क्या चंपारण सत्याग्रह आधा-अधूरा किसान आंदोलन था? चंपारण-गांधी के बाद-1

बेतिया के किसान नेता राजकुमार शुक्ल की जिद पर नील किसानों की समस्या को समझने के लिए 10 अप्रैल, 1917 को गांधी पहली बार बिहार आये थे. उन्होंने शुक्लजी से कह रखा था कि वे महज तीन-चार रोज रुकेंगे और किसानों से बात कर उनकी समस्या को समझने की कोशिश करेंगे. मगर पहले तिरहुत के कमिश्नर मोरशेड की बेरुखी और फिर मोतिहारी कचहरी में पेशी के आदेश के बाद उन्हें समझ में आ गया कि वे समस्या को जितनी छोटी समझते हैं, उतनी छोटी है नहीं. उन्होंने तय कर लिया कि वे अब चंपारण के किसानों की समस्या का समाधान करके रहेंगे. कई जगह उन्होंने इस आशय के बयान दिये और कहा कि अब चंपारण ही मेरा घर है. शायद उन्हें इस बात का अहसास भी हो गया था कि देश की आजादी के लिए कोई राह अगर निकलेगी तो यहीं से निकलेगी.

ऐसे में 10 अप्रैल को महज तीन-चार दिन के लिए बिहार आये गांधी की मौजूदगी किसी न किसी रूप में पूरे 1917 साल में चंपारण और बिहार के इलाके में रही. उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मोतिहारी की कचहरी में उन्हें अहिंसा देवी से साक्षात्कार हुआ और उस वक्त उनके साथी रहे राजेंद्र प्रसाद अपनी पुस्तक ‘गांधी जी इन चंपारण’ में लिखते हैं कि सत्याग्रह का जन्म उसी कचहरी में हुआ, जब गांधी ने जज साहब से कहा कि ‘हां, ठीक है, मैंने कानून तोड़ा है, मगर इस कचहरी से बड़ी कचहरी जो मेरी अंतर-आत्मा की अदालत है, उसके लिए मैंने कानून तोड़ा है. मैं इसकी सजा भुगतने के लिए तैयार हूं.’

बाद में उन्हें पहले निजी तौर पर किसानों की समस्या की स्वतंत्र जांच की इजाजत मिली, फिर जून, 1917 में एक सरकारी जांच कमिटी बनी और उन्हें इसका सदस्य बनाया गया. इस कमिटी ने अक्तूबर, 1917 में अपनी रिपोर्ट पेश की और दो दिन बाद उस रिपोर्ट को स्वीकर कर लिया गया. नील किसानों के दुःखों की असली वजह तिनकठिया प्रथा पर रोक लग गयी. एक अन्य प्रथा सरहबेसी को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका, मगर फिर भी उसके दर में कटौती की गयी. यह बड़ी जीत थी.

अगले साल मार्च महीने की चार तारीख को बिहार एंड ओड़िशा लेजिस्लेटिव कौंसिल ने चंपारण एग्रेरियन बिल को पास कर अंतिम रूप से तिनकठिया को खत्म कर दिया.

गांधी जी शायद यह मान बैठे थे कि तिनकठिया प्रथा के खत्म होने के बाद चंपारण के किसानों की तमाम समस्याएं खत्म हो जायेगी, या कम से कम चंपारण में उनका काम खत्म हो जायेगा. 15 अक्तूबर, 1917 को भागलपुर में बिहार स्टूडेंट कांफ्रेंस की बैठक में भी इसी बात का इशारा किया था. एक दफा इनसे बिहार की ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों ने भी पूछा था कि क्या आप चंपारण के बाद बिहार के दूसरे इलाकों के किसानों की भी लड़ाई लड़ेंगे तो उन्होंने इस बात से साफ इनकार कर दिया था. यह सवाल इसलिए उठा, क्योंकि अलग-अलग इलाके के किसानों के प्रतिनिधि उस दौर में गांधी से मिलने जाते और उनसे आग्रह करते कि आप हमारे इलाके में आइये और हमारी समस्या का अध्ययन कीजिये, हमारी लड़ाई को समर्थन दीजिये.

