जेल जाने पर जनता, राज मिलने पर बेटा! यह कैसा सोशल जस्टिस है लालूजी?

व्यालोक पाठक

यह सचमुच ‘पोस्ट-ट्रुथ’ काल है. कमाल के समय में जी रहे हैं हम लोग. कल लालू प्रसाद की सज़ा का ऐलान होने के बाद से अब तक मीडिया और सोशल मीडिया को देख रहा हूं. हैरतज़दा हूं, यह देखकर कि केवल दो दशक में पूरा विमर्श ही किस तरह बदल कर रह गया है, हमारी सामाजिक मान्यताएं और संदर्भ बदल गए हैं?

पत्रकार एवं टिप्पणीकार व्यालोक पाठक

इसी के साथ मुझे एक और मंज़र याद आता है, एक और तस्वीर नुमायां होती है- आंखों के आगे. कई साल पहले सलमान खान को हिरण-शिकार मामले में जोधपुर कोर्ट ने सज़ा सुनायी थी और एकाध दिन उनको जेल रहना पड़ा. उसके तुरंत बाद ही सलमान की एक तस्वीर नुमायां हुई थीं, जिसमें वह फेज़ कैप (मुसलमानों की गोल टोपी) पहने तमाम मैगज़ीन के कवर पर नुमायां हुए थे.

कल से ही लालू प्रसाद की एक तथाकथित चिट्ठी को भी कुछ इसी तरह से शेयर किया जा रहा है, मानो वह अब्राहम लिंकन की उसके बेटे के स्कूल-अध्यापक को लिखी चिट्ठी हो. लालू को भी कल से कई स्वनामधन्य चिंतक शहीद, साज़िश का शिकार और Phenomenon इत्यादि बता चुके हैं. उनके दोनों बेटे माहौल बना रहे हैं, मानो लालू प्रसाद सत्याग्रह की सज़ा पाए हों औऱ उसमें जेल जा रहे हैं. उनके साथी नेता इस कदर उनके उम्र और स्वास्थ्य की गवाही देते हुए सज़ा को अधिक बता रहे हैं, मानो लालू प्रसाद तो महात्मा गांधी के वर्तमान संस्करण हों.

हालांकि, मिलेनियल किड्स की बात मैं मान सकता हूं, लेकिन अच्छे-खासे 30 पार के बिहारी भी जब लालू प्रसाद को मासूम बताते हैं, तो कसम से दिल चाक हो जाता है. लालू के जो बेहोश समर्थक हैं, उनकी दलीलों को देखिए, तो पता चलेगा कि वे कितनी पोली हैं. जहां तक ‘साजिश’ का प्रश्न है, तो ध्यान दिया जाए कि लालू के साथ 16 और को सज़ा हुई है (वह भी नाममात्र की, वह भी कितनी लागू होगी, देखने लायक बात वह है. आखिर, लालू एक और मामले में सज़ाशुदा तो हैं ही, कितने दिन जेल में रहे?). शर्मा नामधारी जीव को तो लालू से दोगुनी सज़ा हुई है, तो फिर साज़िश किसके साथ हुई है.

दूसरा तर्क जो मनुवादी साज़िश का है, वह भी भहरा कर गिर जाता है, क्योंकि इसमें लालू के गुरुजी जगन्नाथ मिश्र भी सजाशुदा हैं, अभियुक्त हैं, जमानत पर हैं. फिर, यह वही बेहूदा तर्क है कि चूंकि तथाकथित सवर्णों ने भ्रष्टाचार किया है, इसलिए लालू प्रसाद को Divine Right मिल जाता है, घोटाला करने का. यही तर्क मरहूम विनोद मेहता ने तरुण तेजपाल को छेड़खानी मामले में क्लीनचिट देते हुए किया था, तेजपाल के अपराध के साथ Apparently लिखकर.

