क्या सुशील मोदी बिहार भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी हैं? #जन्मदिनविशेष

P.M.

आज बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का जन्मदिन है. बिहार की राजनीति जिन तीन बड़े नेताओं के ईर्द-गिर्द घूमती है, उनमें से एक वे हैं, बांकी दो लालू और नीतीश हैं. लालू को सत्ता से विस्थापित करने और भाजपा को बिहार में स्थापित करने में सुशील मोदी की बड़ी भूमिका रही है. 2005 में भी और 2017 में भी. मगर क्या डिप्टी सीएम बने रहना ही सुशील मोदी का प्रारब्ध है? जिस तरह लालकृष्ण आडवाणी डिप्टी पीएम बन कर ही भाजपा की राजनीति से रिटाय़र हो गये. क्या सुशील मोदी भी बिहार भाजपा के आडवाणी साबित हो जायेंगे?

यह सवाल इसलिए भी उठता है, क्योंकि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व सुशील मोदी की काबिलियत तो पहचानता है, मगर उसे अपना नेता या मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में कतराता रहा है. 2015 के विधानसभा चुनाव में केंद्रीय नेतृत्व का यह संशय साफ नजर आया. जब भाजपा ने नीतीश कुमार जैसे उम्मीदवार का मुकाबला बिना किसी सीएम कैंडिडेट के किया. यहां तक कि पोस्टरों और होर्डिंगों में भी मोदी औऱ अमित शाह ही नजर आये. भले ही इस रणनीति का भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा औऱ पार्टी चुनाव में बुरी तरह पराजित हुई. आखिरकार पार्टी को फिर से सुशील कुमार मोदी का ही सहारा लेना पड़ा. उन्होंने लालू औऱ उनके परिवार पर ताबड़तोड़ हमले किये और भाजपा फिर से सत्ता में आ गयी.

दरअसल, यही सुशील कुमार मोदी की ताकत है. वे उन चंद मेहनती नेताओं में हैं जो विपक्षियों के खिलाफ प्रमाण के साथ सुबूत इकट्ठा करने में माहिर हैं. इसी ताकत के दम पर उस दौर में जब लालू-राबड़ी का बिहार में एकछत्र राज था, सुशील कुमार मोदी विधानसभा में तथ्यों के साथ बहस करते थे. चारा घोटाला को अंजाम तक पहुंचाने में उनके जुटाये तथ्यों की भी बड़ी भूमिका रही है. लालू-राबड़ी के शासन के दौर को जंगलराज करार देने में भी उनके द्वारा पेश तथ्य ही काम करते रहे हैं. और 2005 में जो लालू राज का खात्मा हुआ तो उसके लिए जनमानस को तैयार करने का काम सुशील कुमार मोदी ने ही किया था.

क्या सुशील कुमार मोदी ने इस नियति को स्वीकार कर लिया है

मगर तब भी भाजपा ने उनकी क्षमता पर भरोसा नहीं किया. जदयू के साथ समझौता किया और कम सीटें होने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर पेश किया. सुशील मोदी को उनकी पार्टी ने ही मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं माना. आखिर इतनी मेहनत करने के बावजूद सुशील मोदी अपनी ही पार्टी के द्वारा मुख्यमंत्री पद के दावेदार क्यों नहीं माने जाते. कभी पार्टी नीतीश पर भरोसा करती है, तो कभी प्रेम कुमार, रविशंकर प्रसाद, मंगल पांडेय, नंदकिशोर यादव, सीपी ठाकुर जैसे चेहरों में छोटे मोदी का विकल्प तलाशने लगती है.

दरअसल जानकार बताते हैं कि सुशील कुमार मोदी की व्यक्तिगत पॉपुलरिटी तो है, मगर जाति की राजनीति में वे मात खा जाते हैं. उनकी जाति बनिया का कोई बड़ा वोट बैंक बिहार में नहीं है. बिहार में इसके बगैर राजनीति करना मुश्किल माना जाता है. इसके अलावा मोदी शहरी पृष्ठभूमि के माने जाते हैं. गांव के लोगों के बीच उनकी पैठ कम है. हालांकि यही बात कमोबेश नीतीश के बारे में भी कही जा सकती है, मगर नीतीश ने अपनी छवि विकास पुरुष के रूप में बना ली है औऱ इस बात को लालू भी खारिज नहीं कर पाये औऱ न चाहते हुए भी नीतीश को भी उन्होंने 2015 में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. नीतीश पर्सनल ब्रांडिंग को लेकर सतर्क रहे हैं और वे राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए कोशिश करते रहे हैं, इसी का उन्हें हमेशा लाभ मिला, जबकि सुशील मोदी पर्सनल ब्रांडिंग पर फोकस नहीं कर पाये और पिछड़ते चले गये.

आज भी सालो भर सुशील मोदी एक जैसे पोषाक में नजर आते हैं. फेसबुक और ट्विटर पर भले एक्टिव हों, मगर टेलिविजन और अखबारों में आने की कभी अतिरिक्त कोशिश नहीं करते. अपने बेटे की शादी को जरूर उन्होंने इवेंट बना दिया, मगर उसमें भी अलग किस्म के कपड़े में नजर नहीं आये. पैसे बनाने के आरोप उन पर खूब लगे, मगर वे लालू पर आरोपों की बौछार करते रहे, पर राजद उनके खिलाफ कोई पुख्ता आरोप पेश नहीं कर पायी.

दिलचस्प है कि लालू, नीतीश और सुशील मोदी ने छात्र राजनीति की शुरुआत तकरीबन एक साथ की. 1973 में जब लालू पटना विवि छात्र संघ के अध्यक्ष थे, तब सुशील मोदी महासचिव थे. इस बात का लालू मजाक भी बनाते हैं. मगर जहां लालू और नीतीश ने चुनावी राजनीति में काफी पहले कदम डाल दिया, सुशील मोदी ने पहला चुनाव 1990 में लड़ा, जब लालू बिहार के सीएम थे. हालांकि इस बीच वे भाजपा, एबीवीपी और आरएसएस के विभिन्न संगठनों से जुड़कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे.

1996 से 2004 तक वे बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे. 2005 से 2013 तक बिहार के उप मुख्यमंत्री रहे और चार साल बाहर रहने पर एक बार फिर वे बिहार के डिप्टी सीएम बन गये हैं. इस तरह देखा जाये तो पिछले इक्कीस सालों से वे बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं, यहां की राजनीति की दशा और दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं. मगर वे कभी शीर्ष भूमिका में भी आ सकते हैं, इस बारे में उनकी ही पार्टी नहीं सोचती. संभवतः उन्होंने भी मान लिया है कि नीतीश का डिप्टी बने रहना ही उनके राजनीतिक कैरियर का सबसे ऊंचा मुकाम है. कहते हैं, शायद इसी वजह से 2015 में उन्होंने पार्टी को भी ज्यादा उड़ान भरने नहीं दिया… 🙂 क्योंकि जिस रोज पार्टी अकेले बिहार में सरकार बनाने लायक हो जायेगी, उन्हें आडवाणी की तरह मार्गदर्शक बना दिया जायेगा.

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