जानिये उन 36 बिहारियों को जिनके विचार गूंजते हैं हमारे संविधान में

आज गणतंत्र दिवस है. आज के ही दिन हमें हमारा संविधान मिला है. वह संविधान जो पिछले 68 सालों से हमारे देश में समानता और न्याय की भावनाओं को जिंदा रखे हुए है. जो हमारे देश में अब तक हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करता रहा है. हम जब इस संविधान के निर्माण की बात करते हैं तो डॉ. आंबेडकर और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे गिने-चुने नाम ही जुबां पर आते हैं. मगर इस संविधान को तैयार करने में 299 लोगों की एक बड़ी टीम थी, जिसे अलग-अलग राज्यों से चुनकर भेजा गया था. तत्कालीन बिहार जिसमें झारखंड में भी शामिल है, से इस टीम में 36 लोग शामिल थे. इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जिनका नाम भी हम आज नहीं जानते. जबकि संविधान तैयार करते वक्त एक-एक मसले पर इन लोगों ने जोरदार बहस की थी. खास कर दलितों और आदिवासियों के सवाल पर बिहार के इन संविधान निर्माताओं की बड़ी भूमिका रही है. आइये, जानते हैं बिहार के इन संविधान निर्माताओं को…

पुष्यमित्र

  1. कमलेश्वरी प्रसाद यादव

    कमलेश्वरी प्रसाद यादव- चतरा (मधेपुरा) के जमींदार राम लाल मंडल के पुत्र बाबू कमलेश्वरी प्रसाद यादव संविधान सभा के लिए खगडिया क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे. 1952 में वे उदा-किशनगंज क्षेत्र से विधायक बने, 1972 में वे दुबारा निर्वाचित हुए. 1902 के आसपास जन्मे बाबू कमलेश्वरी प्रसाद यादव की मृत्यु 15 नवम्बर, 1989 को हुई. वे पटना विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र और बीएचयू से हिंदी में डबल एमए थे. उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री भी प्राप्त की थी. उनके पुत्र अभय कुमार यादव पूर्व सचिव केपी महाविद्यालय मुरलीगंज आजीवन अभिषद बीएन मंडल विश्वविद्यालय के सदस्य भी है.

  2. बोनीफास लकड़ा- लोहरदगा के दोबा गांव में जन्मे बोनीफास लकड़ा (चार मार्च 1898 – आठ दिसंबर 1976) ने छोटानागपुर व संताल परगना (वर्तमान झारखंड) के आदिवासियों के लिए सुरक्षा प्रावधानों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी़. उन्होंने वकील के तौर पर अपना कैरियर शुरू किया था औऱ शोषित आदिवासियों को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ते रहे. उन्होंने संविधान सभा में छोटानागपुर प्रमंडल (रांची, हजारीबाग, पलामू, मानभूम, सिंहभूम) व संथाल परगना को मिला कर स्वायत्त क्षेत्र बनाने, इसे केंद्र शासित राज्य का दर्जा देने, सिर्फ आदिवासी कल्याण मंत्री की नियुक्ति, जनजातीय परामर्शदातृ परिषद (टीएसी) के गठन की समय सीमा तय करने, पांचवी अनुसूची क्षेत्र में सभी सरकारी नियुक्तियों पर टीएसी की सलाह व उसके अनुमोदन, विशेष कोष से अनुसूचित क्षेत्रों के समग्र विकास की योजनाएं लागू करने और झारखंडी संस्कृति की रक्षा की पुरजोर वकालत की थी़.
  3. तजामुल हुसैन

    तजामुल हुसैन- पटना में 19 दिसंबर, 1893 को पैदा हुए तजामुल हुसैन की पहचान एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में रही है, जो मोहम्मद अली जिन्ना का विरोध करने के कारण अक्सर कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते थे. इन्होंने अपनी पढ़ाई लंदन में की और लौट कर पटना में वकालत शुरू कर दी. पटना और मुजफ्फरपुर जिले में इन्होंने स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर के तौर पर भी काम किया था. 1935 में वे बिहार लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य चुने गये. संविधान सभा में रहते हुए इन्होंने वर्क, माइन और पावर कमिटी में अपने सुझाव दिये. वहीं रहते हुए उन्होंने भारत सरकार को सलाह दी थी कि अगर हैदराबाद रियासत भारत में मिलने के लिए तैयार नहीं है तो सरकार को सेना लेकर हैदराबाद पर धावा बोल देना चाहिए. बाद में सरकार ने इनकी सलाह पर अमल भी किया.

