जनकपुर- परदेस में सीता का एक खूबसूरत-भव्य मंदिर और प्रेम में डूबे स्त्री-पुरुष

पुष्यमित्र

नेपाल स्थित जनकपुर मिथिलांचल के लोगों के लिए एक बड़ा और भावनात्मक तीर्थ है. कहते हैं, जनकपुर ही वह जगह है, जहां सीता और राम का विवाह हुआ था. वहां एक भव्य जानकी मंदिर है. जो संगमरमर से बना है. 1910 में बने इस मंदिर का आर्किटेक्ट काफी खूबसूरत है और नेपाल और भारत के मिथिलाचंल की महिलाएं इस तीर्थ से गहरा लगाव महसूस करती हैं, क्योंकि देवी सीता का यह इकलौता सबसे बड़ा मंदिर है. विकीपीडिया बताता है कि यह हिंदू-कोइरी आर्किटेक्ट का बेहतरीन नमूना है. 50 मीटर ऊंचे और 4860 स्क्वायर फीट में फैले मुगल और कोइरी गुंबद शैली वाले इस मंदिर का निर्माण मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ की रानी वृषभाणु ने करवाया था और उस वक्त इसके निर्माण में नौ लाख रुपये खर्च हुए इसलिए इसे नौलखा मंदिर कहा जाने लगा.
वैसे जनकपुर की असली पहचान वहां के संन्यासी शुरकिशोर दास की वजह से है. इस संतकवि ने सीता उपनिषद की रचना की थी. कहते हैं, उन्हें 1657 में इसी जगह पर सीता की स्वर्ण प्रतिमा मिली थी जो आज मंदिर में है. यह उन्होंने ही कहा था कि सीता-राम का विवाह इसी जगह पर हुआ है. उन्हें आधुनिक जनकपुर का निर्माता माना जाता है. जनकपुर में उनकी स्मृति में एक भव्य द्वार बना है, जिसके ऊपर उनकी प्रतिमा रखी है.
1910 में बने इस मंदिर को हिंदू-कोइरी शिल्प का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है.
एक जमाने में बिहार के जयनगर से जनकपुर के लिए ट्रेन भी चलती. छोटी लाइन की, नैरो गेज. इस अंतरराष्ट्रीय ट्रेन की शुरुआत आजादी से काफी पहले हुई थी. हाल के दिनों तक वह ट्रेन चलती रही. धीमी रफ्तार से, ट्रेन यात्रियों से खचाखच भरी रहती थी. कुछ साल पहले इस ट्रेन का परिचालन बंद हो गया. अब इस बजट में इस रेल रूट को ब्राड गेज करनी की बात हुई है. हालांकि स्थानीय लोग कहते हैं कि काम पहले ही शुरू हो चुका है.
सुबह साढ़े आठ बजे हमारी गाड़ी जनकपुर के लिए निकल पड़ी और साढ़े नौ बजे हम बेनीपट्टी पहुंच गये. गूगल में आप सर्च करेंगे तो बतायेगा कि मधुबनी से जनकपुर की दूरी 52 किमी है. इसलिए मेरा अनुमान था कि हम डेढ़ घंटे में पहुंच जायेंगे. और वहां से एक बजे भी चलेंगे तो ढाई बजे तक मधुबनी, फिर शाम में मधुबनी से सटे गांव जितवारपुर घूम आयेंगे, जो मिथिला पेंटिंग का गढ़ माना जाता है. मगर बेनीपट्टी पहुंचते-पहुंचते हमारी योजना फेल हो गयी.
