मैथिली का मचान दिल्ली में ही क्यों बनता है, पटना में क्यों नहीं?

खबर आ रही है कि दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला में मैथिली पुस्तकों, लेखकों और कलाचारों के जुटान के लिए ‘मैथिली मचान’ के नाम से एक स्टॉल बुक कराया गया है. इस खबर ने सहज ही पटना के मैथिली भाषियों के मन में इस कचोट को पैदा कर दिया कि यह मचान पटना पुस्तक मेला में क्यों नहीं बना. पटना जो बिहार की राजधानी है, वहां लगातार मैथिली का सम्मान घटता जा रहा है, जबकि देश की राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों लगातार मैथिली मजबूत हुई है. इस सवाल को लेकर पत्रकार आशीष झा ने एक पोस्ट लिखा था. उस पोस्ट को विस्तार देते हुए उन्होंने हमारे अनुरोध पर यह आलेख लिखा है. इन तीखे सवालों से गुजरे बिना पटना के मैथिलों के लिए कोई उपाय नहीं है.

आशीष झा

आशीष झा

दिल, दिल्ली दरभंगा…वैसे तो मैथिलों की इस बतकही में पटना का नाम नहीं आता है, लेकिन मेरे मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर मैथिली पटना के लिए इतनी नीरस क्यों हो गयी. जिस पटना में मैथिली दरभंगा और पूर्णिया से 50 के दशक में आकर संस्थागत हुई थी, वो आज पटना से दिल्ली क्यों भेजी जा रही है. आज इस सवाल को इस दलान पर एक मैथिली मचान बनने के कारण उठा रहा हूं. दिल्ली में सविता खान और अमित आनंद ने विश्व पुस्तक मेले में मैथिली मचान का निर्माण किया है. इस मचान पर मैथिली के छोटे प्रकाशक ही नहीं, बल्कि लेखक भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं. जबकि पिछले दिनों पटना पुस्तक मेले मे मैथिली के पुस्तकों का कोई मचान नहीं दिखा. मैथिली की खान तो पटना में भी है, लेकिन वो सविता खान नहीं है. मैथिली का अमित तो पटना में भी है, लेकिन वो अमित आनंद नहीं है.

नरेंद्र झा और रत्नेश्वर जैसे कई मैथिलों का पुस्तक मेला कार्यसमिति में दबदबा है, बावजूद इसके पटना में ऐसा एक मचान बनना मुश्किल है. इधर, मैथिली साहित्य मेला मतलब एमएलएफ भी पटना से दिल्ली स्थानांतरित हो रहा है. कला एंव संस्कृति विभाग के मुखिया तारानंद वियोगी और राजकुमार झा भी इसे नहीं रोक पाये. देखा जाये तो दिल्ली में मैथिली-भोजपुरी अकादमी ने पिछले एक वर्ष में जितने कार्यक्रमों को प्रायोजित किया है, उसका दसवां हिस्सा भी मैथिली अकादमी, पटना या कला एंव संस्कृति विभाग ने मैथिली के नाम पर पटना में प्रायोजित नहीं किया है.

साहित्य और कला मैथिली की पूंजी है. सांस्कृतिक गतिविधियों के मामले में पटना आज हैदराबाद और अहमदाबाद से भी पीछे चला गया है. 50 के दशक में बडे सपने के साथ पटना को मैथिली सांस्कृतिक आंदोलन का केंद्र बनाया गया था. चेतना समिति की स्थापना बाबा नार्गाजुन ने एक बडे उद्देश्य को लेकर की थी. विद्यापति की जो छवि आज पूरे विश्व में प्रचलित है वो पटना के चेतना समिति की ही देन है. विद्यापति समारोह कहां शुरु हुआ इसपर विवाद हो सकता है, लेकिन पूरे देश में इसे मैथिली सांस्कृति आयोजन का ब्रांड पटना ने ही बनाया.

70 के देशक में एक ओर जहां दरभंगा और पूर्णिया जैसे जगहों पर सांस्कृतिक गतिविधियां शिथिल होती जा रही थी, वहीं पटना इसका एक मजबूत केंद्र बन चुका था. विद्यापति पर्व समारोह की लोकप्रियता इतनी थी कि कंकडबाग और राजेंद्र नगर जैसे मोहल्लों से लोगों को हार्डिंग पार्क तक लाने के लिए बिहार राज्य पथ परिवहन निगम की बसें बुक होती थी. रवींद्र-महेंद्र और न जाने कितने नाम आज भी पटना के आयोजन को याद करते हुए याद आ रहे हैं. चेतना समिति के आलावा मैथिली साहित्य संस्थान, भंगिमा और अरिपन जैसी वो तमाम संस्थाएं जो सांस्कृतिक और साहित्यतिक गतिविधियों से पटना में मैथिली को रुचिगर और जीवंत कर रखी थी, धीरे-धीरे शिथिल होती गयी या फिर बंद हो गयी.

आज जहां पटना मैथिली को लेकर नीरस दिख रही है, वहीं दिल्ली 70 के दशक की तरह मैथिली का केंद्र बन चुका है. मैलोरंग जैसी संस्था पटना के भंगिमा और अरिपन की यादें ताजा कर रही हैं. साहित्य को लेकर ही दिल्ली में कई संस्थाएं सक्रिय हैं. मैथिली मंच अपनी 50वीं वर्षगांठ में महामहिम राष्ट्रपति को निमंत्रित किया है. दिल्ली में मैथिली को लेकर गतिविधियां हो रही हैं. कई संस्थाएं, कई प्रकार के आयोजन कर रहे हैं. नयी प्रतिभाएं सामने आ रही हैं.

क्या पटना के मैथिल खुद को चेतना समिति की तुच्छ राजनीति और देश के तमाम हिस्सों में हो रही गतिविधियों की आलोचना मात्र तक खुद को सीमित कर चुके हैं. आखिर क्या मामला है पटना के साथ. आखिर क्यों पटना में मैथिली अनाथ है. पटना के मैथिल इतने स्वार्थी क्यों है. गोविंद झा जैसे शताब्दी पुरुष खामोश क्यों हैं. अजित आजाद जैसे युवा पत्रकार कुछ लिखते क्यों नहीं हैं. नाटककार अरबिंद अक्कू और कथाकार अशोक की चुप्पी समझ के परे है. रमानंद झा रमन और शिवकुमार मिश्र जैसे मध्यमार्गी का शांत चेहरा हमें व्याकुल कर रहा है.

पुष्यमित्र और आशीष झा जैसे हिंदी के पत्रकार इस पर बात कर लेते हैं, लेकिन जिन पत्रकारों को मैथिली मंचों पर पाग और चादर थमाया जाता है, वो इस सवाल को क्यों नहीं उठाते. क्या मिथिला के लिए पटना इतनी दूर है, जितनी कभी दिल्ली दूर थी.

अंत में, पत्रकार मणिकांत ठाकुर की बातों से मैं खुद को जोडते हुए कहना चाहता हूं कि एक गिरोह ने मैथिली और मिथिला को पटना में प्रतिनिधित्व देने का ठेका ले रखा है. जो चेतना समिति कभी मैथिली-मिथिला के सांस्कृतिक उत्थान का जीवंत संवाहक दिखने लगी थी, उसे मृतप्राय मंच जैसी दु:स्थिति में पहुँचा देने वाले लोग कौन हैं, सब को पता है. ज़रूरत है, ऐसे तत्वों के ख़िलाफ़ एकजुट प्रतिरोध और पहले जैसी ‘चेतना’ की. और ऐसी पहल होगी ज़रूर. समय आ गया है.

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