  4. अनुग्रह नारायण सिंह- इनके नाम के साथ बिहार विभूति का अलंकरण जुड़ा रहता है. 18 जून 1887 को वर्तमान औरंगाबाद जिले में जन्में अनुग्रह नारायण सिंह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे. इन्होंने चंपारण सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और बिहार विद्यापीठ में बतौर शिक्षक काम किया. आधुनिक बिहार के निर्माताओं में इनका नाम लिया जाता है. ये बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री थे. 1937 में बनी कांग्रेस की सरकार में भी उनकी भूमिका डिप्टी प्रीमियर की थी. संविधान सभा के तो वे महत्वपूर्ण सदस्य थे ही सेंट्रल लेजिस्लेटिव काउंसिल में भी 1923 से 1930 तक की अवधि में वे सक्रिय रहे. आजादी के बाद से 1957 तक वे लगातार बिहार सरकार में उप मुख्यमंत्री के रूप में विभिन्न जिम्मेदारियों को संभालते रहे. 1957 में उनका निधन हो गया.
  5. बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला

    बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला- भागलपुर वासी बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला का जन्म 12 अक्तूबर 1888 को हुआ था. इन्होंने एमए औऱ बीएल की पढाई की. 1946 में जब वे संविधान सभा के सदस्य चुने गये उस साल वे सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य भी थे. इसके बाद वे 1950 से 52 तक अंतरिम संसद के सदस्य थे. पहली औऱ दूसरी लोकसभा में उन्होंने भागलपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. 1966 में 78 साल की आयु में उनकी मृत्यु हो गयी.

  6. ब्रजेश्वर प्रसाद

    ब्रजेश्वर प्रसाद- 22 अक्तूबर, 1911 को गया में जन्मे ब्रजेश्वर प्रसाद के पिता का नाम राय वृंदावन प्रसाद था. इन्होंने एमए तक की पढ़ाई की थी. इनकी पत्नी का नाम संपूर्णा रानी था. संविधान सभा के सदस्य रहने के साथ-साथ उन्होंने अंतरिम संसद, पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा में गया का प्रतिनिधित्व किया. सात दिसंबर 1979 को उनकी मृत्यु हो गयी.

  7. चंद्रिका राम- दो जुलाई 1918 को सारण जिले के महुआवां गांव में जन्मे चंद्रिका राम की पहचान दलितों और वंचितों को उनका हक दिलाने वाले नेता के रूप में रही है. 1948-1964 तक वे बिहार स्टेट डिप्रेस्ड क्लासेज के अध्यक्ष रहे. इसके अलावा वे बिहार कृषक समाज समेत विभिन्न ट्रेड यूनियनों के सभापति भी रहे. ए प्लान फॉर हरिजन एंड अदर बैकवार्ड क्लासेज, रिमूवल ऑफ अनटचेबिलिटी, हाउ टू इंप्रूभ कंडीशन ऑफ बैकवार्ड क्लासेज और हाउ टू इंप्रूव एग्रीकल्चर जैसी कई महत्वपूर्ण किताबें चंद्रिका राम ने लिखी हैं. 16 फरवरी 1980 को उनका निधन हो गया.
  8. केटी शाह

    केटी शाह- समाजवादी नेता, गुजराती नाटककार औऱ लंदन स्कूल ऑफ इक़ॉनॉमिक्स के छात्र रह चुके केटी शाह बिहार से संविधान सभा में प्रतिनिधि के रूप में गये थे. ये जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 1938 में गठित नेशनल प्लानिंग कमिटी के सदस्य थे. उन्होंने संविधान सभा में रहते हुए दो बार सेकुलर, फेडरल और सोशलिस्ट शब्द को संविधान में शामिल कराने का प्रयास किया था, मगर डॉ. अंबेडकर द्वारा दोनों बार उनके प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था. उन्होंने भारत को राज्यों का संघ बनाये जाने का भी प्रस्ताव रखा था. आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति चुनाव में वे डॉ. राजेंद्र प्रसाद के खिलाफ मैदान में उतरे थे और उन्हें 15.3 फीसदी वोट मिले थे.

