‘जंगलराज’ तो था मगर लालू के दौर में नहीं

निराला बिदेसिया

जंगलराज. राजनीति में पिछले करीब दो दशक से बेहद लोकप्रिय शब्दों में से एक है यह. यूं तो पूरे हिंदी प्रदेशों में ही शगल और सनक की तरह सर चढ़ने के बाद सबसे पॉपुलर शब्द भी है यह. जिसे कोई शब्द नहीं आता, वह फटाफट इस शब्द का इस्तेमाल करता है. विरोधी या सत्ताधारी दल को गरियाने के लिए. उसे नीचा दिखाने के लिए. आतंक-हिंसा-अराजक-अनुशासनहीन राजकाज और राजपाट को परिभाषित करने के लिए. अपने भाषण, संबोधन, वार्ता आदि में ताश के पत्ते की तरह ‘जंगलराज’ शब्द को फेंटकर छुटभैये से लेकर बड़के नेता तक अपने विरोधी दलों की खिंचाई करते हैं.

निराला

राज्य में अराजकत स्थिति हो, अंधेर नगरी-चैपट राजा वाला हाल हो, अशांति का माहौल हो, अकर्मण्यता की स्थिति हो, कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं हो, कानून-व्यवस्था नियंत्रण से बाहर हो, गुंडे-मवाली समानांतर रूप से सत्ता-शासन के केंद्र बनने की राह पर हों… सबको एक कॉमन शब्द ‘जंगलराज’ के जरिये व्यक्त कर देने की परंपरा बन चुकी है. बिहार में यह शब्द पहले से ही लोकप्रिय है. वैसे भी संभवतः भारत की राजनीति में यह विशेष शब्द बिहार की ओर से ही एक अनुपम देन की तरह है. जाहिर-सी बात है, पड़ोसी होने के नाते और बिहारियों की संख्या अधिक होने के कारण झारखंड के राजनीतिक गलियारे में भी प्रचलित है.

इसे कहने में शायद ही किसी को हिचक होगी कि इस शब्द को सबसे ज्यादा मोहब्बत भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने किया है. गाहे-बगाहे की बजाय अक्सर इस शब्द का इस्तेमाल भाजपा नेता करते हैं. बिहार के नेताओं से लेकर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहते नरेंद्र मोदी तक. सबसे ज्यादा इस्तेमाल लालू-राबड़ी शासन काल के लिए. बीच में जब नीतीश कुमार से कुट्टी हो गयी थी तो राजद के साथ सरकार चलाते वक्त उस राज को भी भाजपाई जंगलराज शब्द में ही सिमटाते थे और कुछ दिनों के लिए जब मांझीजी की सरकार थी, नीतीश कुमार साथ थे, मांझी भाजपा से सट्टा-सट्टी नहीं किये थे, तब तक उनके राजकाज को भी जंगलराज का ही नाम देते थे भाजपाई.

भाजपा ने इस शब्द को पॉपुलर बनाया तो बाकि दलों ने भी इसे तेजी से अपनाया. लेकिन इस शब्द को बुराई-अराजकता और कुशासन के पर्याय के रूप में इस्तेमाल करनेवाले नेताओं और पार्टियों को थोड़ा इस शब्द के मायने और इसकी महत्ता की जानकारी भी ले लेनी चाहिए.

इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जंगलराज सच में एक राज था और यह जैन संतों-साधुओं के लिए एक सुगम और सुगम्य राज्य बनाया गया था. 232 ईसा पूर्व में जब चक्रवर्ती सम्राट अशोक की मृत्यु हुई तो मौर्य साम्राज्य का पतन होना भी शुरू हुआ. कुछ कालखंड बाद अशोक के पोते संप्रति ने मध्यप्रदेश, गुजरात, दक्खिन, मैसूर आदि में अपने प्रभाव को बढ़ाना शुरू किया. उसने साढ़े 25 राज्यों को जैन साधुओं के लिए सुगम और सुगम्य बना दिया. उन राज्यों में मगध, अंग, कौशल, कुस, विदेह, कुरू, काशी आदि के साथ प्रमुखता से एक राज्य जंगलराज भी था. तब जंगलराज की राजधानी अहिच्छता हुआ करती थी. इन राज्यों में जैन साधुओं के लिए सुव्यवस्थित और सुगम्य वातावरण था.

संप्रति ने उज्जैन पर 50 साल से अधिक वक्त तक राज किया. बाद में उसे मौर्य साम्राज्य की बागडोर को भी संभालने का मौका मिला. उसे जैन अशोक के नाम से भी जाना जाता है. वह अशोक के पुत्र कुणाल का पुत्र था, जिसे धोखे से अंधा कर दिया गया था.

इस प्रसंग की विस्तृत चर्चा ‘सार्थवाह’ नामक पुस्तक में है. ‘सार्थवाह’ न तो कोई साधारण पुस्तक है, न इसके लेखक कोई साधारण व्यक्तित्व रहे हैं. सार्थवाह- प्राचीन भारत में पथ पद्धति नाम से लिखित पुस्तक के लेखक मोतीचंद्र जी रहे हैं. इस पुस्तक में मोतीचंद्र जी ने यात्रा, यात्रियों, पथों, पथ पद्धतियों के बहाने प्राचीन भारत के विविध ऐतिहासिक पहलुओं की गहरी पड़ताल की है. तथ्यों और तर्कों के साथ. मोतीचंद्रजी प्रख्यात विद्वान रहे हैं. भारतेंदु हरिश्चंद्र के परिवार से लेकिन इनकी अपनी पहचान रही है. भारत की वेश-भूषा, पथ पद्धति पर इनकी पुस्तक काफी चर्चित रही है. इस पुस्तक की भूमिका वासुदेव शरण जैसे विद्वान ने लिखी है.

अगर जंगलराज के मायने हिंदी में इस पुस्तक के जरिये समझ में न आये तो नेताओं को एक नेक सलाह और भी है. वे चाहे तो अंग्रेजी में जगदीश चंद्र जैन की किताब ‘लाइफ इन एनसिएंट इंडियाः एज्ड डीपिक्टेड बाई जेन केनन्स’ भी बांच सकते हैं. संभवतः उसमें भी इसके बारे में कुछ मिल जाए.

 

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