यह कैसा न्याय है? लालू तो ‘ललुआ’ हो जाते हैं, जगन्नाथ ‘बाबू’ ही रह जाते हैं

सवाल सिर्फ सीबीआई की जांच और अदालती प्रक्रियाओं का नहीं है, मीडिया और बौद्धिक समाज का भी है. जिसके लिए घोटाला का आरोप लगते ही लालू ‘ललुआ’ हो जाता है. जबकि देश में सैकड़ों नेता भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद सम्मानित तरीके से पुकारे जाते रहे हैं. राजनीतिक अध्येता जयंत जिज्ञासू मानते हैं कि इसके पीछे मीडिया और सवर्ण समाज का अपना पूर्वाग्रह है. चारा घोटाला तो एक बहाना था, जिसकी सूली पर लालू को लटका कर सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को रोकने और लालू की वजह से उठे बिहार की दलित औऱ पिछड़ी जातियों के सिर को फिर से नतमस्तक कर देने की कोशिश की गयी. इसके बावजूद लालू का जो अवदान है वह उन्हें अपने समकालीन नेताओं नीतीश, जार्ज, रामविलास जैसों से काफी उपर उठा देता है, क्योंकि उन्होंने कभी सत्ता के लिए सांप्रदायिक ताकतों से समझौता नहीं किया.

जयंत जिज्ञासू

उसी चारा घोटाले में फसने पर जगन्नाथ मिश्रा ‘जगन्नाथ बाबू’ बने रहते हैं, पर लालू प्रसाद ‘ललुआ’ हो जाते हैं. लालू प्रसाद से ‘ललुआ’ तक की फिसलन भरी यात्रा में लालू प्रसाद की सारथी रही मीडिया का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तो होना चाहिए.

सांप्रदायिकता से जूझने वाला सियासतदां, पत्थर तोड़ने वाली भगवतिया देवी, जयनारायण निषाद, ब्रह्मानंद पासवान, आदि को संसद भेजने वाले, खगड़िया स्टेशन पर बीड़ी बनाने वाले विद्यासागर निषाद को मंत्री बनाने वाले, आज़ादी के 43 वर्षों के बीत जाने के बाद भी बिहार जैसे पिछड़े सूबे में समाज के बड़े हिस्से के युवाओं को उच्च शिक्षा से जोड़ने हेतु छह नये विश्वविद्यालय खोलने वाले एवं बिना डिगे सांप्रदायिकता से जूझने का माद्दा रखने वाले लोकप्रिय व विवादास्पद नेता लालू प्रसाद की सियासत को 1995 से क़रीब से देखने-समझने की कोशिश करता रहा हूँ. तब दूसरी जमात में पढ़ता था. मुझे ठीकठीक ध्यान आता है, जो आज भी धुंधला नहीं हुआ है. वो अलौली की एक विशाल जनसभा थी, और लालू प्रसाद अपनी रौ में बोल रहे थे :

ओ गाय चराने वालो, भैंस चराने वालो,

बकरी चरानेवालो, भेड़ चराने वालो,

घोंघा बीछने वालो,

मूस (चूहे) के बिल से दाना निकालने वालो,

पढ़ना-लिखना सीखो, पढ़ना-लिखना सीखो.

उनकी हर अभिव्यक्ति पर जोशीली भीड़ ताली बजा रही थी. वो आज भी हिन्दी बेल्ट के उन चंद धुरंधर वक्ताओं की फ़ेहरिस्त में शुमार हैं, जिनकी ओरेटरी का कोई ज़ोर नहीं. क्राउड पुलिंग में आज भी उनका कोई मुक़ाबला नहीं.

उन्मादी, सांप्रदायिक, विभाजनकारी व राष्ट्रभंजक राजनीति करने वालों के खिलाफ खड़ी होनेवाली लोकतांत्रिक शक्तियों की भूमिका व हमारे संघर्ष में उनके अंशदान को हम नम्रता से स्वीकार करते हैं. जिनके पैर शूद्रों और दलितों को ठोकर मारते थे, उनके दर्प को तोड़ने का काम लालू प्रसाद ने किया.