  9. देवेंद्रनाथ सामंतो- 1900 ई में जन्मे देवेंद्र नाथ सामंतो ने सिंहभूम जिले में सक्रिय रहते हुए भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. 1927, 1930 और 1933 में वे सिंहभूम जिले के नॉन मोहम्डन रूरल निर्वाचन क्षेत्र से बिहार एवं उड़ीसा विधान परिषद के सदस्य चुने गये. 1946 से 1950 तक वे बिहार लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य रहे. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. 1970 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. 21 नवंबर, 1988 को उनका चाईबासा में निधन हो गया.
  10. दीप नारायण सिंह

    दीप नारायण सिंह- मुजफ्फरपुर के पुरनटांड गांव में 25 नवंबर, 1894 को जन्मे दीप नारायण सिंह की पहचान बिहार के जाने-माने स्वतंत्रता सेनानियों और राजनेताओं में है. 1921 में उन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी के लिए शिक्षा विभाग की नौकरी छोड़ दी थी. इस दौरान वे पांच बार जेल गये. वे पहले बिहार एंड उड़िसा लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य रहे, फिर बिहार लेजिस्लेटिव काउंसिल के. आजादी के बाद वे राज्य सरकार में मंत्री बने. श्रीकृष्ण सिंह के निधन के बाद वे 18 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री भी बने. 1963 तक वे बिहार सरकार में विभिन्न मंत्रालयों को संभालते रहे. सात दिसंबर 1977 को उनका हाजीपुर में निधन हो गया.

  11. जगत नारायण लाल- शाहाबाद जिले के आंखगांव ग्राम में जगत नारायण लाल का जन्म 31 जुलाई 1896 को हुआ था. पढ़ाई-लिखाई के बाद वे वकालत के पेशे से जुड़ गये, मगर 1920 के असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए इन्होंने इस पेशे को तिलांजलि दे दी. 1921 से 1944 के बीच इन्हें कई बार जेल भेजा गया. राजनीति में वे डॉ. राजेंद्र प्रसाद औऱ मदन मोहन मालवीय के अनुयायी थे. असहयोग आंदोलन के बाद इन्होंने बिहार विद्यापीठ में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दीं. 1937 को गठित पहली कांग्रेस सरकार में इन्हें पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाया गया. आजादी के बाद पहली विधानसभा में ये उपाध्यक्ष बनाये गये और 1952 तक इस पद पर बने रहे.
  12. जगजीवन राम

    जगजीवन राम- बाबूजी के नाम से जाने-जाने वाले जगजीवन राम प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता रहे हैं. वे आजाद भारत की पहली सरकार में देश के सबसे युवा मंत्री के रूप में चयनित हुए, बाद में देश के उप प्रधानमंत्री भी बने. पांच अप्रैल 1908 को इनका जन्म तत्कालीन भोजपुर जिले के चंदवा गांव में हुआ था.1928 में कोलकाता में जब इन्होंने एक विशाल श्रमिक रैली का आयोजन किया था तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इनकी राजनीतिक प्रतिभा को पहचाना और बढ़ावा दिया. वे ताउम्र दलितों को अधिकार दिलाने के लिए संघर्षरत रहे. संसद, संविधान सभा और सरकार में रहते हुए वे ताउम्र वे इसके लिए प्रयास करते रहे. 28 जुलाई 1979 को इनकी मृत्यु हो गयी. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार इनकी पुत्री हैं.