सच तो यह है कि जून, 1917 में किसानों की समस्या की जांच के लिए कमिटी गठित होते ही गांधी जी आश्वस्त होने लगे थे कि लड़ाई लगभग जीत ली गयी है. अप्रैल में बिहार आये गांधी, जून महीने में पहली बार अहमदाबाद लौटे. इस दौरान किसी वजह से एनी बेसेंट और उनके साथियों को मद्रास की सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था. उनका ध्यान उधर जाने लगा था. अगस्त में उन्होंने अहमदाबाद में एक सभा आयोजित कर श्रीमती बेसेंट और उनके साथियों को छोड़ने की मांग भी की थी.

11 सितंबर को वे मद्रास भी गये और 17 सितंबर को एनी बेसेंट को रिहा कर दिया गया. हालांकि इस बीच उनका चंपारण आना-जाना लगा रहा. 28 जून को जब वे अहमदाबाद से मोतिहारी आये तो उनके साथ सर्वेंट ऑफ इंडिया सोसाइटी के डॉ. देव भी थे. जो बाद में भितिहरवा में उनके द्वारा शुरू किये गये आश्रम सह विद्यालय की टीम के सदस्य बने. फिर 16 अगस्त को वे अहमदाबाद गये तो सितंबर महीने के आखिर में जांच कमिटी की रिपोर्ट को पेश करने के लिए ही सीधे रांची पहुंचे. फिर उन्होंने बेतिया में एक गोशाला की स्थापना की और भागलपुर में छात्रों की एक सभा को संबोधित किया और अहमदाबाद चले गये.

उसके बाद 8 नवंबर को जब चंपारण आये तो उनका एजेंडा चंपारण के इलाके में स्कूल खोलना, साफ-सफाई और सेहत के उपाय करना था. भितिहरवा और बड़हरवा-लखनसेन में स्कूलों की शुरुआत कर वे 26 नंवबंर, 1917 को जो चंपारण से निकले तो यह एक तरह से चंपारण में उनके लंबे प्रवास का अंत था.

उसके बाद वे अहमदाबाद में थे. पहले मिल वर्करों की समस्या, फिर खेड़ा सत्याग्रह में पूरी तरह उलझ चुके थे. बिहार में चंपारण से संबंधित अपडेट्स पर उनकी नजर रहती थी. मगर उनकी प्राथमिकता में चंपारण नहीं था. इस तरह हम देखते हैं कि 1917 में चंपारण आये गांधी ने अपने दीर्घ प्रवास में यहां के किसानों को दो चीजें दी.

  1. तिनकठिया जैसी अमानवीय प्रथा से मुक्ति
  2. अंगरेजों से लड़ने की हिम्मत

गांधी मान कर चल रहे थे कि आने वाले समय में ये दो चीजें यहां के किसानों के लिए काफी होंगी. वे मानते थे कि यहां जो अशिक्षा का माहौल है और सेहत के प्रति लापरवाही है, वह इनकी गुलामी की बड़ी वजह है. इसलिए उन्होंने इस लड़ाई के बाद अपना फोकस इस बात की तरफ शिफ्ट कर दिया कि इस इलाके में जगह-जगह स्कूल खुलें और स्वच्छता को लेकर अभियान चले. हालांकि कई वजहों से उनका यह मकसद पूरा नहीं हो पाया. पूरे चंपारण में सिर्फ तीन स्कूल खुल पाये, क्योंकि नील प्लांटर अपने इलाके में स्कूल खोलने की इजाजत नहीं दे रहे थे. कानूनी रूप से पराजित होने के बावजूद उनके मन में गांधी के प्रति काफी गुस्सा था, जिसे वे अखबारों में जाहिर करते रहते थे. मार्च, 1918 तक वे अपनी इस भावना को जाहिर करते रहे. मगर जब चंपारण एग्रेरियन बिल पास हो गया और कानून बन गया तो उनके पास अपना गुस्सा जाहिर करने के सिवा कुछ नहीं बचा था.