साइकिल पर सवार लालू जी की एक पुरानी तसवीर

लगातार पाँच चुनावों (फरवरी 05 व अक्टूबर 05 का विधानसभा चुनाव, 09 का लोस चुनाव, 10 का विस चुनाव एवं 14 का लोस चुनाव) में करारी हार के बाद आदमी सत्ता के गलियारे में अलबला के न जाने किस-किस से हाथ मिलाने को तैयार हो जाता है, मगर लालू प्रसाद ने भाजपा के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. इसीलिए, वे जॉर्ज फर्णांडिस, शरद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार से कहीं ज़्यादा बड़े नेता के रूप में अक़्लियतों के बीच स्थापित हैं. ऐसा नहीं कि जॉर्ज-शरद-रामविलास-मुलायम की पहले की लड़ाई को लोग भूल गये हैं या उसकी क़द्र नहीं है. लेकिन, सामाजिक न्याय साम्प्रदायिक सौहार्द के बगैर अधूरा रहेगा.

लालू प्रसाद के प्रति मेरी अपनी आलोचनाएँ हैं, पर सियासी मूल्यांकन सदैव निरपेक्ष नहीं हो सकता. देश की मौजूदा परिस्थिति में मेरी यही मान्यता है. यह भी सच है कि जम्हूरियत में चुनाव ही सबकुछ नहीं है, सामाजिक-सांस्कृतिक जागृति के लिए उत्तर भारत में व्यापक स्तर पर कोई पहल कम ही हुई है.

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले

उस इंक़लाब का जो आज तक उधार-सा है.

(कैफ़ी आज़मी)

बाक़ी बातें एक तरफ, लालू प्रसाद का सेक्युलर क्रेडेंशियल एक तरफ. लालू जी की इसी धर्मनिरपेक्ष छवि का क़ायल रहा हूं. 90 के बाद बिहार में कोई बड़ा दंगा नहीं होने दिया. मौजूदा हालात में जहां धर्मनिरपेक्ष देश को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की जबरन कोशिश की जा रही है, वैसे में सामाजिक फ़ासीवाद से जूझने का जीवट रखने वाले नेता कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते. बिहार में किसी को अपना कार्यकाल पूरा करने नहीं दिया जाता था.

कर्पूरी ठाकुर पर घोटाले का कहीं कोई आरोप नहीं था, पर दो-दो बार उनकी सरकार नहीं चलने दी गई. 70 के उत्तरार्ध में सिर्फ़ सिंचाई विभाग में वे 17000  वैकेंसिज़ लेकर आते हैं, और जनसंघी पृष्ठभूमि के लोग रामसुंदर दास को आगे करके एक हफ़्ते के अंदर सरकार गिरवा देते हैं. जहां एक साथ इतने बड़े पैमाने पर फेयर तरीक़े से ओपन रिक्रुटमेंट हो, वहां मास्टर रोल पर सजातीय लोगों को बहाल कर बाद में उन्हें नियमित कर देने की लत से लाचार जातिवादी लोग इस पहल को क्योंकर पचाने लगे.

श्री कृष्ण सिंह के बाद अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने वाले लालू प्रसाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री हैं. हां, अंतर्विरोधों से दो-चार होना भारतीय लोकतंत्र की नियति बनती जा रही है, जो कचोटता है. जिसने संचय-संग्रह की प्रवृत्ति से पार पा लिया, वह संसदीय राजनीतिक इतिहास में कर्पूरी ठाकुर-मधु लिमये की भांति अमर हो जाएगा. ऐसे त्याग की भावना के साथ जनसेवा करने वाले जनता के नुमाइंदे विरले आते हैं. पर, मैं आश्वस्त हूं कि आज भी भले लोग हैं जो ओछी महत्वाकांक्षाओं से परे समाज में परिवर्तन के पहिए को घुमाना चाहते हैं ताकि व्यक्ति की गरिमा खंडित न हो, सब लोगों के लिए प्रतिष्ठापूर्ण जीवन सुनिश्चित हो सके.

पलटने में माहिर नीतीश कुमार तक ने इसी साल कहा, “लालू जी का जीवन संघर्ष से भरा है. वे जिस तरह के बैकग्राउंड से निकलकर आए हैं और जिस ऊंचाई को हासिल किया है, वह बहुत बड़ी बात है”.

एक पुरानी तसवीर मेंलालू, नीतीश औऱ शरद एक साथ

90 के दौर में जब आडवाणी जी रथयात्रा पर निकले थे और बाबरी को ढहाने चले थे, तो लालू प्रसाद ने उन्हें समस्तीपुर में नाथ दिया था. अपार जनसमूह व सभी राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी में पटना की एक विशाल रैली में वे कहते हैं, “चाहे सरकार रहे कि राज चला जाए, हम अपने राज्य में दंगा-फसाद को फैलने नहीं देंगे. जहां बावेला खड़ा करने की कोशिश हुई, तो सख्ती से निपटा जाएगा. 24 घंटे नज़र रखे हुए हूँ. जितनी एक प्रधानमंत्री की जान की क़ीमत है, उतनी ही एक आम इंसान की जान की क़ीमत है. जब इंसान ही नहीं रहेगा, तो मंदिर में घंटी कौन बजाएगा, जब इंसान ही नहीं रहेगा तो मस्जिद में इबादत देने कौन जाएगा ?”

