खिजरसराय के गांवों में मुम्बइया पूजा ने न जाने कितने फूल खिला रखे हैं

निराला जी पिछले दिनों खिजरसराय के कुछ गांवों की यात्रा पर थे. वहां उनकी मुलाकात एक मुम्बइया लड़की पूजा से हुई जो मध्य बिहार के इस ठेठ देहात में स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों में सकारात्मक बदलाव लाने में जुटी थी. उनके मन में सहज सवाल था कि एक महानगर की यह लड़की बिहार के गांवों में कैसे रह रही है और कैसे उसने यह सब मुमकिन किया. इन्हीं बातों का जवाब इस रिपोर्ताज में है.

निराला बिदेसिया

पूजा से पहले कभी आमने-सामने की कोई बात-मुलाकात नहीं थी. सिर्फ एक दफा की फोन पर बात थी. फोन पर ही वह कहती है कि आइये तो सही आप खिजरसराय, आपको ले चलेंगे कुछ खास जगहों पर. आपको अच्छा लगेगा. पता चलेगा कि समाज अपना फर्ज निभाना शुरू करता है, तो चीजें कैसे बदलती हैं. पूजा के कहने पर खिजरसराय के प्रति एक आकर्षण तो बना ही था, लेकिन उससे भी ज्यादा दिलचस्पी इस बात में थी कि एक बार पूजा से मिलते हैं. उस लड़की से जिसकी अभी उम्र भी ज्यादा नहीं, खांटी बम्बईया है, बड़े संस्थान से मैनेजमेंट की पढ़ाई की है और फिर वह कैसे बिहार के एक सुदूर-गुमनाम इलाके में चूपचाप खामोशी से काम करने चली आयी. और फिर आयी तो वह कर क्या रही है?

निराला

खेतों के रास्ते पूजा के ऑफिस में पहुंचे. एक छोटा-सा कमरा था. पूजा से पूछा कि मुंबईवाली होकर यहां इस वीराने में, बिहार के सुदूर इलाके में काम कर रही हैं, मन लगता है? आने से पहले हिचक नहीं हुई? बिहार के बारे में तो इतनी सारी बातें कही जाती हैं. पूजा कहती हैं कि मैं मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के बाद जब अपने घर में प्रस्ताव रखा कि बिहार काम करने जाउंगी तो मेरे घरवाले तो यह कहें कि अच्छा पहले तेरे सर से बात करेंगे. लेकिन जो पड़ोस में रहनेवाले बिहारी अंकल-आंटी थे, उन्होंने एक सुर में कहना शुरू किया कि बिहार जाएगी? बिहार जानेवाली जगह नहीं. रहनेवाला इलाक नहीं. गंदा है बिहार, बहुत गंदा. नक्सली रहता है.

पूजा कहती है कि बिहार को आपके बिहारी ही बाहर बदनाम करते हैं, हमारे पिता ने तो पड़ोसी बिहारियों की बात नहीं मानी. मेरे टीचर ने सलाह दी, उन्होंने हामी भर दी. मैं जीवन में पहली बार बिहारं चली आयी. जागृति ग्रामीण विकास समिति से जुड़ने, जो सेव द चिल्ड्रेन जैसी संस्था के साथ मिलकर काम करता है. पूजा इसके बाद ज्यादा बात अपने बारे में बात नहीं करती. वह अपने साथ लेकर पंचरूखी गांव चली जाती हैं. खिजरसराय से कुछ ही दूरी पर बसाहट है इस गांव की.