यह वही बेहूदा तर्क है, जो शहाबुद्दीन का विरोध करने पर उसके समर्थक (Sic.) अनंत सिंह की कुंडली बांचते हुए करते हैं. इस लेखक को याद है जब शहाबुद्दीन जेल से निकले थे और बिना टोल दिए उनको सैकड़ों गाड़ियों के हुजूम में किस तरह का ग्रैंड-रिसेप्शन दिया गया था. किस तरह सीवान में बिरयानी बनी और बंटी थी? यह सचमुच अजीब तर्क है. नायकों के जवाब में नायक तो हरेक वर्ग खोजता है, लेकिन एक जाति का कोई ख़लनायक है, तो दूसरी जाति में खलनायक भी पैदा किए जाते हैं, बनाए जाते हैं. तुम्हारा अनंत सिंह, तो हमारा शहाबुद्दीन, तुम्हारा जगन्नाथ मिश्र तो हमारा लालू प्रसाद यादव. यह अद्भुत विडंबना है.

तीसरा तर्क, यह दिया जाता है कि लालू प्रसाद ने पिछड़ों-शोषितों के लिए बहुत कुछ किया, इसके लिए उनको फंसाया जा रहा है. जहे-नसीब. अव्वल तो लालू ने क्या किया, यही शोध का विषय है, पर वह अलग लेख का विषय है.

लालू ने यही किया कि समाज को बुरी तरह बांट दिया, कभी कभार मुशहरटोली में जाकर बच्चों के बाल कटवा दिए, पाइप से पानी डाल दिया. लालू ने भूरा बाल साफ करने की धमकी दी, लालू ने कानून-व्यवस्था को मज़ाक बनाकर रख दिया, इतना कि आज भी एक आम बिहारी कानून तोड़ने में अपनी शान समझता है. लालू के समय पटना में 7 बजे अनकहा कर्फ्यू लगता था, रेलवे स्टेशन से गर्दनीबाग तक जाना मना होता था. उद्योग, बिजली, सड़क, शिक्षा सबका मर्सिया पढ़ दिया गया था, लालू राज में.

ऊपर से 900 करोड़ का घोटाला. मुझे आज भी यही पता है कि मेरे गांव का नोनिया (एक जाति), या ननिहाल का मंडल- पहले कोलकाता जाता था, अब दिल्ली जाता है. लालू के नौनिहालों को उनके 15 वर्षो के जंगलराज में शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली, पानी, सड़क की स्थिति देखनी चाहिए. सवाल वही है, लालू ने खुद को औऱ परिवार को छोड़कर कब किसके लिए कुछ किया है?

आज लालू को जेल जाने पर जनता याद आ रही है, लेकिन राज मिलने पर उनको बेटा ही याद आता है. पहली बार जेल गए तो निरक्षर पत्नी की मार्फत जेल से ही अपना राज चलाते रहे. एक चपरासी क्वार्टर के कमरे से निकलकर लालू और उनका परिवार तो अरबों का साम्राज्य बना चुके, लेकिन बिहार की 80 फीसदी शोषित-दलित-पिछड़ी जनता के मुस्तकबिल में लालू ने कौन सा गुणात्मक परिवर्तन कर लिया? आज धन्यवाद उस लालू-राज के खात्मे का कि कम से कम सड़क औऱ बिज़ली के मामले में बिहार कुछ मुंह दिखाने लायक हो गया है, बाक़ी पैमानों पर तो अभी भी यह सभ्यता का आखिरी मुकाम है ही…..

हंसी आती है लालू की तड़प, उनकी लिखवायी चिट्ठी देखकर… जब तेजस्वी संघर्ष, न्याय, शोषण आदि बड़े शब्द बोलते हैं, तो उनकी तुरंत राजनीति सीख जाने की क्षमता देखकर राहुल को उनसे सीख लेने की प्रेरणा देना चाहता हूं, लेकिन उनकी उलटबांसियों पर भी गुस्सा आता है.

सबसे अधिक दया आती है, एसी चिंतकों पर, जो बिहार को बिना जाने-समझे कुछ भी बोल दे रहे हैं, जो बिहार के दुर्भाग्य लालू यादव को सामाजिक न्याय का अंतिम अलंबरदार और मानवता की आखिरी उम्मीद ठहरा दे रहे हैं.

 

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