एक बार पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर ने सदन में कहा था, जो आज सत्ता पक्ष के लोगों को भूलना नहीं चाहिए, “एक बात हम याद रखें कि हम इतिहास के आख़िरी आदमी नहीं हैं. हम असफल हो जायेंगे, यह देश असफल नहीं हो सकता. देश ज़िंदा रहेगा, इस देश को दुनिया की कोई ताक़त तबाह नहीं कर सकती. ये असीम शक्ति जनता की, हमारी शक्ति है, और उस शक्ति को हम जगा सकें, तो ये सदन अपने कर्त्तव्य का पालन करेगा.”

जब अधिकांश लोग सेना बुला कर लालू प्रसाद को गिरफ़्तार करने पर ‘भ्रष्टाचार’ की ढाल बनाकर चुप्पी ओढ़े हुए थे और नीतीश जी जैसे लोग उल्टे इस क़दम के पक्ष में सदन में हंगामा कर रहे थे, तो चंद्रशेखर ने लालू प्रसाद मामले में सीबीआइ द्वारा अपने अधिकार का अतिक्रमण करने, न्यायपालिका को अपने हाथ में लेने व व्यवस्थापिका को अंडरएस्टिमेट करने के अक्षम्य अपराध पर लोकसभा में बहस करते हुए जो कहा था, उसे आज याद किये जाने की ज़रूरत है –

“लालू प्रसाद ने जब ख़ुद ही कहा कि आत्मसमर्पण कर देंगे, तो 24 घंटे में ऐसा कौन-सा पहाड़ टूटा जा रहा था कि सेना बुलाई गई ? ऐसा वातावरण बनाया गया मानो राष्ट्र

का सारा काम बस इसी एक मुद्दे पर ठप पड़ा हुआ हो. लालू कोई देश छोड़कर नहीं जा रहे थे. मुझ पर आरोप लगे कि लालू को मैं संरक्षण दे रहा हूँ. मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरी दिलचस्पी किसी व्यक्ति विशेष में नहीं है, ऐसा करके मैं इस संसदीय संस्कृति की मर्यादा का संरक्षण कर रहा हूँ. जब तक कोई अपराधी सिद्ध नहीं हो जाता, उसे अपराधी कहकर मैं उसे अपमानित और ख़ुद को कलंकित नहीं कर सकता. यह संसदीय परंपरा के विपरीत है, मानव-मर्यादा के अनुकूल नहीं है.

किसी के चरित्र को गिरा देना आसान है, किसी के व्यक्तित्व को तोड़ देना आसान है. लालू को मिटा सकते हो, मुलायम सिंह को गिरा सकते हो, किसी को हटा सकते हो जनता की नज़र से, लेकिन हममें और आपमें सामर्थ्य नहीं है कि एक दूसरा लालू प्रसाद या दूसरा मुलायम बना दें. भ्रष्टाचार मिटना चाहिए, मगर भ्रष्टाचार केवल पैसे का लेन-देन नहीं है. एक शब्द है हिंदी में जिसे सत्यनिष्ठा कहा जाता है, अगर सत्यनिष्ठा (इंटेग्रिटी) नहीं है, तो सरकार नहीं चलायी जा सकती. और, सत्यनिष्ठा का पहला प्रमाण है कि जो जिस पद पर है, उस पद की ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए, उत्तरदायित्व को निभाने के लिए आत्मनियंत्रण रखे, कम-से-कम अपनी वाणी पर संयम रखें. ये नहीं हुआ अध्यक्ष महोदय.