  13. जयपाल सिंह मुंडा

    जयपाल सिंह मुंडा- तीन जनवरी, 1903 को रांची में जन्मे जयपाल सिंह मुंडा एक मशहूर हॉकी खिलाड़ी, एक बेहतरीन लेखक और आदिवासियों के लिए संघर्ष करने वाले एक जानेमाने राजनेता था. इनका जन्म पाहन टोली गांव में हुआ था, जो आज खूंटी जिले में पड़ता है. संविधान सभा में आदिवासियों के हक के लिए ये काफी मुखर रहे. इन्होंने 1938 में आदिवासी महासभा की स्थापना की थी. 1928 के ओलिंपिक मुकाबले में इन्होंने भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की थी. इस दौरान टीम ने 17 में से 16 मुकाबले जीते. इन्हें मोरंग गोमके के नाम से भी पुकारा जाता है. 20 मार्च, 1970 को रांची में इनका निधन हो गया.

  14. कामेश्वर सिंह

    कामेश्वर सिंह- 28 नवंबर 1907 को दरभंगा में जन्मे कामेश्वर सिंह को दरभंगा राज घराने का आखिरी उत्तराधिकारी माना जाता है. वे एक सक्रिय राजनेता, एक उद्योगपति और समाजसेवी थे. उन्होंने दो बार गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी की. बीएचयू समेत कई प्रमुख शिक्षण संस्थानों की स्थापना में और उनकी बेहतरी के लिए मदद करने में उनकी भूमिका रही है. उनका परिवार देश के सबसे बड़े और समृद्ध जमींदारों में से एक था. उन्होंने इस धनराशि का इस्तेमाल बिहार और आसपास के इलाके में उद्योगों के विकास में लगाया. झारखंड पार्टी की तरफ से वे दो बार राज्य सभा भेजे गये. 1962 में इनका निधन हो गया.

  15. महेश प्रसाद सिंहा- सकरा, मुजफ्फरपुर विधानसभा का प्रतिनिधित्व करने वाले महेश प्रसाद सिंहा का जन्म आठ जून, 1901 को हुआ. छात्र जीवन से ही ये स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गये और 1920 में इन्ही वजहों से इन्हें मुंगेर में गिरफ्तार कर लिया गया था. इसके बाद इन्हें तीन बार जेल जाना पड़ा. आजादी के पहले से ही ये बिहार विधानसभा के सदस्य चुने जाते रहे हैं. आजाद भारत में बिहार सरकार में इन्होंने कई मंत्रालयों में योगदान दिया. इन्होंने कई शिक्षण संस्थानों की स्थापना की. 1956-62 तक ये बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग परिषद के अध्यक्ष रहे. संविधान सभा में इन्होंने महती भूमिका निभायी.
  16. कृष्ण बल्लभ सहाय

    कृष्ण बल्लभ सहाय- बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय का जन्म पटना जिले के शेखपुरा में 31 दिसंबर, 1898 में हुआ. अंगरेज सरकार में दरोगा की नौकरी करने वाले पिता के पुत्र केबी सहाय 1920 से ही स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गये थे. वे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चार बार जेल गये. 1937 में वे बिहार लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य चुने गये. आजाद भारत में वे लंबे समय तक बिहार के रेवेन्यू मिनिस्टर रहे. दो अक्तूबर, 1963 को इन्हें बिहार का चौथा मुख्यमंत्री बनने का अवसर प्राप्त हुआ, वे 1967 तक इस पद पर रहे. तीन जून, 1974 को हजारीबाग में इनका निधन हो गया.