एक तो रास्ता गड़बड़ था. सड़कें टूटी हुई थी. अमूमन बिहार की सड़कें इतनी टूटी नहीं होतीं. और दूसरी बात जब हम बेनीपट्टी पहुंची तो वहां के प्रभात खबर के साथी ने बताया कि अगर आपकी गाड़ी में ओरिजनल पेपर नहीं है तो आप नेपाल सीमा से आगे नहीं बढ़ पायेंगे. आपको परमिट नहीं मिलेगा. हालांकि आनन-फानन में उस साथी ने बोलेरो एरेंज करवा दिया और उनकी टीम के दो-तीन लोग हमारे साथ हो गये. अब नालंदा वाले हमारे ड्राइवर अपनी कार पार्क करके हमारे साथी यात्री के तौर पर बैठ चुकी थे. आगे रास्ता और भी खराब था.
उमगांव उस सीमा पर आखिरी भारतीय गांव है. उसके उस तरफ सीमा है और सीमा पार करने के बाद नेपाल का धनुषा जिला शुरू हो जाता है. उसी का मुख्यालय जनकपुर है. बेनीपट्टी से बमुश्किल 20-22 किमी का रास्ता रहा होगा. मगर जर्जर सड़क, सीमा पर कागजी कार्रवाईय़ां और दूसरे काम में एक से डेढ़ घंटे का समय लग गया.
वैसे तो मैं इससे पहले तीन बार नेपाल जा चुका हूं. तीन बार जोगबनी-विराटनगर सीमा होते हुए, एक बार भीमनगर-भंटाबाड़ी सीमा से, एक बार वाल्मिकीनगर में. तीनों सीमाओं पर द्वार बना है और दोनों तरफ दोनों मुल्कों के चेकपोस्ट का भवन है. बहुत भव्य तो नहीं मगर ठीक-ठाक व्यवस्थाएं हैं. मगर उमगांव और धनुषा की यह सीमा अजीब थी.
दोनों तरफ एक भी भवन नहीं. भारत की तरफ टीन की एक गुमटी थी जिसमें एसएसबी के कुछ जवान बैठे थे, कुछ सड़क पर खड़े थे. वहां से चले तो एक पुल पार किया. हमारे साथी ने बताया कि यह जो पुल है वह किसी देश में नहीं है. दरअसल जिस नदी को हमने पार किया है, वही भारत और नेपाल की सीमा रेखा है. नदी पार करने के बाद भी नो मेंस लैंड की थोड़ी सी जगह थी. वहां भी खेती चल रही थी. नो-मेंस लैंड की अपनी ही दुनिया होती है. स्थानीय लोग इसे मानते नहीं. भले ही राजनीतिक तौर पर यह काफी महत्वपूर्ण होती है. विराटनगर और भंटाबाड़ी के पास भी नो मेंस लैंड में काफी लोगों ने अपने घर बना रखे हैं. कानूनन वे लोग किसी मुल्क के बाशिंदे नहीं हैं. मगर ऐसे तो काम नहीं चलता. लिहाजा किसी न किसी देश का वोटर कार्ड, राशन कार्ड वगैरह वे बनवा कर रखते हैं. पूर्वी चंपारण में भारत-नेपाल सीमा पर तो एक गांव ऐसा है कि जिसका आधा हिस्सा भारत, आधा नेपाल में है और बीच में बाजार है. बाजार नो मेंस लैंड में है. आप वहां पहुंच कर बिल्कुल नहीं समझ सकते कि आप दो देशों के बीच आ जा रहे हैं.
भारत-नेपाल की सीमा का यह व्यवहार अद्भुत है. आप आसानी से एक दूसरे की सीमा को पार कर सकते हैं और सीमा पर आपको कतई अहसास नहीं होता कि आप किसी दूसरे देश में जा और आ रहे हैं. दोनों देश की मुद्राएं एक दूसरे के इलाके में चलती हैं. भारत में तो सीमावर्ती इलाके में, मगर पूरे नेपाल में आप आसानी से भारतीय मुद्रा का इस्तेमाल कर सकते हैं. भारत के सीमावर्ती इलाकों में आपको हर जगह नेपाली एफएम बजते नजर आयेंगे. दिलचस्प है कि इन एफएम चैनलों में आपको भारतीय इलाके के पान और चाय दुकानों के विज्ञापन भी सुनने को मिलेंगे. इन नेपाली एफएम चैनलों के एजेंट भारतीय इलाकों में भी काम करते हैं. शिवहर के एक संवाददाता ने मुझे बताया था कि वे पार्ट टाइम के तौर पर इन नेपाली एफएम चैनलों के लिए बतौर संवाददाता काम करते हैं.
