कर्पूरी ठाकुर, जगन्नाथ मिश्रा और लालू यादव

आदित्य मोहन झा

आदित्य मोहन झा

कर्पूरी ठाकुर, जगन्नाथ मिश्रा और लालू यादव। मौजूदा बिहार की जातिगत-राजनीति के वो बीज जिन्हें या तो कोई अच्छा कह सकता है या बुरा, इग्नोर नहीं कर सकता। आज का दिन तीनों पूर्व मुख्यमन्त्रियों के लिए महत्वपूर्ण है। कर्पूरी ठाकुर जी का जन्मदिन है और लालू जी सँग जगन्नाथ जी को भी जेल हो गयी है।

कर्पूरी और लालू दोनों उसी ब्राह्मण व्यवस्था के खिलाफ खुद को कहते थे जिसका प्रतिनिधी शायद वो जगन्नाथ मिश्रा को बताते थे। ये सच जरूर है की बिहार के जातिगत बेड़ियों को तोड़ने और पिछड़ों के मुंह मे आवाज देने के लिए लालू और कर्पूरीजी के शुरुआती काम कमाल हैं, और एक सच ये भी की यदि ललितनारायण मिश्र की हत्या न हुई होती तो उनके भाई जगन्नाथ मिश्र कभी मुख्यमंत्री क्या नगरपरिषद तक न बनते।

कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों को 26 प्रतिशत आरक्षण देके, 10 वीं तक की शिक्षा मुक्त करके और अंग्रेजी की बाध्यता खत्म करके पिछड़ों के अधिकारों के लिए एक नई शुरुआत की थी और अगड़ों से गाली के अलावा उन्हें जन्नानायक की उपाधि मिली। लालू यादव ने उस कड़ी को आगे बढाते हुए अगड़ों को दबाने को दलित-राजनीति का नाम दिया और अपने परिवार व जाति के तारणहार बन गए।

मैट्रिक से अंग्रेजी की बाध्यता खत्म करने के फैसले के लिए आज लोग कर्पूरी ठाकुर की आलोचना करते हैं पर ये करके दरअसल उन्होंने दलितों और पिछड़ों के लिए शिक्षा का द्वार खोल दिया क्योंकि अंग्रेजी ट्यूशन के अभाव में वंचित वर्ग के लोग मैट्रिक में ही अटक जाते थे। आठवीं तक की शिक्षा को मुफ्त करके निरक्षर जनता को स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित किया। पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरी में आरक्षण दिया पर बाद में उस 26 % मे 3 % गरीब सवर्णों के लिए रक्खा गया। लेकिन इस सबके लिए उन्हें बहुत गाली और अपमान सहना पड़ा। लोगों से उन्हें उनके पिता के पेशे हज्जामी और उनके ठाकुर होने सम्बन्धी जातिगत तंज झेलने पड़े। मतलब की कर्पूरी लड़े तो जरूर पर मजबूर रहे और कमजोड़ रहे जबकि यही चीज लालू में उलट रही।

लालू ने दम ठोंककर हर फैसला लिया, भाषण दिया, गरियाया और कभी कभी जरूरत पड़ने पर अगड़ों को दबाया भी। पूरे प्रशासनिक अमला और व्यवस्था को अपने अनुरूप ढाल देने और अपराधीयों को शरण देकर उन्होंने अपनी स्थिति ऐसी कर ली की कभी वो कर्पूरी जैसे मजबूर नहीं दिखे जबकि सवर्ण समाज उन्हें ही उत्पीड़क के तौर पर देखने लगा। सरकार-मीडिया और राजनीति को अपने आस-पास लगातार 15 सालोंतक घुमाने वाले लालू की ऐसी पकड़ थी की जब उनका जैसे मन हुआ उसे उन्होंने पूरा कर लिया। इन सबमें एक चीज गज्जब बदला, वो था की अब पिछड़े बोलने लगे थे और उन्हें कोई अगड़ा दबा नहीं सकता था। खैर ये अपने आप मे एक बड़ा बदलाव था पर इसके साथ-साथ बिहार का आर्थिक और बौद्धिक-शैक्षणिक स्तर गिरता गया, लोग पलायन करते गए, रोजगार और उद्योग बन्द होते चले गए, साक्षरता-स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ।

जगन्नाथ मिश्र ने पारिवारिकता और सवर्णों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की जरूर पर सिर्फ अपने आसपास के लोगों को और वो भी व्यक्तिगत। भाई ललित बाबु के राजनीतिक हस्ती का लाभ मिला उन्हें और उनकी मौत के तीन महीने बाद ही वो मुख्यमंत्री बन बैठे। घोटाले के अलावा और किसी काम के लिए वो प्रसिद्ध न हुए सिवाय इसके की उनका बेटा नीतीश मिश्र मंत्री बने, भतीजा एमएलसी और एक भतीजा लोकसभा टीवी का सीईओ।

ठीक से देखिए तो ये तीनों मौजूदा नए पौध की राजनीतिक लोगों के लिए कुछ सिख छोड़ गए हैं। कर्पूरी सिखाते हैं की यदि आप किसी अच्छे नियत से कुछ काम करेंगे तो गाली और अपमान भी सहना पड़ सकता है। लालू का जीवन ये बताता है की सत्ता अच्छी नियतों को भी आसानी से प्रदूषित कर सकता है। आप अच्छी और सामाजिक न्याय के लिए खड़े होते हैं पर बाद में ये व्यवस्था आपको केवल बेईमानी, चुटीले भाषणों, जातिगत, व्यक्तिगत स्वार्थ और परिवारवाद की गठरी बना देता है। जगन्नाथ मिश्र को अंततः जेल की सजा ये साबित करता है की गलत और बेईमानी अंत मे आकर आपपर भाड़ी पड़ता ही है, आप कितना भी भागें, जब समय आएगा तो वो आपको अपनी गिरफ्त में ले ही लेगा।

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