हां, यह सच है कि चंपारण में गांधी की मौजूदगी ने यहां के किसानों का आत्मबल काफी बढ़ा दिया था. मोतिहारी की कचहरी में उनकी जीत के साथ ही इस बात के उदाहरण सामने आने लगे थे. किसान जगह-जगह नील प्लांटरों के आदेशों की अवहेलना करने लगे थे. वे अधिक दर और अधिक किराये की मांग करते. मांगे पूरी नहीं करने पर नील की खेती करने से इनकार कर देते. तिनकठिया खत्म होने पर तो उन्हें कानूनी अधिकार ही मिल गया था. हालांकि नील की खेती एक झटके में खत्म नहीं हुई, मगर किसानों को दबाकर रखना अब मुमकिन नहीं था.

1920 के असहयोग आंदोलन में चंपारण के किसानों ने अपने साहस का उदाहरण पेश किया. दरअसल गांधी जी के प्रवास और उनकी ताकत को देखते हुए चंपारण के किसानों को उस वक्त लगने लगा था कि बहुत जल्द भारत आजाद होने वाला है और अंगरेज देश छोड़कर जाने वाले हैं. जिला प्रशासन की रिपोर्ट बताती है कि हालांकि दिसंबर, 1920 तक बिहार के ग्रामीण इलाकों में असहयोग आंदोलन नहीं फैला था, मगर चंपारण के ग्रामीण इलाकों में स्वराज की चर्चा शुरू हो गयी थी. शिकारपुर, हरिनगर और रामनगर में स्वयं सेवकों के दस्ते तैयार होने लगे थे, ये लोग खुद को रैयत वालेंटियर कहते और गांव-गांव में घूमकर स्वराज का प्रचार प्रसार करते. कई लोगों ने अपने और आसपास के घरों से उन सरकारी नंबरों को मिटा दिया जो जनगणना के वक्त लिखे गये थे. बाद में चंपारण में कई जगह किसान सभा और सेवा समिति का गठन होने लगा. हर हफ्ते बैठने वाली यह सभा किसानों के तकलीफों को सुनती और अपने तरीके से उनकी समस्याओं का निबटारा करती. मुठिया (एक मुट्ठी अनाज) के रूप में चंदा जमा किया जाता. मोतिहारी, मधुबन, लौरिया और सुगौली के इलाके में ऐसी सभा काफी सक्रिय थी.

किसानों के संगठित होते ही यूरोपियन प्लांटर्स के खिलाफ गुस्सा फूटने लगा. वे कई जगह मनमाने टैक्स चुकाने से इनकार करने लगे. जमींदारों को वनों की कटाई से रोकने लगे. धीरे-धीरे यह आंदोलन नील की खेती से इनकार करने, प्लांटरों, जमींदारों और चौकीदारों को टैक्स नहीं चुकाने के आंदोलन में बदल गया. किसान जो अब तक प्लांटरों से खौफ खाते थे, अब उनके आंखों में आंखें डालकर बात करने लगे थे.

किसानों के साहस और प्रतिरोध की बात अपनी जगह लेकिन यह कहना गलत होगा कि चंपारण सत्याग्रह के बाद ब्रिटिश शासन और नील प्लांटरों का दमन चक्र रुक गया. बल्कि इस बात के पर्याप्त उदाहरण मिलते हैं कि गांधी के जाने के बाद अंगरेजी हुकूमत और प्लांटरों ने अपनी हताशा को नील किसानों और खास तौर पर उन लोगों पर निकालने की कोशिश की जो गांधी के सहयोगी थे.