  17. डॉ. राजेंद्र प्रसाद

    डॉ. राजेंद्र प्रसाद- राजेंद्र बाबू का परिचय बिहार के लोगों को देना अनावश्यक है. देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के भी अध्यक्ष थे. सीवान जिले के जीरादेई गांव में तीन दिसंबर 1884 में जन्मे राजेंद्र बाबू एक मेधावी छात्र, एक सफल वकील थे. चंपारण सत्याग्रह के दौरान वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े फिर वे बिहार की राजनीति, देश के आंदोलन और गांधी के सान्निध्य से कभी अलग नहीं हो पाये. वे बारह साल तक देश के राष्ट्रपति रहे. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित कई किताबें लिखी हैं. बिहार विद्यापीठ जैसी संस्था के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसने कई स्वतंत्रता सेनानियों को एक मंच दिया. संविधान निर्माण में उनकी महती भूमिका सर्वविदित है. 28 फरवरी, 1963 को पटना में उनका निधन हो गया.

  18. रामेश्वर प्रसाद सिंह- वैशाली से संविधान सभा के लिए निर्वाचित रामेश्वर प्रसाद सिंह एक का जन्म एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ. उनके पिता राय अवध बिहारी सिंह थे. उन्होंने कानून की पढ़ाई की और वकालत के पेशे से जुड़ गये. मगर 1921 में उन्होंने यह पेशा छोड़ दिया और आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये. वे बिहार लेजिस्लेटिव असेम्बली के सदस्य भी रह चुके हैं. उनकी पुत्री किशोरी सिंहा दो दफा लोकसभा सदस्य रह चुकी हैं, जिनका विवाह सत्येंद्र नारायण सिंहा से हुआ था.
  19. राम नारायण सिंह

    रामनारायण सिंह- हजारीबाग के स्वतंत्रता सेनानी रामनारायण सिंह ने भी संविधान सभा में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. खास कर पंचायती राज के मसले पर उन्होंने प्रमुखता से अपनी बात रखी थी. बाद में वे पहली लोकसभा के सदस्य भी बने. चतरा के स्वतंत्रता सेनानियों में रामनारायण सिंह और उनके भाई सुखलाल सिंह का नाम आता है. 1920-21 में असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्हें जेल जाना पड़ा. भारत छोड़ो आंदोलन तक वे लगातार सक्रिय रहे. उन्हें छोटानागपुर केसरी भी कहा जाता था. संसद में झारखंड के लिए पहली आवाज उठाने वालों में उनका नाम लिया जाता है.

  20. सच्चिदानंद सिंहा

    डॉ. सच्चिदानंद सिंहा- सच्चिदानंद सिंहा का परिचय हर बिहारी को जानना ही चाहिए, क्योंकि बिहार को स्वतंत्र राज्य बनाने में उनकी सबसे बड़ी भूमिका रही है. वे संविधान सभा के पहले सदस्य थे, मगर तबीयत ठीक नहीं रहने के कारण वे इस भूमिका को निभा नहीं सके. लिहाजा डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष बनाया गया. 10 नवंबर 1871 को बक्सर ज़िले के चौंगाईं प्रखण्ड के मुरार गांव में जन्मे सच्चिदानंद सिंहा ने बिहार को स्वतंत्र राज्य बनवाने के अतिरिक्त पत्रकारिता की एक परंपरा को भी जन्म दिया. द बिहार हेराल्ड, बिहारी और बाद में सर्चलाइट जैसे अखबारों का प्रकाशक कर उन्होंने बिहार की पत्रकारिता को एक मजबूत आधार दिया. 1910 के चुनाव में चार महाराजों को हरा कर सच्चिदानन्द सिन्हा इंपीरियल विधान परिषद में बंगाल कोटे से चुने गये. वे 1910 से 1920 तक इस पद पर रहे. फिर 1921 में केन्द्रीय विधान परिषद के मेम्बर के साथ इस परिषद के उपाध्यक्ष भी रहे. संविधान बनने के बाद इसकी प्रतियां उनके हस्ताक्षर के लिए 14 फरवरी 1950 को पटना लायी गयी. उसी साल मार्च में उनका देहावसान हो गया.

