीं रमा. ढाका के एक नवाब से कुछ पैसे उधार लिये और कानून की पढ़ाई के लिए लंदन चले गये. इधर घर वाले समझ रहे थे कि वे लखनऊ में पढ़ाई कर रहे हैं.

सिकंदर मंजिल के परिसर में यही वह जगह थी जहां हक साहब का ड्राइंग रूम था. जहां उनकी गांधी से पहली मुलाकात हुई थी.

अदन से उन्होंने पिता को चिट्ठी भेजी कि कानून की पढ़ाई पूरी किये बगैर वे लौटने वाले नहीं. थक हार कर पिता ने कुछ गांवों की जमींदारी बेची और बेटे को पढ़ाई पूरी करने के लिए पैसे भेजे. वहां उनकी मित्रता मोहनदास करमचंद गांधी, सच्चिदानंद सिन्हा और अली इमाम जैसे लोगों से हुई जिन लोगों ने आगे चल देश के राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया. वे देश लौटे तो पटना में वकालत करने लग गये. वकालत जम गयी और बाद में मुसिंफ की नौकरी भी लग गयी. मगर अपनी आन और शान की वजह से उन्होंने उस नौकरी को भी छोड़ दिया.

वजह छोटी सी थी, पटना के कमीश्नर को उनके कुत्ते पसंद आ गये थे और हक ने उन्हें कह दिया वे किसी को देने के लिये कुत्ते नहीं पालते, इतना शौक है तो खरीद कर कुत्ता पालें. कमीश्नर ने दबाव डालने की कोशिश की, तैश में आकर हक साहब ने नौकरी भी छोड़ दी और पटना भी. छपरा में जाकर प्रैक्टिस करने लगे.

वहां फरीदपुर में जमीन खरीदी, बंगला बनवाया और बगीचा लगाया. वह घर आशियाना के नाम से मशहूर हुआ. 1897 के अकाल में उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हुई. उन्होंने राहत कमेटी बनाकर ऐसा जबरदस्त काम किया कि उसकी ख्याति पूरे देश में फैल गयी. 1903 में उन्हें सर्वसम्मति से छपरा नगरपालिका का उपाध्यक्ष चुन लिया गया, वहां भी उन्होंने बहुत शानदार काम किया. अब उनका व्यक्तित्व इतना बड़ा हो गया कि छपरा छोटा पड़ने लगा था. लिहाजा एक बार फिर से पटना में आकर बस गये. वकालत भी करते थे और राजनीति भी. आन, बान और शान वैसी की वैसी. दोस्तों के लिए जान हाजिर कर देने वाले दोस्त, और किसी ने टेढ़ी निगाह दिखायी तो बख्शते नहीं थे. इस दौर में गांधी उनके घर पहुंचे थे.

गांधी से मिलने के बाद उनका जीवन ही बदल गया. उन्होंने खुद को पूरी तरह आजादी की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया. सदाकत आश्रम का निर्माण तो उनकी पहल पर हुआ है, साथ ही उन्होंने वहां से ‘मदरलैंड’ नाम से एक साप्ताहिक पत्रिका भी निकाली. जिसमें आज़ादी के पक्ष वे लगातार लिखते रहे. इस कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा.

छपरा में उनका घर ‘आशियाना’ भी सदाकत आश्रम की तरह ही देश को समर्पित था. पंडित मोतीलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मदन मोहन मालवीय सहित कई लोग इस घर के मेहमान रहे थे. अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तारी के डर से भागे आज़ादी के कई सिपाहियों ने ‘आशियाना’ में पनाह पाई थी.

असहयोग आंदोलन के दौरान पढ़ाई छोड़ने वाले युवाओं की शिक्षा के लिए उन्होंने सदाकत आश्रम परिसर में विद्यापीठ कॉलेज की स्थापना की. अपने गांव के घर को उन्होंने एक मदरसे और एक मिडिल स्कूल की स्थापना के लिए दान दे दिया. 1930 में उनकी मृत्यु हो गयी, हालांकि मृत्यु से कुछ दिनों पूर्व उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था.

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