14 साल बाद भी न स्कूली किताबों में मैथिली, न सरकारी विज्ञापनों में

आज से ठीक 14 साल पहले मैथिली भाषा को संविधान की अष्टम सूची में शामिल किये जाने का विधेयक पारित हुआ था और इसकी संवैधानिक मान्यता पर मुहर लग गयी थी. मगर इन चौदह सालों में इस मान्यता का मैथिली को कोई लाभ नहीं मिला. मैथिली न स्कूली किताबों में पहुंची, न सरकारी विज्ञापनों में. मैथिली भाषा के साथ बिहार सरकार के इसी उपेक्षापूर्ण व्यवहार को लेकर पत्रकार रोशन कुमार मैथिल ने यह तीखा आलेख लिखा है…

रोशन कुमार मैथिल

राम का वनवास तो 14 साल में खत्म हो गया था, मगर राजा जनक की पुत्री मैथिली(सीता का ही एक और नाम) को उस वनवास के बाद एक और वनवास भोगना पड़ा. यह कहानी सब को मालूम है, इसे दुहराने का कोई लाभ नहीं. हम सब इस कथा की विडंबना से परिचित हैं, फिर भी मैथिली की किस्मत बदलती नही. यही वजह है कि आज भी, संविधान की अष्टम सूची में शामिल होने के 14 साल भी मैथिली भाषा के रूप में वनवास ही भोग रही है. बिहार सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैये की वजह से जंगलों में दर-दर भटक रही है.

पत्रकार रोशन कुमार मैथिल

मैथिली भाषा का उल्लेख रामायण काल से ही मिलता है. कालांतर में कवि कोकिल विद्यापति ने मैथिली भाषा को अपना माध्यम बनाकर देसिल बयना सब जन मिट्ठा का नारा दिया. उनकी देखा-देखी भारत के अधिकांश भाग अर्थात असम, बंगाल,  उड़िसा,  राजस्थान सहित अन्य साहित्यकारों ने ब्रजबुली को अपनाया. इतना ही नहीं कवि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने इसी मैथिली(ब्रजबुली) भाषा में भानु सिंहेर पदावलीक रचना की. असम के शंकरदेव का अधिकांश साहित्य इसी ब्रजबुली में उपलब्ध है.

मैथिली भाषा का इतिहास भले स्वर्णिम रहा हो लेकिन इसका भविष्य अंधकारमय है. जिस भाषा को बड़े-बड़े साहित्यकारों ने अपनाया. जिस भाषा के कवि को ख्याति प्राप्त राजाओं ने अपने राज दरबार में स्थान दिया. उसी भाषा मैथिली को कभी स्वतंत्र भाषा मानने से भारत सरकार ने इंकार कर दिया था. परिणामस्वरूप मिथिला और मैथिली भाषी क्षेत्र का स्वरूप दिन पर दिन कमजोर होता गया. जिस भाषा का प्रयोग कभी बिहार के अधिकांश भागों में होता था वह आज कुछ जिलों में सिमटकर रह गई है.

मैथिली भाषा पर काम करते हुए प्रसिद्ध भाषाविद् सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑव इंडिया” ने इसे बिहार की प्रमुख भाषाओं में से एक माना. उनके अनुसार सीतामढ़ी, भागलपुर, मुंगेर, सहरसा, सुपौल, दरभंगा, मधुबनी, मधेपुरा, कटिहार, किशनगंज और पूर्णियां सहित आसपास के लोग मैथिली भाषा का प्रयोग करते हैं.

मैथिली साहित्य का अपना एक विशाल भंडार रहा है. संभवत: यह कारण है कि संविधान में मान्यता मिलने के बहुत पहले से साहित्य अकादेमी ने वर्ष 1966 में इस भाषा को अपनाया. समय बीतता गया सरकारी उपेक्षा के बाद भी मिथिला मैथिली समर्थक आंदोलन करते रहे. अंतत: वह दिन भी आया जब चौदह साल पहले वाजपेयी सरकार ने इस मैथिली भाषा को अष्टम अनुसूची में स्थान दिया.

कहने के लिए 23 दिसम्बर 2003 को भारतीय संविधान में शामिल कर लिया गया, लेकिन आज भी उसे उचित अधिकारों से वंचित रखा गया है. बिहार की एकमात्र संवैधानिक भाषा आज भी अपने अधिकारों के लिए दर-दर भटक रही है. अंगिका-बज्जिका के नाम पर दिन प्रतिदिन इसके क्षेत्र को छोटा किया जा रहा है. अंगिका अकेडमी को मान्यता देकर बिहार सरकार इसके अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा रही है. मैथिली बिहार की एकमात्र भाषा है जिसकी पढ़ाई बिहार के कुछ विश्वविद्यालयों में अलग-अलग नाम से होती है. कहीं पर मैथिल तो कहीं पर अंगिका के नाम पर. वह दिन दूर नहीं जब बज्जिका की भी पढ़ाई आरम्भ होगी.

भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त सभी भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा राज्य सरकार स्कूली स्तर पर बच्चों को देती है. लेकिन मैथिली में मातृभाषा मैथिली में पठन-पाठन तो दूर पूरे बिहार में एक विषय तक की पढ़ाई नहीं होती है. हां, यह बात अलग है कि उच्च शिक्षा बीपीएससी और यूपीएससी में कई छात्र इस भाषा को अपनाकर IAS-IPS अधिकारी बन रहे हैं.

राज्य सरकार की उपेक्षा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मिथिला क्षेत्र में आजतक सरकारी विज्ञापनों में मैथिली भाषा को स्थान नहीं दिया गया है. मैथिली पत्र-पत्रिकाओं को सरकारी विज्ञापन तक नहीं दिए जा रहे हैं. परिणाम स्वरूप मैथिली पत्र पत्रिका कुछ ही दिनों के बाद दम तोड़ दे रही है. तभी तो किसी ने कहा- 14 साल में खत्म हुआ था राम-सीता का वनवास, आज भी जंगल में है राजा जनक की मैथिली…

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