मैथिली का अभिनव प्रयोग – पद्मश्री की कथाओं पर पद्मश्री के रंग

बिहार कवरेज

मैथिली की दुनिया में यह अभिनव प्रयोग होने जा रहा है. रामायण, महाभारत, पुराण और बोधिसत्व की कथाओं पर चित्रावलियां हमने आपने खूब देखी हैं. मगर किसी आधुनिक साहित्यिक कृति पर चित्रावलियां बनने की यह संभवतः पहली घटना है. अब यह खबर कंफर्म है, मैथिली की कथाकार पद्मश्री उषाकिऱण खान की दो कृतियों पर मिथिला पेंटिग की चित्रावलियां तैयार हो रही हैं और यह काम करने का बीड़ा चित्रकार पद्मश्री बौआ देवी और सहयोगी चित्रकारों ने उठाया है. नई दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला में सात जनवरी को इन चित्रावलियों का प्रदर्शन होगा और इस दौरान निरगुन नाम से आयोजित एक कार्यक्रम में इन दो कृतियों भामती और जाई सं पहिने पर मैथिली के कथाकार विमर्श करेंगे.

पद्मश्री बौआ देवी और पद्मश्री उषाकिरण खान

वैसे तो पिछले कई दिनों से यह चर्चा थी कि भामती उपन्यास पर मिथिला पेंटिंग की चित्रावलियां तैयार होंगी, मगर यह खबर पुष्ट नहीं हो पा रही थीं कि इसे करने वाले कौन कलाकार हैं. आज सेंटर फॉर स्टडीज ऑफ ट्रेडिशन एंज सिस्टम और दिल्ली सरकार की मैथिली-भोजपुरी अकादमी की तरह से मिले आमंत्रण के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि लेखिका उषाकिरण खान की दो कृतियों उपन्यास भामती और खंड काव्य जाइ सं पहिनै पर चित्रावलियां बनेंगी और उन पर निरगुन के नाम से विमर्श होगा. इस मौके पर इस साल के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उदय नारायण सिंह नचिकेता, विचारक श्रीश चौधरी, प्रो. डॉ. स्वाती पाल, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र से सदस्य-सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी और खुद पद्मश्री बौआ देवी उपस्थित रहेंगे.

इस आयोजन की संयोजक सविता झा खान बताती हैं कि हमलोगों की काफी दिनों से इच्छा थी कि उषा जी की किताबों को मिथिला पेंटिंग में उकेरा जाये. पहले भी हमने कुछ लोगों से संपर्क किया, मगर किसी वजह से वह काम आगे नहीं बढ़ पाया. अब संयोगवश इस काम के लिए हमें बौआ देवी जैसी कलाकार का साथ मिल गया है. इसके अलावा रानी झा, महालक्ष्मी कर्ण और अर्चना झा जैसी मिथिला पेंटिंग की चित्रकार इस परियोजना में भागीदारी कर रही हैं. काम शुरू है.

भामती उषाकिरण खान का मशहूर उपन्यास है जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है. यह किताब एक पौराणिक प्रेम कथा पर आधारित है, जिसमें एक विद्वान वाचस्पती मिश्र ने अपनी रचना का नाम अपनी पत्नी भामती के नाम पर रख दिया था. यह मिथिला के जन-जीवन में नारी के महत्व को भी दर्शाता है. इसके अलावा दूसरी पुस्तक जाय सं पहिने सीता के जीवन पर आधारित है. इस पुस्तक में सीता को सहस्त्र रावण को बध करने वाला बताया गया है.
इस खबर पर जब लेखिका उषाकिरण खान से बात की गयी तो उन्होंने कहा कि पहले कहीं नहीं सुना था कि उपन्यास और खंड काव्य जैसी मोटी पुस्तकों पर की भी चित्रात्मक प्रस्तुति की गयी है. इसलिए सुनकर, जानकर अच्छा लग रहा है. अब यह काम कैसा हुआ है, यह वहां जाकर-देखकर ही पता लगेगा.

मैथिली मचान का प्रयोग भी है अनुपम

इस बार के अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में मैथिली साहित्यिक पुस्तकों को लेकर एक और अनूठा प्रयोग हो रहा है. मैथिली मचान के नाम से एक स्टॉल लग रहा है, जहां मैथिली के तमाम लेखकों-प्रकाशकों से पुस्तकें मंगवायी गयी है कि वे अपनी किताबें इस स्टॉल पर बिक्री के लिए रख सकते हैं. देश की राजधानी में मैथिली की पुस्तकें कभी इस तरह पुस्तक मेले में नहीं पहुंच पायी थीं. और तो और पटना पुस्तक मेले में भी मैथिली-भोजपुरी की किताबों का कोई स्टॉल नहीं रहता. इस अभियान के पीछे भी सविता झा खान, उनके सहयोगी अमित आनंद और सेंटर फॉर स्टडीज ऑफ ट्रेडिशन एंज सिस्टम की भूमिका बतायी जा रही है.

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