आंबेडकर की काट भर नहीं थे जगजीवन राम

पुष्यमित्र

इमरजेंसी का आखिरी दौर था. चुनाव की घोषणा हो चुकी थी. दिल्ली के मशहूर रामलीला मैदान में बाबू जगजीवन राम की सभा होने वाली थी. जबरदस्त भीड़ होने की उम्मीद थी. इस सभा को असफल करने के लिए इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर राजकपूर की मशहूर फिल्म बॉबी दिखाये जाने की घोषणा कर दी, उसी वक्त यह फिल्म दिखायी जानी थी, जब जगजीवन राम की सभा थी. उनदिनों दिल्ली में टीवी का नया-नया क्रेज था और टीवी पर ऐसी फिल्म को कोई मिस नहीं करना चाहता था. यह सरकार की चाल थी कि बाबूजी की सभा को विफल कर दिया जाये. मगर सभा हुई और लोग भारी संख्या में रामलीला मैदान में उमड़े. अगले दिन एक अखबार ने इस खबर को शीर्षक दिया बाबू बीट्स बॉबी.

तीन रोज पहले दलितों-आदिवासियों द्वारा किये गये भारत बंद की गरमी आज तक ठंडी नहीं हुई है और इसी माह 14 तारीख को दलितों के सबसे बड़े आइकन बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर की जयंती है. इस बीच में आज बाबू जगजीवन राम को उनकी 110वीं जयतीं पर याद करना राजनीतिक रूप से कैसा होगा कहना मुश्किल है. खासतौर पर जबसे पिछले दिनों यह कहा जाने लगा कि जगजीवन राम दलितों के नेता तो थे, मगर नेहरू ने उसे आंबेडकर की काट के लिए आगे बढ़ाया था. फिर भी, एक बिहारी होने के नाते मैं जगजीवन राम को जरूर याद करूंगा. एक दलित परिवार में जन्में जगजीवन राम ने उप प्रधानमंत्री की कुरसी तक पहुंचने के लिए जो संघर्ष किया और मन में तमाम कटुआ रहते हुए भी जिस तरह गांधीवादी मूल्यों से खुद को कभी अलग नहीं किया. जातिगत भेदभाव ने कभी उनकी जुबान से कटुता को बाहर आने नहीं दिया. हालांकि इसके बावजूद दलितों के हक के लिए लड़ने का उनका जज्बा कभी कम नहीं हुआ.

1936 से 1986 तक कभी चुनाव नहीं हारने वाले जगजीवन जिन्होंने उसी इंदिरा सरकार में रक्षा मंत्री रहते हुए बांग्लादेश युद्ध में भारत को जीत दिलायी. जो आजाद भारत के सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री थे. जिन्होंने कृषि मंत्री रहते हुए देश को हरित क्रांति की सौगात दी, भले ही आज वह हरित क्रांति सवालों के घेरे में है, मगर उस वक्त उसका काफी महत्व था. वह जगजीवन राम हमारे ऑइकन हैं और रहेंगे.

भोजपुर जिले के चंदवा गांव में शिव नारायण संप्रदाय के एक महंत हुआ करते थे सोभी राम. दलितों में चमार जाति से नाता रखने वाले सोभी राम पहले ब्रिटिश फौज में थे. वहां की भेदभाव की नीति से आहत होकर उन्होंने फौज की नौकरी छोड़ दी और चंदवा गांव में कुछ जमीन पर खेती करने लगे. उसी दौर में चमारों के बीच काफी पॉपुलर शिव नारायन संप्रदाय से उनका नाता जुड़ा और वे इसमें डूबते चले गये. फिर वे उस संप्रदाय के महंत बन गये और इस संप्रदाय के विचारों को कैथी लिपी में हाथ से लिखकर लोगों के बीच बांटने लगे. एक तरफ वे चंदवा के आसपास इस संप्रदाय को आगे बढ़ाने में जुटे थे तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर होनेवाली हलचलों पर भी उनकी निगाह थी. यही वजह है कि 1885 में जब कांग्रेस की स्थापना हो रही थी तो उस सभा में भी सोभी राम मौजूद थे. अहिंसा उनके विचारों का हिस्सा हमेशा से था.

1908 में उनके घर जब पुत्र का जन्म हुआ तो उन्हें रैदास कवि का वह मशहूर भजन याद आ गया. प्रभुजी तुम चंदन हम पानी… उसी भजन की एक पंक्ति थी… प्रभुजी संगत सरन तिहारी, जग-जीवन राम मुरारी. यहीं से उन्हें अपने इस पुत्र का नाम मिल गया जगजीवन राम.

एक ठीक-ठाक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति वाले परिवार का सदस्य होने के बावजूद जगजीवन को छुआ-छूत झेलना ही पड़ा. आरा के स्कूल में तब पानी के दो घड़े हुआ करते थे. एक हिंदू घड़ा, दूसरा मुसलमान घड़ा. वह हिंदू घड़े से खुद पानी लेकर पीना चाहते थे. मगर उन्हें बार-बार रोका जाता था. ठीक उसी तरह जैसे आंबेडकर के स्कूल में नो पियून-नो वाटर वाला सिस्टम था. यानी दलितों को पानी पियून ही ऊपर से गिरा कर पिलाता था. मगर जगजीवन राम अलग ही मिजाज के थे. उन्होंने तय कर लिया था कि वे अगर हिंदू समाज का हिस्सा हैं तो हिंदुओं की तरह ही इस घड़े से पानी लेकर पियेंगे. उनके लिए तीसरा घड़ा रखा जाने लगा. मगर वे बार-बार उस घड़े को फोड़ देते. बताया जाता है कि आखिरकार उनकी जिद के आगे स्कूल को झुकना पड़ा.