  21. सारंगधर सिंहा- 1901 में जन्मे सारंगधर सिन्हा ने पहली और दूसरी लोकसभा में पटना लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया था. उन्होंने पटना, मुजफ्फरपुर और कोलकाता में पढ़ाई की. बिहार लेजिस्लेटिव असेंबली के भी सदस्य थे. शिक्षा, वित्त, जेल सुधार, हिंदी कमेटी और हरिजन कमेटी में रहते हुए उन्होंने संसद को कई सुझाव दिये. वे पटना और रांची विवि के वीसी रह चुके थे. पटना के मशहूर खड़गविलास प्रेस के संचालन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उन्होंने उच्चशिक्षा से संबंधित सुधारों के लिए कई देशों की यात्राएं कीं.
  22. सत्यनारायण सिंहा

    सत्यनारायण सिंहा- सत्य नारायण सिन्हा का जन्म 9 जुलाई, 1900 को दरभंगा ज़िले में ‘शम्भूपट्टी’ में हुआ था. 1920 में वे स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित हुए. 1926-1930 तक इन्हें बिहार लेजिस्लेटिव कौंसिल का सदस्य बनाया गया. 1934 और 1945 में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य निर्वाचित हुए थे. वे 1948-1952 के बीच संसदीय कार्य के राज्य मंत्री रहे. उन्होंने पहली से चौथी लोकसभा तक में दरभंगा और समस्तीपुर का प्रतिनिधित्व किया. उ्नहोंने केंद्र सरकार में संसदीय कार्य, सूचना तथा प्रसारण मंत्री, स्वास्थ्य परिवार नियोजन तथा नगरीय विकास मंत्री का पद संभाला. 9 मार्च, 1971 से 12 अक्टूबर, 1977 तक वे मध्य प्रदेश के राज्यपाल भी रहे.

  23. बिनोदानंद झा

    बिनोदानंद झा- 17 अप्रैल, 1900 को जन्मे बिनोदानंद झा देवघर के रहने वाले थे. वे 1961-1963 के बीच बिहार के मुख्यमंत्री रहे. उन्होंने लोकसभा में दरभंगा का प्रतिनिधित्व किया था. स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्हें पांच बार जेल जाना पड़ा. किसानों के मसले पर और संताल परगना के सवाल पर वे लगातार सक्रिय रहे. 1937 से ही वे बिहार लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य रहे. बिहार राज्य की सरकार में समय-समय पर विभिन्न मंत्रालयों को संभाला.

  24. श्रीकृष्ण सिंह

    श्रीकृष्ण सिंह- बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह को बिहार केसरी के नाम से भी जाना जाता है. अगर द्वितीय विश्वयुद्ध की अवधि को छोड़ दिया जाये तो 1937 से लेकर 1961 तक वे लगातार बिहार के मुख्यमंत्री बने रहे. उनके मित्र अनुग्रह नारायण सिंह लिखते हैं कि 1921 के बाद से बिहार का इतिहास श्री बाबू का इतिहास रहा है. वे आधुनिक बिहार के निर्माता भी कहे जाते रहे हैं. 21 अक्तूबर, 1887 को नवादा जिले के खनवा में जन्मे श्रीकृष्ण सिंह का पैतृक गांव मौजूदा शेखपुरा जिले में पड़ता है. 1921 से ही उन्होंने लगातार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बिहार का नेतृत्व किया. आजादी के बाद बिहार के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. 31 जनवरी, 1961 को उनका निधन हो गया.

  25. श्याम नंदन सहाय

    श्यामनंदन सहाय- एक जनवरी, 1900 को जन्मे श्यामनंदन सहाय को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर विवि, मुजफ्फरपुर के पहले कुलपति के रूप में याद किया जाता है. वे 1930-37 तक बिहार लेजिस्लेटिव कैंसिल के मेंबर रहे. संविधान सभा के सदस्य रहने के अतिरिक्त इन्होंने पहली औऱ दूसरी लोक सभा में मुजफ्फरपुर का प्रतिनिधित्व किया गया. 1957 में इन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. इसी साल इनका निधन भी हो गया. मुजफ्फरपुर इन्हें एक शिक्षाविद के रूप में याद करता है.