सीबीआइ अपनी सीमा से बाहर गयी है, ये भी बात सही है कि उस समय सेना के लोगों ने, अधिकारियों ने उसकी माँग को मानना अस्वीकार कर दिया था. ये भी जो कहा गया है कि पटना हाइ कोर्ट ने उसको निर्देश दिया था कि सेना बुलायी जाये; वो बुला सकते हैं, इसको भी सेना के लोगों ने अस्वीकार किया था. ऐसी परिस्थिति में ये स्पष्ट था कि सीबीआइ के एक व्यक्ति, उन्होंने अपने अधिकार का अतिक्रमण किया था. मैं नहीं जानता कि कलकत्ता हाइ कोर्ट का क्या निर्णय है. उस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहता. लेकिन ये प्रश्न ज़्यादा मौलिक है जिसका ज़िक्र अभी सोमनाथ चटर्जी ने किया. अगर पुलिस के लोग सेना बुलाने का काम करने लगेंगे, तो इस देश का सारा ढाँचा ही टूट जायेगा.

सेना बुलाने के बहुत-से तरीके हैं. वहाँ पर अगर मान लीजिए मुख्यमंत्री नहीं बुला रहे थे, वहाँ पर राज्यपाल जी हैं, यहाँ पर रक्षा मंत्री जी हैं, होम मिनिस्ट्री थी, बहुत-से साधन थे, जिनके ज़रिये उस काम को किया जा सकता था. लेकिन किसी पुलिस अधिकारी का सीधे सेना के पास पहुँचना एक अक्षम्य अपराध है. मैं नहीं जानता किस आधार पर कलकत्ता हाइ कोर्ट ने कहा है कि उनको इस बात के लिए सजा नहीं मिलनी चाहिए. मैं अध्यक्ष महोदय आपसे निवेदन करूँगा और आपके ज़रिये इस सरकार से निवेदन करूँगा कि कुछ लोगों के प्रति हमारी जो भी भावना हो, उस भावना को देखते हुए हम संविधान पर कुठाराघात न होने दें, और सभी अधिकारियों को व सभी लोगों को, चाहे वो राजनीतिक नेता हों, चाहे वो अधिकारी हों; उन्हें संविधान के अंदर काम करने के लिए बाध्य करें.

और, अगर कोई विकृति आयी है, तो उसके लिए उच्चतम न्यायालय का निर्णय लेना आवश्यक है, और मुझे विश्वास है कि हमारे मंत्री, हमारे मित्र श्री खुराना साहेब इस संबंध में वो ज़रा छोटी बातों से ऊपर उठकर के एक मौलिक सवाल के ऊपर बात करेंगे.”

लालू प्रसाद अपने अंदाज़ में मीडिया को भी अपनी साख बचाए व बनाए रखने की सीख देते हैं. ‘राष्ट्रीय पत्रकारिता’ के हवनात्मक पहलू के उभार के दौर में बतौरे-ख़ास एक नज़र :

मनोरंजन भारती : कुछ ज्ञानवर्धन कीजिए सर हमारा.

(Please, enlighten me on your ideals in life.)

लालू प्रसाद : ज्ञानवर्धने है, हरा-हरा सब्जी खाओ, दूध पियो, और सच्चा ख़बर छापा करो.

(Eat green vegetables, drink milk and tell the truth in your reports.)

(सौजन्य से : NDTV Classics)

मीडिया की मौलिक चरित्रगत विशेषताओं पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि परिवार के आग्रह और पुत्रमोह व भ्रातृप्रेम में रामविलास पासवान अपना धड़ा बदलें, तो उसूल से भटका हुआ, पदलोलुप, अवसरवादी और न जाने क्या-क्या हो जाते हैं, वहीं कर्नाटक के मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र के राज्यपाल व देश के विदेश मंत्री रहे एस. एम. कृष्णा, दिग्गज कांग्रेसी नेता व युपी के मुख्यमंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा की पुत्री व युपी कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं रीता बहुगुणा जोशी, और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे उनके पुत्र विजय बहुगुणा कांग्रेस से सीधे भाजपा की गोद में जाकर बैठ जाते हैं, तो उस पर कोई हंगामा नहीं बड़पता, कोई चर्चा नहीं होती, उन्हें मीडिया की मंडी में खलनायक सिद्ध करने के लिए सांध्यकालीन बहस में टीवी के पर्दे हिलने नहीं लगते; उल्टे वो महान बागी व दूरदर्शी नेता कहलाते हैं.

आख़िर क्या वजह है कि घनघोर शुद्धतावादियों की निर्मम-निष्ठुर आलोचनाओं का दायरा लालू-मुलायम के चंदन-टीका करने से नवब्राह्मणवाद की उत्पत्ति तक ही सीमित रहता है ?