हालांकि पहले आतंकियों ने और अब बिहार की शराबबंदी ने भारत-नेपाल सीमा की इस सहजता को क्षति पहुंचायी है. पाकिस्तानी आतंकियों ने पहले इसे नकली नोट और अपने एजेंटों को भारत में घुसाने का रास्ता बनाया. अब बिहारी शराब माफिया नेपाल से शराब लेकर भारत घुसते हैं. इसलिए आजकल सीमा पर चौकसी अधिक है. मगर फिर भी आप पैदल हैं तो कोई बात नहीं, गाड़ी से हैं तो 20-30 रुपये का भंसार कटाइये और दिन भर नेपाल घूमकर शाम तक लौट आइये. थोड़ी बहुत चेकिंग होती है. वैसे आजकल बिहार से नेपाल जाने वालों की संख्या कुछ अधिक हो गयी है. क्योंकि शराब के शौकीन क्या करें. नेपाल घुसते ही आपको पता चल जाता है. सीमा पार करते ही शराब की दुकानें मिलने लगती हैं. खैर,
हम भारतीय फौजियों से तफ्तीश करवाकर आगे बढ़े और सौ-डेढ़ सौ मीटर बाद नेपाली फौजी खड़े मिले. एक टायर में एक छोटा सा बोर्ड लगा था जिस पर हाथ से अंगरेजी में लिखा था, चेकिंग. सीमा पर कोई चेकपोस्ट इतना सहज होगा अनुमान नहीं था. उससे पहले हमलोगों ने खुले में मेज और कुरसी पर बैठे नेपाली सीमा के कर्मियों से भंसार कटवाया था. आगे बढ़े तो पता चला कि चौड़ी सड़क बन रही है, हमारे साथी ने बताया कि फोरलेन सड़क भारत सरकार के सहयोग से बन रही है. जल्द रास्ता बेहतर हो जायेगा. फिलहाल तो मिट्टी का रास्ता था.
नेपाल घुसते ही यह चेकिंग प्वाइंट मिला
रास्ते में कुछ गांव मिले. गांवों में फूस और लकड़ी के बने कुछ घर दिखे और साफ समझ आ रहा था कि यहां गरीबी काफी अधिक है. दोनों मुल्क की आर्थिक स्थिति का फर्क इन्हीं गांवों में दिख रहा था. दीवारों पर कुछ चुनावी पोस्टर लगे थे. जाहिर है, ये नेपाल में हाल ही में हुए चुनाव के पोस्टर होंगे. मैंने गौर किया पंफ्लेट साइज के ये पोस्टर सिंगल कलर में छपे थे. अपने यहां जिस तरह मुखिया के चुनाव में भी फ्लैक्स या ग्लॉसी पोस्टर आम हो गये हैं, वे वहां कहीं नजर नहीं आ रहे थे.
एक उजाड़ किस्म का पेट्रोल पंप दिखा, जिसमें पुराने जमाने की मशीन लगी थी. जिन पर पेट्रोल और डीजल लिखा था. हमारे साथी ने बताया, आजकल उनके इलाके लोग पेट्रोल और डीजल लेने के लिए भी नेपाल आते हैं. क्योंकि भारतीय मुद्रा के हिसाब से यहां डीजल 45 रुपये और पेट्रोल 60 रुपये लीटर बिकता है. वे जब भी इधर आते हैं, टंकी फुल कराकर लौटते हैं.
