आप आज कानून बना रहे हैं, बिहार में 25 साल से दी जा रही है माहवारी की छुट्टी

बिहार कवरेज

अरुणाचल के सांसद निनोंग एरिंग ने लोक सभा में प्राइवेट बिल पेश कर पीरियड्स के दिनों में महिला कामगारों की छुट्टी को कानून बनाने की मांग की है. वे चाहते हैं कि पीरियड के दौरान देश भर की महिलाओं को महीने में दो दिनों का अवकाश मिले. इस बिल के बाद देश भर में इस प्रस्तावित बिल को लेकर सकारात्मक माहौल बनने लगा है. मगर क्या आप जानते हैं कि यह कानून बिहार में पिछले 25 साल से लागू है?

यह बड़ा दिलचस्प मामला है, जिस मसले पर देश आज बहस कर रहा है और माहवारी की वजह से परेशान होने वाली महिलाओं को राहत देने का विचार कर रहा है, वह काम आज से 25 साल पहले बिहार में बिना किसी बहस के हो गया था. और यह काम देश भर में जंगलराज के नाम से बदनाम लालू जी की सरकार ने ही किया था. जब वामदलों के संगठन अपनी विभिन्न मांगों के साथ इस मांग को लेकर भी राज्य सरकार के तत्कालीन मुखिया लालूजी के पास पहुंचे तो उन्होंने इस मांग पर बिना किसी बारगेनिंग के सहमति दे दी. तब से आज तक यह कानून बिहार में ज्यों का त्यों लागू है और यहां की महिलाएं हर माह इसका लाभ उठाती हैं. इतना ही नहीं झारखंड अलग होने के बाद वहां भी यह कानून उसी तरह लागू है.

पिछले साल जब कल्चर मशीन नाम की कंपनी ने अपनी महिला कर्मियों के लिए पीरियड के दौरान छुट्टी देने की घोषणा की थी और इसकी हर जगह तारीफ होने लगी, इसे ऐसा पहला प्रयास बताया गया तो वाम नेत्री कविता कृष्णन ने स्क्रॉल में एक लेख लिख कर बताया था कि बिहार में 25 सालों से महिलायें इस अवकाश का लाभ उठा रही हैं.

उन्होंने लिखा था,

क्या आप समझते हैं कि कल्चर मशीन का यह प्रयोग देश में चल नहीं सकता तो आपको यह जानकर हैरत होगी कि बिहार की सरकारी सेवा में कार्यरत महिला कर्मचारी 1992 से दो दिनों की पीरियड की छुट्टी का लाभ उठा रही हैं. बिहार के मानव संसाधन विभाग का गाइडलाइन बताता है-

बायोलॉजिकल कारणों से सभी महिला कर्मी हर माह दो दिनों का अवकाश लेने की हकदार हैं. यह उनके द्वारा लिये जाने वाले अन्य अवकाशों के अतिरिक्त होगा.

दो जनवरी, 1992 को जारी एक सरकारी आदेश में यह उद्धृत किया गया था कि विभिन्न कर्मचारी संगठनों की मांगों को देखते हुए उनके साथ यह समझौता किया गया कि सभी स्थायी सरकारी महिला कर्मचारियों को स्पेशल कैजुअल लीव के रूप में हर माह दो दिनों का एक साथ अवकाश दिया जाएगा.

इस कानून के बनने की कहानी पता करने के लिये कविता कृष्णन ने बिहार राज्य गैर-राजपत्रित कर्मचारी संगठन(गोप गुट) के महासचिव रामबली प्रसाद से बात की. उन्होंने बताया कि 1990 में हममें से कई लोगों ने बिहार के कई जिलों की यात्रा की थी. इस दौरान हमने कर्मचारियों से मुलाकात भी की. महिला कर्मचारियों ने उस वक़्त माहवारी के दौरान छुट्टी की जरूरत की मांग रखी थी.

1990 में जब हमने हड़ताल की तो इसे एक प्रमुख मांग के रूप में सरकार के सामने रखा. उस वक़्त मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बिना किसी हिचकिचाहट के इस मांग को मान लिया और कहा कि यह जायज मांग है. और आज यह सुविधा नियोजित शिक्षकों को भी मिल रही है.

कविता कृष्णन के अनुरोध पर बिहार में ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमन्स एसोसिएशन के महासचिव शशि यादव ने बिहार के विभिन्न जिलों में महिला कर्मचारियों से पूछा कि क्या उन्हें इस अवकाश का लाभ उठाने में कोई परेशानी भी होती है. सभी महिलाओं ने यही बताया कि वे नियमित तौर पर इस अवकाश का इस्तेमाल करती हैं, उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं हुई.

45 साल की उम्र तक यह अवकाश आसानी से मिलता रहता है, बाद में एक्सटेंशन लेना पड़ता है. वह भी आसानी से मिल जाता है.

इस बात से यह साबित होता है कि बिहार में यह अवकाश सहजता से महिलाओं को मिलता रहा है. दिलचस्प है कि यह कानून झारखंड राज्य में भी संभवतः ज्यों का त्यों लागू है. ऐसा हमारे परिचय की कुछ महिलाओं ने बताया है.

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