इसके अलावा गांधी के चंपारण सत्याग्रह को लेकर भी बाद के दिनों में कई तरह के सवाल उठे. कई वाम लेखकों ने और लेखक अरविंद एन दास ने भी चंपारण सत्याग्रह को अगड़ी जाति के हिंदुओं और मुसलमानों का आंदोलन कहा है और यह आरोप भी लगाये हैं कि इस आंदोलन को सूदखोर बनियों का भी समर्थन था. क्योंकि नील की खेती की वजह से सूद का कारोबार करने वाले देसी लोगों का व्यापार प्रभावित हो रहा था, इसलिए इन लोगों ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी की.

गांधी जी पर यह आरोप लगे कि उन्होंने अपने आंदोलन में सिर्फ और सिर्फ यूरोपियन प्लांटरों को ही निशाने पर रखा. हिंदुस्तानी जमींदारों पर हमला करने से परहेज किया.

जहां तक चंपारण सत्याग्रह को सूदखोरों और अगड़ी जाति के लोगों का आंदोलन बताये जाने की बात है तो इसकी वजह यह है कि इसमें राधूमल मारवाड़ी जैसे लोगों शामिल थे, राजकुमार शुक्ल सवर्ण थे. राजकुमार शुक्ल जांच आयोग के सामने यह बयान भी दिया था कि वे सूद का कारोबार करते रहे हैं. इसके अलावा शेख गुलाब अगड़ी जाति के मुसलमान थे.

मगर सिर्फ इतनी सी बात के आधार पर इसे अगड़ों का आंदोलन कह देना ठीक नहीं है. जब राजकुमार शुक्ल सूद का कारोबार करते थे, तब वे आंदोलन नहीं करते थे. आंदोलन में उतरने के बाद वे खुद कंगाल हो गये थे. दूसरों की मदद से आंदोलन करते थे. राधूमल मारवाड़ी की गिरफ्तारी के बाद चंपारण में जैसी भीड़ उमड़ी थी, वह इस बात का सुबूत है कि राधूमल की पहचान सिर्फ मारवाड़ी व्यापारी के रूप में नहीं थी. इसके अलावा पीर मोहम्मद मूनिस और शीतल राय जैसे लोग अगड़ी जाति के नहीं थे. शेख गुलाब भी बहुत संपन्न किसान नहीं थे.

मगर यह बात सही है कि गांधी जी के सत्याग्रह का फोकस सिर्फ नील की खेती, तिनकठिया और नील प्लांटरों के खिलाफ था. उन्होंने यहां की किसानी की मूल समस्या में जाने की कोशिश नहीं की. वह आंदोलन संपूर्ण किसान आंदोलन नहीं था. बाद में जब सहजानंद सरस्वती ने किसान आंदोलन की शुरुआत की तो उन्होंने खास तौर पर इस तथ्य को ध्यान में रखा. हालांकि उस वक्त किसान आंदोलनकारियों के चंपारण में प्रवेश पर कांग्रेस की सरकार ने ही रोक लगा दी गयी थी.

बाद में इसी चंपारण में साठी भूमि घोटाला का कोढ़ फूटा और जिसने आजाद बिहार की पहली सरकार के चेहरे पर कालिख पोत दी. लिहाजा साठी के नाम पर अलग कानून बनाना पड़ा.

हालांकि सवाल यह नहीं है कि गांधी ने चंपारण में क्या किया. क्योंकि उस वक्त उनका दिमाग दूसरे आंदोलन में लगा हुआ था. सवाल यह है कि हमने उस आंदोलन से प्रेरणा लेकर इसे कैसे आगे बढ़ाया. यह जानने-बूझने और सीखने की बात है. मगर पहले गांधी के जाने के तत्काल बाद की परिस्थितियों को देखने-परखने की जरूरत है.

(अगले अध्याय में पढ़ें गांधी के जाने के बाद राजकुमार शुक्ल और पीर मोहम्मद मूनिस जैसे गांधी के सहयोगियों के साथ क्या हुआ)

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