पढ़ने में मेधावी थे. उनकी संस्कृत इतनी अच्छी थी कि स्कूल के एक कार्यक्रम में उनकी प्रतिभा को देखकर मदन मोहन मालवीय जी उन्हें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय लेकर चले गये. मगर जातिवादी लोगों ने वहां भी उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया. हॉस्टल से लेकर मेस तक. मदन मोहन मालवीय और दूसरे प्रोफेसर चाहकर भी उनकी मदद नहीं कर पाये. लिहाजा वे बीएचयू छोड़कर कलकत्ता चले गये. और वहां की यूनिवर्सिटी में पढ़ने लगे.

कलकत्ता में पढ़ाई के साथ-साथ उनका जुड़ाव राजनीति से भी होने लगा. खासकर दलित-पिछड़ों-गरीबों से. कलकत्ता में उनदिनों बिहारी मजदूरों का बड़ा जमावड़ा हुआ करता था. एक दिन उन्होंने वहां उन्होंने बिहारी मजदूरों की बड़ी रैली की, उस रैली में 50 हजार लोग जुटे थे. सुभाष चंद्र बोस भी उस रैली को और जगजीवन राम की संगठन क्षमता को देखकर चकित थे.

यह सब जानना इसलिए भी जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि किसी नेहरू ने जगजीवन राम को डमी के रूप में आंबेडकर की काट के लिए खड़ा नहीं किया. जगजीवन राम खुद ही जननेता रहे हैं. बहुत जल्द उनकी पॉपुलरिटी इतनी अधिक थी कि अंगरेज सरकार खुद इन्हें पार्लियामेंट में भेजना चाहती थी, मगर उन्होंने तय किया कि वे कांग्रेस की तरफ से पार्लियामेंट जायेंगे. 1936 में वे पहली बार पार्लियामेंट गये तो 1986 तक लगातार पार्लियामेंट में रहे. सासाराम की जनता ने इन्हें लगातार अपना प्रतिनिधि चुना. उनके संसदीय अनुभवों को देखते हुए ही बिहार में इनके नाम पर जगजीवन राम संसदीय शोध संस्थान की स्थापना हुई और आज वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत इसके अध्यक्ष हैं. आजाद भारत की सरकारों में भी जगजीवन राम एक अनिवार्य उपस्थिति की तरह थे. लगातार 30 साल तक कैबिनेट मंत्री रहे. जनता सरकार में जेपी के अनुरोध पर मंत्री बने और इन्हें उप प्रधानमंत्री बनाया गया.

इन तमाम सरकारी और संसदीय जिम्मेदारियों के साथ-साथ वे दलितों को हक दिलाने के लिए भी वे लगातार सक्रिय रहे. 1930 के दशक में ऑल इंडिया डिप्रेस्ड लीग की स्थापना और उसका संचालन किया और देश भर में कई दलित नेताओं को आगे बढ़ाया. हां, उनका तरीका अहिंसक था, गांधीवादी कह सकते हैं, मगर अहिंसा का पाठ उन्हें अपने पिता से भी मिला था. पुरी में जब वे दर्शन करने के लिए गये तो उनके पद की गरिमा को देखते हुए उन्हें तो मंदिर में जाने की इजाजत मिली, मगर उनकी पत्नी और परिवार के दूसरे लोगों को नहीं. ऐसे में उन्होंने खुद भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन से इनकार कर दिया. उस वक्त उनके मन से आह निकली कि अगर जगन्नाथ पूरे जगत के नाथ हैं तो दलितों के क्यों नहीं. मगर जब उनकी पुत्री मीरा कुमार की पढ़ाई के लिए एक ईसाई मिशनरी ने सहयोग की पेशकश की तो उन्होंने विनम्रता के साथ ठुकरा दिया.

अपने अतुलनीय योगदान के बावजूद अपनी जाति की वजह से वे ताउम्र हाशिये पर रहे. मगर कभी कटुता जाहिर नहीं की. मगर क्या हिंदू समाज ने ऐसे विनम्र महानायकों का सम्मान करना कभी सीखा. और वे कटु नहीं हुए क्या महज इसी वजह से वे दलितों के आइकन नहीं थे. और सवाल यह भी है कि दलितों के लिए इतना कुछ करने वाले जगजीवन राम को उनकी पार्टी कांग्रेस ने जहां उन्होंने सबसे लंबा वक्त गुजारा, समुचित सम्मान दिया. सवाल कई हैं, मगर यह सच हैं कि जगजीवन राम भारतीय राजनीति के एक बड़े नायक हैं, आज उन्हें याद करने का दिन है. उन्हें नमन.

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