तो अब ‘जगरनाथ बाबू’ को भी ब्राह्मणों का नेता कहलाने का परमसुख मिल गया

निराला

परसों जब चारा घोटाले पर कोर्ट का फैसला आया, जगन्नाथ मिसिर को राहत मिली और लालू प्रसाद यादव को दोषी करार दिया गया है, तब से कई किस्म के मुहावरे सोशल मीडिया में उछाले जा रहे हैं. फटाफट तुकबंदीवाले स्लोगन गढ़े जा रहे हैं. ब्राह्मण को बेल, पिछड़ा को जेल, यही है मोदी का खेल… वाला सबसे पॉपुलर रहा. जगन्नाथ मिश्र ब्राह्मण हैं, इसलिए उन्हें यह राहत मिली, यह बात भी कही जा रही है. जगन्नाथ मिश्र को क्यों राहत मिली यह तो विधि विशेषज्ञ बतायेंगे, इस पर कुछ कहना संभव नहीं. वेसे चारा घोटाला का केस देश में एक अनोखा केस इस मामले में भी है कि इसमें कनविक्शन रेट लगभग 90 प्रतिशत पार है. जितने भी लोग दोषी पाये गये हैं या चार्जशिटेट हुए, उनमें से 90 प्रतिशत से अधिक को सजा सुनायी गयी. इस मामले में यह देश का अनोखा केस है, ऐसा विधिक जानकार बता रहे हैं.

निराला बिदेसिया

बहरहाल दूसरी बात. जगन्नाथ मिश्र के बहाने ही जाने-अनजाने उन्हें बिहार के ब्राह्मण राजनीति का श्लाका पुरूष टाइप भी पेश किया जा रहा है. और इस बहाने ही सही, बिहार की राजनीति में ब्राह्मणों के महत्व को भी फिर से रेखांकित किया जा रहा है. ऐसा या तो अज्ञानता में ही हो रहा है, हड़बड़ी में हो रहा है या जानबूझ कर किसी सोची समझी राजनीति के तहत. कोर्ट के फैसले की बात को छोड़ देते हैं, जगन्नाथ मिश्र की बात करते हैं. उनके बारे में सच्चाई यही है कि वे कभी पूरे बिहार में ब्राह्मणों के सर्वमान्य नेता नहीं रहे, ना ही उनका जलवा रहा. सच यही है कि गंगा के इस पार यानि मगध और भोजपुरी आदि के इलाके में जगन्नाथ मिश्र का नाम लेते ही उनके साथ पहचान की कई रेखाएं चस्पां की जाती हैं.

उनका नाम ललित नारायण मिश्र वाले प्रकरण से जोड़ दिया जाता है, उन्हें घनघोर रूप से अपने खास मिथिलावालों का भला करनेवाला नेता कहा जाता है और फिर बाद के दिनों में उनके साथ घनघोर अवसरवादी नेता कहा गया और फिर बेपेंदी का लोटा के साथ अपने और अपने बेटे की राजनीति को सुरक्षित करनेवाला नेता भी कहा जाने लगा. मध्य बिहार, भोजपुर, मगध इलाके में नयी पीढ़ी के नौजवान तो जगन्नाथ मिश्र का अच्छे से नाम भी नहीं जानते, जगन्नाथ मिश्र का नाम लेने पर ऐसा कहनेवाले पुराने कांग्रेसी ही अधिक होते हैं और उनमें अधिकतर ब्राहमण ही होते हैं. जगन्नाथ मिश्र को ऐसा कहा जाता है तो सब सच् हो या ना भी हो लेकिन कई बातें सच भी रही है.

यहां तक कि मिथिलांचल में जो उनका घर रहा है, वहां के ब्राह्मणों के भी वे कभी सर्वमान्य नहीं रहे. एक पूरा धड़ा उन्हें अपने भाई ललित नारायण मिश्र के कातिलों से मिल जाने या उनके कत्ल के दोषियों को सजा दिलाने में कभी उत्सुक नहीं होने के लिए दुत्कारता रहा, आज भी दुत्कारता है. जब तक जगन्नाथ कुरसी पर रहे, उन्हें कभी भ्रम नहीं रहा कि वे अपनी बिरादरी की बदौलत राजनीति कर पायेंगे, इसलिए एक वक्त तो उन्होंने अपना नाम ही मोहम्मद जगन्नाथ रख लिया था.

जगन्नाथ मिश्र से तीन बार मिलने का अनुभव भी यही बताता है कि वे एक खास किस्म की मंडली से घिरे रहनेवाले आत्ममुग्ध नेता ही रहे होंगे. पहली बार की बातचीत में उन्होंने यह कहा था कि कांग्रेस को उन्होंने छोड़ दिया तो कांग्रेस बिहार में रसातल के आखिरी तल में चली गयी. कभी दस हजार का भी भीड़ नहीं जुटा सकी जबकि उनके समय में लाखों की भीड़ जुटती थी. दूसरी बार की मुलाकात में उन्होंने कहा था कि​ नीतीश कुमार बिहार के विशेष राज्य का जो दर्जा मांग रहे हैं, यह सब तो उनका एजेंडा रहा था और झारखंड में जो सेल से लेकर एचईसी वगैरह है, सब उनकी वजह से ही है. यह तथ्यों को झुठलाते हुए आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा तक पहुंचना ही था उनका और यह हर बार की मुलाकात में उनमें देखने को मिला.