  26. हुसैन इमाम- हुसैन इमाम ने संविधान सभा में बिहार का प्रतिनिधित्व किया था. इनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलता. कुछ अपुष्ट जानकारियों के मुताबिक ये जिन्ना के करीबी मित्रों में से थे. पाकिस्तान बनने के बाद वे वहीं चले गये. वहां पाकिस्तान मुसलिम लीग पार्टी की स्थापना में इनकी महती भूमिका बतायी जाती है. कुछ सूत्र उन्हें बिहार प्रोविंसियल मुसलिम लीग का अध्यक्ष भी बताते हैं. हालांकि यह जानकारी सौ फीसदी सच हो यह कहना मुश्किल है.
  27. सैयद जफर इमाम

    सैयद जफर इमाम- सैयद जफर इमाम पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं. पटना के नेउरा गांव में 18 अप्रैल 1900 को जन्मे जफर इमाम ने उच्च शिक्षा ब्रिटेन में हासिल की. 1922 में वे बैरिस्टर बनकर बिहार लौटे और पटना हाईकोर्ट में वकालत करने लगे. 1943 से 1953 तक वे पटना हाईकोर्ट के जस्टिस रहे फिर उन्हें यहां का चीफ जस्टिस बना दिया गया. वे पटना हाईकोर्ट के पहले भारतीय चीफ जस्टिस थे. इसी दौरान उन्होंने संविधान सभा में प्रतिनिधित्व किया. 1955 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस बनाया गया.

  28. लतिफुर रहमान- सरदार मोहम्मद लतिफुर रहमान का जन्म 24 दिसंबर, 1900 को औरंगाबाद के नगमतिया गांव में हुआ था. उन्होंने शुरुआती पढ़ाई गया और हजारीबाग में की और फिर खिलाफत आंदोलन में शामिल हो गये. इसके बाद वे मौलाना मजहरूल हक द्वारा संपादित अखबार द मदरलैंड से जुड़ गये और सहायक संपादक के रूप में काम करने लगे. हक साहब के इंतकाल के बाद वे इस अखबार के प्रबंध निदेशक बन गये. इसके बाद वे 1937 में मुसलिम लीग से जुड़ गये. शुरुआत से ही वे बिहार लेजिस्लेटिव कौंसिल में गया का प्रतिनिधित्व करते थे. बाद में वे मुसलिम लीग से चुने जाने लगे. संविधान सभा में उन्हें बिहार के मुसलिम प्रतिनिधि के रूप में भेजा गया.
  29. मो. ताहिर

    मोहम्मद ताहिर- 1903 में पूर्णिया के मझगांव में पैदा हुए मोहम्मद ताहिर पहले मुसलिम लीग के नेता था, बाद में कांग्रेस से जुड़ गये. इन्होंने शुरुआती पढ़ाई पूर्णिया में की, फिर उच्चशिक्षा के लिए अलीगढ़ मुसलिम विवि चले गये. कानून की पढ़ाई के बाद इन्होंने वकालत शुरू कर दी, फिर राजनीति से जुड़कर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चेयरमैन बन गये. ये तीन बार बिहार लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य चुने गये. संविधान सभा में जाने के बाद भी ये दो बार लोकसभा सदस्य चयनित हुए. एक बार पूर्णिया से, एक बार किशनगंज से. इन्होंने कई शिक्षण संस्थाओं की शुरुआत की.