जनकपुर मंदिर के पास पहुंचे तो लगा कि देवघर आ गये हैं. वैसा ही एक तालाब था, जिसका नाम गंगा सागर था और गंगा सागर तालाब की बाउंड्री के चारो तरफ लोग गाड़ियां खड़ी करते थे. हमने भी गाड़ी रोक दी. एक व्यक्ति दिखा जो सर से पांव तक मिट्टी लेपे हुए थे. वह कोई संन्यासी था या विक्षिप्त समझ नहीं आया. कोई बताने वाला भी नहीं था. हम मंदिर परिसर में घुस गये.
कैंपस में भारतीय मंदिरों की तरह ही बड़ी संख्या में मर्द और औरत जमीन पर बैठ कर सामान बेच रहे थे. सिंदूर, टिकुली, कड़ा, बद्धी, लॉकेट, चूड़ी, वगैरह-वगैरह. हर महिला ऐसे मंदिर से लौटते वक्त अपने साथ बड़ी संख्या में ये चीजें खरीदकर लौटती हैं ताकि सुहागन महिलाओं को बांट सके. इसके अलावा फूल और प्रसाद की दुकानें थीं.
फर्क वहां पहुंची भीड़ में दिखा. नेपाल की आजाद तबीयत महिलाएं और उनकी आजादी का सम्मान करने वाली पुरुषों की भीड़ ने मन मोह लिया. मंदिर के दरवाजे पर ही एक जोड़ा दिखा. लड़का लड़की की जूती के फीते बांधने में व्यस्त था. इस तसवीर को मैंने कैप्चर कर लिया. बाद में फेसबुक पर यह तसवीर बहस का विषय बन गयी. हालांकि ज्यादातर लोगों ने इसे पसंद किया, कुछ लोगों ने इसे जोरू का गुलाम कह दिया. एक सज्जन ने तो यह समझ लिया कि यह तसवीर पोस्ट कर मैं इस परंपरा पर आपत्ति कर रहा हूं. खैर…
यह खूबसूरत तसवीर दिखी

मंदिर जितना भव्य और खूबसूरत था, इस मंदिर के बारे में बताते वाले की वहां उतनी ही कमी थी. एक म्यूजियम था भी तो वहां बस मिट्टी की प्रतीकात्मक मूर्तियां शोकेस में सजा कर रखी गयी थीं. कोई लीफ-लेट पंफ्लेट तक नहीं. नेपाल में इस चीज का अभाव अमूमन दिखता रहा है. जब वाल्मिकीनगर के रास्ते नेपाल के वाल्मिकी आश्रम गया तो वहां भी यही बात. किसी पत्थर के आगे लिख दिया गया कि इस पर सीता माता मसाला पीसती थी, किसी पत्थर को लव-कुश के घोड़ा बांधने का खूंटा बता दिया गया. दरअसल नेपाल में कई मसलों पर अभी ठीक से काम नहीं हुआ लगता है. ज्यादातर कारोबार आस्था के भरोसे चलता है, चूकि वहां इन आस्थाओं पर इतने सवाल भी नहीं हैं, जितने अपने यहां हैं, सो हर चीज को सिर झुका कर मान भी लिया जाता है. जैसे जनकपुर मंदिर में म्यूजियम में मिट्टी की मॉडल मूर्तियां थीं.

विवाह मंडप
इस मंदिर के अलावा एक और स्मारक विवाह मंडप था. कहा जाता है उसी जगह सीता-राम के फेरे हुए थे. वह मंडप किसी बौद्ध पगोडा की शक्ल का था. अंदर में वहां भी विवाह का दृश्य था, मूर्तियां थीं. उपमा को खासकर निराशा हुई, वह कुछ निशानियां देखना चाहती थीं, वह मुमकिन नहीं था. सच पूछिये तो जनकपुर में देखने के लायक सीता का भव्य और खूबसूरत नौलक्खा मंदिर और वहां के स्त्री-पुरुष के सहज व्यवहार के अतिरिक्त कुछ नहीं है. मैं वही बटोर पाया.

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