महिला आरक्षण बिल पर कोटे के अंदर कोटे की लड़ाई जिस तरह लालू प्रसाद ने शरद जी व मुलायम जी के साथ सदन के अंदर लड़ी, वो क़ाबिले-तारीफ़ है. आख़िर को वंचित-शोषित-पसमांदा समाज की महिलाएं भी क्यों नहीं सदन का मुंह देखें ? इतना-सा बारीक फ़र्क अगर समझ में नहीं आता, और संपूर्ण आधी आबादी की नुमाइंदगी के लिए संज़ीदे सियासतदां की पहल व जिद को कोई महिला विरोधी रुख करार देता है, तो उनकी मंशा सहज समझ में आती है. वे बस विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं को सदन में देखना चाहते हैं, ग़रीब-गुरबे, हाशिये पर धकेली गई, दोहरे शोषण की मार झेल रही खवातीन उनकी चिंता, चिंतन व विमर्श के केंद्र में नहीं हैं. अगर अपने मूल रिग्रेसिव स्वरूप में महिला आरक्षण बिल पारित हो जाता, तो शोषित तबके की खवातीन टुकुर-टुकुर मुंह ताकती रह जातीं. हम चाहते हैं कि संसद की शोभा सिर्फ़ सुषमा स्वराज व स्मृति ईरानी जैसी महिलाएं ही न बढ़ाएं, बल्कि भगवतिया देवी, फूलन देवी व सकीना अंसारी भी सदन के अंदर सिंहगर्जन करें.

चारा घोटाले के एक मामले में जगन्नाथ मिश्रा बरी हो चुके हैं और लालू प्रसाद को सज़ा सुनाई गई है. मामला यह नहीं कि चारा घोटाला मिसिर जी के समय में शुरू हुआ या बाद में, बात इतनी-सी है कि जहाँ पढ़ना मना था, वहाँ छह-छह नये विश्वविद्यालय खोलने वाले लालू प्रसाद उनकी नज़र में यही डिज़र्व करते हैं. सामंतों के दर्प को तोड़ने वाले लालू राजनैतिक रूप से हराये नहीं जा सकते थे, तो न्यायिक सामंतों का सहारा लिया गया.

क़ानून अपना काम करे, इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता. मगर क़ानून को गर्दनिया देकर उसके पीछे अपना काम कराने वाले शातिर दिमाग़ जब हरकत में आने लगे, तो समझिए कि क़ानून का चालचलन बिगाड़ा जा रहा है. लक्षण ठीक नहीं लग रहे. क़ानून के सेलेक्टिव इस्तेमाल पर जोनाथन स्विफ़्ट ने बड़ी सटीक टिप्पणी की थी :

“Laws are like cobwebs, which may catch small flies, but let wasps and hornets break through.”

एक रोज़ शरद जी से उनके आवास पर मुलाक़ात हुई. उन्होंने कहा, “दो-दो बार हमने सरकार गंवाई. एक बार जेपी के आह्वान पर और फिर ख़ुद जमीर की आवाज़ पर संसद से इस्तीफ़ा दिया. मंडल की लड़ाई में हम सबने मिलकर देश भर में इसके पक्ष में माहौल बनाया. लागू हुआ, तो कोर्ट में बखेड़ा खड़ा किया. जब तक जुडिसरी में आरक्षण नहीं होगा, इन बेईमानों पर आंख मूंद के भरोसा नहीं किया जा सकता. अगर मैं ‘ऊंची’ जाति में पैदा हुआ होता, तो ये मीडिया के नमूने मुझे कब का हीरो बना देते. मैं कहता हूँ कि समाज के अंतिम पायदान की महिलाओं को भी संसद पहुंचने दो, तो ये मुझे, लालू को, मुलायम को महिला विरोधी बताते हैं. कहते हैं कि हम तीेनों ने विमीन रेज़रवेशन बिल को लटका दिया. तो, इस देश में पुरखे खप गए ये सब झेलते-झेलते. लंबी लड़ाई है. टांग तुड़वा के बैठा हूं. पर, हौसला है कि कम नहीं होता”.

तो, योद्धाओं का एक उसूल है कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में, किसी भी मोड़ व मोर्चे पर मन छोटा नहीं किया करते.

हार क्या, जब मन न हारा!

लालू प्रसाद के कामकाज की शैली के प्रति मेरी अपनी समीक्षा है, और आलोचना व असहमति लोकतंत्र की बुनियादी शर्त हैं. पर, यह वक़्त 24 कैरट का ‘शुद्धतावादी’ होने का नहीं, बल्कि मुखर आवाज़ की सेलेक्टिव टारगेटिंग के ख़िलाफ़ मज़बूती से खड़े होने का है.

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