  30. श्री नारायण महथा- श्रीनारायण महथा का जन्म मुजफ्फरपुर के जमीन्दार परिवार में 11 जून, 1901 को हुआ था. 1926 में महज 25 साल की छोटी उम्र में वे मुजफ्फरपुर के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के लिए चुने गये. 1945 तक लगभग दो दशकों तक उन्होंने डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के जरिये वायस चेयरमैन और चेयरमैन के रूप में मुजफ्फरपुर में विकास का काम किया. 1930 से 37 तक वे बिहार लेजिस्लेटिव कौंसिल में भी रहे. 1942 में कौंसिल ऑफ स्टेट में इनका भाषण इतना शानदार था कि अचानक ये पूरे देश में जाने-जाने लगे. फिर कांग्रेस के टिकट पर संविधान सभा में गये. वहां से विजयालक्ष्मी पंडित के नेतृत्व में एक डेलिगेशन युनाइटेड स्टेट्स गया, उसमें वे भी थे. फिर वे संसद सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभाने लगे. इसके अलावा कई और क्षेत्रों में भी इन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई है.
  31. बाबू गुप्तनाथ सिंह- कैमूर जिले के चैनपुर विधानसभा के पहले विधायक बाबू गुप्तनाथ सिंह की पहचान उनकी किताब कुरमी जमात का इतिहास की वजह से है. 17 जनवरी, 1900 को कैमूर के सिरहीरा गांव में जन्मे बाबू गुप्तनाथ सिंह को उनके इलाके के लोग बड़े प्यार से याद करते हैं. उन्होंने काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास की. आगे की पढ़ाई छोड़कर वे सत्याग्रह में शामिल हो गये. बाद में आर्य कन्या विद्यालय, बड़ौदा में शिक्षक बन गए. वहीं पर वल्लभभाई पटेल के निकट संपर्क में आए. फिर नौकरी छोड़कर भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हो गये बनारस में रहकर स्वाध्याय, लेखन और संपादन कार्य करते हुए ‘सात्त्विक जीवन’ पत्रिका का संपादन किया. संविधान सभा में बिहार से एक सदस्य के रूप में शामिल किए गए.
  32. अमिय कुमार घोष- स्वतंत्रता सेनानी अमिय कुमार घोष डॉल्टनगंज के रहने वाले थे और वहां के पहले विधायक थे. वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नजदीकी रहे हैं. डॉल्टनगंज में उनके आवास सेवा सदन पर नेताजी ठहरा करते थे.
  33. पी के सेन- बैरिस्टर पीके सेन का पूरा नाम प्रशांतो कुमार सेन था. आज जहां पटना तारामंडल है वहीं सहाय सदन के नाम से इनका आवास था. वे पटना हाई कोर्ट में वकालत करते थे और इमाम बंधु हसन इमाम और अली इमाम के मित्र थे. वे ब्रह्म समाज के अनुयायी थे और उन्होंने इससे संबंधित किताबें भी लिखी हैं. उनकी पत्नी सुषमा सेन ने बिहार में परदा प्रथा को खत्म करने का अभियान चलाया था. पीके सेन बाद में मयूरभंज इस्टेट के दीवान बन गये.
  34. भागवत प्रसाद- मुंगेर के धरहरा के सुंदरपुर गांव के निवासी भागवत प्रसाद अपने इलाके के जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी थे. वे आजादी की लड़ाई में भाग लेते हुए कई बार जेल गये. कांग्रेस पार्टी के नेता भागवत प्रसाद बाद में सूर्यगढ़ा, लखीसराय-बड़हिया विधानसभा के एमएलए बने और इसके बाद वे एमएलसी भी रहे. संविधान सभा में इन्हें भेजा गया था.
  35. जदुबंस सहाय- जदुबंस सहाय डॉल्टनगंज के अग्रिम पंक्ति के स्वतंत्रता सेनानियों में से थे. भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त में वे काफी सक्रिय थे. उस वक्त उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी. बाद में वे संविधान सभा के सदस्य के रूप में संसद पहुंचे. जहां उन्होंने कई विषयों पर काफी गंभीर बहस की और अपनी राय रखी.
  36. रघुनंदन प्रसाद- ये बिहार में दलितों केे लिये संघर्ष करने वाले प्रमुख नेेेेताओं में से एक थे. जगजीवन राम द्वारा स्थापित डिप्रेस्ड क्लास लीग से वे स्थापना काल से ही जुड़े थे. बाद में 1937 में बिहार प्रदेश दलित वर्ग संघ के सचिव बनाये गए. 1937 में ही वे मुंगेर सुरक्षित क्षेत्र से विधायक चुने गए. उन्होंने दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और अत्याचार का विरोध करने के लिये दलित मित्र नामक पत्रिका का प्रकाशन भी किया.

Spread the love

Related posts