बिहार के हजारों गांव की तरह ही एक गांव. अपनी मुश्किलों, दुस्सवारियों और चुनौतियों से जूझता हुआ गांव. वहां पुरवाराटोला के एक आंगनबाड़ी में लेकर जाती हैं पूजा. रास्ते में ही जाते समय बताती है कि आंगनबाड़ी चल रहे हैं हमलोग. उस आंगनबाड़ी में पहुंचने पर 20 से ज्यादा छोटे-छोटे बच्चे बैठे होते हैं और दस के करीब महिलाएं एक साथ सक्रिय दिखती हैं. आंगनबाड़ी की सेविका बीना देवी, उनकी बेटी, रेखा देवी, रंजू देवी, उर्मिला देवी, सुषमा देवी, मीना देवी, रंजू देवी, सोनी देवी जैसी कई महिलाएं एक साथ उन 20 बच्चों के साथ सक्रिय रहती हैं. कोई खेल खेलने में. कोई गीत गाने और गवाने में. कोई बच्चों संग खेलने में, रंग भरने में.

उस आंगनबाड़ी में हम बिना किसी पूर्व सूचना के पहुंचे थे. दिन के करीब 11 बजे. मालूम चलता है कि ये महिलाएं उन बच्चों की मां हैं, जो बच्चे आंगनबाड़ी में आते हैं. सब मजदूर, गरीब घर की महिलाएं. सब अपने घर का काम निपटाकर रोजाना समय मिलते ही आंगनबाड़ी आती हैं और अपना पूरा समय बच्चों के संग बिताती हैं. उनके समय बिताने का असर भी साफ दिखता है. छोटे-छोटे गंवई बच्चे इतने सलीके से बैठे होते हैं, आत्मविश्वास से गीत गाते हैं, कविता सुनाते हैं, सामूहिक पाठ करते हैं, इतने अनुशासनबद्ध दिखते हैं और रंगों से खेलते हुए अपनी कलाबाजियां दिखाते हैं.

उन्हें देख कई बार लगता है कि शहर के प्ले स्कूल से स्मार्टनेस में, कला में, आत्मविश्वास में, अनुशासन में और सिखने की प्रवृत्ति में कहां से ये कम हैं. उससे भी ज्यादा अवाक और भौंचक रहते हैं उन महिलाओं के हावभाव, उनकी सक्रियता, उनकी तल्लीनता देखकर जो उन बच्चों संग खेल रही होती हैं, गा रही होती हैं, रंग भर रही होती हैं. पूजा बताती हैं कि यहां ऐसा रोज होता है. यह इतना आसान नहीं था.

यह भी और आंगनबाड़ियों की तरह ही था, जिसके बारे में आपके जेहन में भी यह धारणा होगी कि वहां एक सेविका रहती है, सरकार का पैसा आता है, पोषाहार आता है, स्टाईपेंड आता है, सबका बंदरबांट होता है, खानापूर्ति होती है आदि-आदि. सब धारणा यहां के बारे में भी थी लेकिन शीतल ने पिछले एक साल में सब बदल दिया है. सिर्फ यहीं नहीं, ऐसे ही कई केंद्रों पर.

पूजा अभी शीतल के बारे में बता ही रही होती हैं कि शीतल वहां आ जाती हैं. शीतल का वहां कमरे में प्रवेश भर करना होता है कि सारा माहौल बदल जाता है. बात करने की स्थिति नहीं रह जाती कुछ देर तक. जो बच्चे बैठे होते हैं, वे तेजी से शीतल नाम की उस लड़की को ‘जय-जगत, जय-जगत’ का अभिवादनी नारा लगाते हुए घेरने लगते हैं, उससे लिपटने लगते हैं. दीदी आ गयी, दीदी आ गयी… यह दृश्य हैरत में डालनेवाला होता है. सबकुछ कल्पना से परे. कुछ देर तक हम बात नहीं कर पाते कि आखिर यह कौन सी तकनीक है, क्या किया गया ऐसा कि एक आंगनबाड़ी शहर के किसी प्ले स्कूल से ज्यादा सक्रिय दिख रहा है.