और बाद में तो सब जानते हैं कि कांग्रेस का साथ छोड़ने के बाद वे अपनी राज्य सभा सदस्यता के लिए नीतीश के साथ रहे और फिर मांझी प्रकरण में सबसे बड़े खिलाड़ी बनते हुए मांझी को गुरूमंत्र देकर नीतीश कुमार को धूल चटाना चाहें और फिर जब मांझी ने अलग पार्टी बना ली तो महज अपने बेटे की सीट को सुरक्षित और सुनिश्चित करने के लिए भाजपा के साथ हद से ज्यादा गिराकर मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा का समझौता करा दिये. खैर, यह सब तो जगन्नाथ मिश्र के राजनीतिक पहलू का हिस्सा है, जिस पर और लंबी बात हो सकती है.

असल बात यह है कि आज जो जगन्नाथ मिश्र के चारा घोटाले के बहाने उन्हें बिहार के ब्राहमण राजनीति का श्लाका नेता बता रहे हैं या प्रतिनिधि नेता बता रहे हैं उन्हें यह नहीं मालूम कि बिंदेश्वरी दुबे, केदारनाथ पांडेय जैसे नेता जब तक रहे, जगन्नाथ मिश्र को मध्य बिहार आदि में कभी कोई भाव तक नहीं मिला. बिंदेश्वरी दुबे, केदारनाथ पांडेय वगैरह तो राज्य स्तर के नेता रहे, जब कांग्रेस का जलवा था और उससे ब्राहमणों का जुड़ाव था तो एक से एक नेता स्थानीय स्तर पर ही थे जो अपने एक बड़े इलाके में जगन्नाथ मिश्र से ज्यादा वर्चस्व, नाम और असर, तीनों रखते थे.

उनमें रोहतास के इलाके में गिरिश मिश्र से लेकर बक्सर के इलाके में केके तिवारी जैसे नेता थे. और यह तो फिर भी एक बात है. कल कोर्ट के फैसले के बाद बिहार में ब्राहमणों को राजनीति में फिर से महत्वपूर्ण भी बनाया जा रहा है जबकि बिहार का राजनीतिक समीकरण कुछ दूसरी ही बात कहता है. नीतीश कुमार ने जब से पिछड़ों से अतिपिछड़ों को अलग किया है और गैर यादव पिछड़ों की राजनीति का नया अध्याय शुरू किया है, तब से बेशक बिहार की राजनीति में सवर्ण महत्वपूर्ण हुए हैं, लेकिन उसमें महत्व भूमिहारों और राजपूतों का ही बढ़ा है. सवर्णों के खेमे से ये दोनों कास्ट पोलिटिकली सबसे एग्रेसिव माने जाते हैं और यह लगातार देखा भी जा रहा है, दोनों जातियों ने साबित भी किया है. और अगर राजनीतिक गणित को भी देखें तो राजपूतों से बड़ी आबादी होने के बावजूद ब्राहमणों की संख्या सदन में भी उस अनुपात में नहीं रही है.

कमल नयन चौबे की किताब जातियों का राजनीतिकरण के अनुसार बिहार-झारखंड विभाजन के बाद राज्य में सवर्ण समूह की जनसंख्यात्मक स्थिति इस प्रकार रही है.

जति                                         संपूर्ण जनसंख्या में प्रतिशत

भूमिहार                                            7.1

ब्राह्मण                                            6.4

श्राजपूत                                            4.1

कायस्थ                                           3.4

कुल                                              21

 

उनकी किताब से यही आंकड़ा मिलता है. इस​ हिसाब से देखें तो बिहार में सवर्णों के खेमे से भूमिहारों के बाद ब्राह्मण ही सबसे महत्वपूर्ण खेमा के तौर पर रहते या राजनीतिक दलों द्वारा उसी तरह से उन्हें महत्व मिलता, ट्रीट किये जाते लेकिन हकीकत का इससे वास्ता नहीं है. इसलिए जाने-अनजाने बेवजह ही बिहार की राजनीति में हाशिये पर जा चुके ब्राहमणों को राजनीति में फिर से चमकाया जा रहा है और जगन्नाथ मिश्र जैसे नेता, जो अपने सक्रिय जीवन में कभी पूरे बिहार के ब्राहमण नेता के तौर पर स्थापित नहीं हो सके, उन्हें उसी रूप में बताया जा रहा है.

बिहार की राजनीति में देखें तो ब्राहमण अब एक बैलेंसिंग कास्ट भर हैं. राजपूतों और भूमिहारों के बीच पीढ़ियों से ही सामाजिक तौर पर बहुत अपनापा का रिश्ता नहीं रहा है. इसके कई मिथकीय और ऐतिहासिक कारण बताये जाते हैं. कायस्थ आबादी कम होने की वजह से अपनी बुद्धिमता और सटिक चाल से बिहार की राजनीति में प्रासंगिक बने रहे हैं. अब उनका भी असर और महत्व कमता जा रहा है. इस तरह देखें तो पिछले दो—तीन दशक से ब्राहमणों का बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण काम दो छोर पर रहनेवाले भूमिहारों और राजपूतों के बीच कम्युनिकेशन गैप को पाटने या बैलेंसिंग इक्वेशन बनाने का ही रह गया है.

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