पूजा कहती है कि अब हमलोग 15 मिनट बात नहीं कर पायेंगे, जब तक कि शीतल जी भर के बच्चों संग खेल ना ले, खेला न दे, गीत ना गा ले साथ में, गवा न दे. शीतल आते ही बच्चों के संग कमरे में अंदर खेलने लगती है, हम सब बाहर निकल जाते हैं. वहां की आंगनबाड़ी सेविका बीना देवी और उनकी सहेली रेखा देवी कहती हैं- हमारे यहां ही नहीं, आप इनलोगों के संग इधर खिजरसराय के 50 स्कूल, आंगनबाड़ी में जाइये, पूजा, शीतल जैसी अजनबी दीदियों ने कमाल- धमाल कर रखा है. हर इलाके में एक शीतल है, जो इसी तरह का बदलाव कर रही हैं.

आंगनबाड़ी सेविका बीना देवी कहती हैं- यह हमारा रोज का काम है. यहां की महिलाएं अपने बच्चों को प्ले स्कूल में नहीं भेज सकती तो हम आंगनबाड़ी को ही प्ले स्कूल बना देना चाहते हैं. हमने 20 महिलाओं का ग्रुप बनाया है. कम्युनिटी रीडिंग प्रोसेस चलता है यहां. हमलोग तो महिलाएं हैं, यहां तो मेहनत मजूरी से फुर्सत मिलता है तो पिता भी अपने बच्चों के साथ खेलते हैं, पढ़ने की कोशिश करते हैं. पचरुखी में जाकर यह सब बिल्कुल नया अनुभव होता है.

इस बीच शीतल बच्चों के संग 20 मिनट लगातार खेलकर, गीत गाकर फ्री हो चुकी होती हैं. चेहरे पर थकान की बजाय मुस्कुराहट का भाव रहता है. कहती हैं कि हमलोग तो कुछ नही कर रहे. यह सब गांव वालों के सहयोग से सम्भव हो पा रहा है. ग्रामीणों में बस शिक्षा की भूख जगायी गयी है, उसका महत्व समझाया गया है और यह बताया गया है कि शिक्षा सिर्फ सरकार का दायित्व नही है. अगर अपने सपने को साकार करना है, बच्चे का भविष्य बेहतर बनाना है तो अभिभावक को भी अपना दायित्व निभाना होगा, समाज को भी लगना होगा.

शीतल कहती हैं कि बस इतनी सी बात हम समझाने में सफल हो गये तो फिर सब आसान होता गया. आगे की बात पूजा बताती हैं. कहती हैं, इतनी सी बात समझाने को ही मूल आधार बनाकर हम खिजरसराय जैसे छोटे प्रखंड के 50 आंगनबाड़ी और स्कूलों में ऐसे ही कम्युनिटी को इन्वॉल्व कर कुछ नवाचार कर रहे हैं, जो परिणाम है उसी को आपने इस आंगनबाड़ी में देखा.

हम नवाचार की और जानकारी लेते हैं. पता चलता है कि ‘सेव द चिल्ड्रन’ ने इस छोटे से ब्लॉक के 50 स्कूलों-आंगनबाड़ियों में एक प्रयोग शुरू किया है. कुछ टीचिंग लर्निंग मैटेरियल डेवलप किये हैं. कुछ समूह बनवाये हैं. कुछ किताब वगैरह का इंतजाम करवाया है, कुछ नियमित प्रशिक्षण का इंतजाम है. बस इतने से ही गांववालों में नयी उर्जा का संचार हुआ है. उन्हें लगने लगा है कि बहुत कुछ हो सकता है. हमारे बच्चे भी शहरी बच्चों की तरह पढ़ सकते हैं, बढ़ सकते हैं और यह सब उसी का नतीजा है.

शीतल बताती है-हमारी जैसे आठ लोग इस ब्लॉक के 50 स्कूलों आंगनबाड़ियों में रोजाना जाते हैं और हमारा काम सिर्फ बच्चों के साथ बतकही करना, खेलना, शिक्षकों से बातचीत करना, कुछ टीचिंग लर्निंग मैटेरियल देना, किताबें देना होता है. बाकि तो सारा काम अभिभावकों की उर्जा से होता है.

आंगनबाड़ी के बाद उसी गांव के एक मिडिल स्कूल में जाते हैं. आजादी से पहले से स्कूल है उस गांव में, लेकिन कुल तीन कमरे में आठवीं तक की पढ़ाई की मजबूरी. चार शिक्षक, चारों नियोजित, उनमें भी दो को सरकारी कामों से फुर्सत नहीं. लेकिन वहां बच्चों से बात करते हुए उनके आत्मविश्वास, अनुशासन, वाकपटुता से फिर हैरत का भाव आता है.

स्कूल के हेडमास्टर कमलेश पासवान बताते हैं कि हमारा स्कूल जो इतना साफ देख रहे हैं, वह सब बच्चे करते हैं. बच्चों की अपनी कैबिनेट है. बाल संसद है. उन्होंने ही आपस में सब जिम्मा ले लिया है. बिना किसी दबाव के वे खुद समय से पहले आकर सब काम करते हैं, फिर एक एक कमरे में दो-दो कक्षा के बच्चे बैठते हैं तो सब अनुशासित तरीके से पढ़ते हैं. हम कमलेश पासवान से ही पूछते हैं कि ऐसा कैसे संभव हुआ? वह कहते हैं कि यह सब बस थोड़े नवाचारी प्रयोग से संभव हुआ. बच्चों को थोड़ा प्यार देने से, थोड़ी बात समझाने से और गांववालों के साथ से.

पूजा बताती है कि पिछले कुछ दिनों से इस स्कूल में एक और बदलाव आया है. कुछ दिनों पहले एक मीटिंग हो रही थी. गांव के लोग थे. हम और शीतल भी यहां थे. शीतल कुछ बोल रही थी तो गांव के लड़कों ने कहा कि ना बिल्डिंग है, ना शिक्षक, क्या आपलोग लेक्चर दे रही हैं? शीतल ने तुरंत जवाब दिया कि शिक्षक नहीं हैं तो आप नहीं पढ़ा सकते. आपका फर्ज नहीं बनता. गांव के दो नौजवान लड़के ब्रजेश और सूर्यकांत तुरंत सामने आ गये. यह शीतल की ललकार का असर रहा हो या फिर उनके अपने विवेक का मामला लेकिन उसका असर यह हुआ कि शिक्षकों की कमी से जो पढ़ाई बाधित हो रही थी, उसे संभाल लिया.

उसी गांव के रहनेवाले जितेंद्र पुष्प कहते हैं कि शिक्षा समाज का मामला है. सिर्फ सरकार नहीं बदल सकती कुछ. यह हम गांववाले समझ गये हैं. इसलिए हमलोगों से जो संभव होता है, कर रहे हैं. पंचरूखी से निकल हम बगल गांव आईमा जाते हैं. वहां स्कूल रूप में दिवार पर रस्सी बांधकर किताबों की टंगी हुई लाइब्रेरी देखते हैं. ढेरों किताबें. किताबें सेव द चिल्ड्रेन की ओर से दी गयी है. आलमीरा नही था स्कूल में तो उसके खरीद होने का इंतज़ार नही किया गया. दिवार पर ही रस्सी बाँध किताबों को टांग लाइब्रेरी शुरू.

अब आइमा स्कूल में बच्चों को गजब का लगाव जुड़ाव दिखता है उस लाइब्रेरी से. पूजा कहती है- हर गांव में कुछ ना कुछ नया प्रयोग मिलेगा. पंचमहला, मोहम्मदपुर, पिरखासराय, मकसूदपुर, बेलमा, शांतिनगर, सोनफूल… जहां भी आप जायेंगे, ऐसे कुछ न कुछ नया मिलेगा. सब जगह अभिभावकों के आंखों में पलते हुए सपने दिखेंगे. भविष्य के प्रति भय नहीं उम्मीदों का भाव दिखेगा. पूजा कहती हैं कि कुछ नहीं करना है. बस समाज को जगाना है, थोड़ा नवाचार करना है, शिक्षा पूरा ना भी बदले तो भी दिन रात दूसने लायक स्थिति तो नहीं ही रह जाएगी.

 

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