पनिया के जहाज से पलटनिया बनि अइहौ पिया…

खबर आई है कि बिहार की सात बड़ी नदियों को केंद्र सरकार ने अपनी राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना में शामिल कर लिया है. इस परियोजना में जहां देश भर की 111 नदियां हैं, बिहार की गंगा, कोसी, गंडक, घाघरा, सोन, पुनपुन और कर्मनाशा नदी भी है. एक बार यह परियोजना पूरी हो जाये तो फिर इन नदियों में भी पानी के जहाज चलेंगे. गंगा में तो चल भी रहे हैं. बंगाल के हल्दिया से यूपी के इलाहाबाद तक 1620 किमी लंबा राष्ट्रीय जलमार्ग एक है, जिसका बड़ा हिस्सा बिहार में पड़ता है. इसमें इन दिनों किसिम-किसिम के जहाज चलते मिलते हैं. ये और बात है कि ये जहाज कई दफा कहीं फंस जाते हैं तो फिर गड्ढा खोद कर उन्हें निकाला जाता है और फिर आगे बढ़ाया जाता है. अमूमन इन जहाजों के साथ एक ड्रेजर नाम की मशीन भी चलती है, किसी बड़े नेता के काफिला के आगे जैसे पुलिस की गाड़ी होती है, जो रास्ता साफ करते चलती है, ताकि नेताजी की कार कहीं जाम में न फंस जाये. ड्रेजर मशीन का भी वही काम है. वह खुदाई करती रहती है.
बहरहाल, यह अच्छा है. मुझे बार-बार बचपन के वो दिन याद आते हैं, जब हम भग्गू सिंह के जहाज पर बैठकर मुंगेर से खगड़िया आया-जाया करते थे. ऐसे जहाज आज भी साहिबगंज-मनिहारी और राजमहल-मालदा के बीच चला करते हैं. पहले भी खूब जहाज चलते थे. पटना के पहलेजा घाट से ही पार होकर गांधी पहली दफा चंपारण गये थे. भागलपुर से सहरसा जाने के लिए एक ट्रेन हुआ करती थी, जिसका नाम ही था, घाट गाड़ी. वह ट्रेन बरारी स्टेशन तक आती थी, फिर सारे यात्री रेलवे की जहाज पर सवार होकर नवगछिया या बिहपुर उतरते थे, फिर वहां से ट्रेन पर सवार होकर सहरसा जाते थे. यह तो घाट पार कराने वाले जहाजों की कथा है. कुछ जहाज लंबी दूरी वाले चलते ही होंगे, जिन पर सवार होकर शरतचंद का श्रीकांत कलकत्ते से बनारस जाता होगा, भिखारी ठाकुर कलकत्ता जाते होंगे और महिंदर मिसिर ने जिसके बारे में गीत लिखा होगा, पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइहो पिया, लेले आइहो हो, पिया सेनूरा बंगाल के… जिसे शारदा सिंहा की आवाज ने इम्मोर्टल बना दिया.
अब वह जमाना गुजर गया. बिहार की नदियों के सारे घाट अब सिर्फ स्नान घाट और अंतिम क्रिया घाट बनकर रह गये हैं. जहाज क्या, नावें भी कम ही चलती हैं. जगह-जगह पुल बन गये हैं. और हम बिना भीगे नदियों को पार कर जाते हैं. नींद में हों तो पता भी न चले कि कब हमने नदी पार कर ली. इसलिए कवि नरेश सक्सेना ने लिखा है, पुल पार करने से पुल पार होता है, नदी पार नहीं होती. नदी पार नहीं होती, नदी में धंसे बिना. इसलिए अब बिहार की औरतें परदेस जाने वाले पतियों-प्रेमियों के लिए नहीं गातीं कि पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइहो पिया… अब वे गाती हैं, राजधानी पकड़ के आ जइहो. हालांकि राजधानी के बदले वे श्रमजीवी पकड़ के या जनसेवा पकड़ के गातीं तो ज्यादा सामयिक होता. खैर…
तो खबर यह है कि केंद्र सरकार फिर से बिहार में पनिया जहाज चलवाने वाली है. शायद जमाना फिर से पलटी खा रहा है. हमारे नार्वे वाले मित्र डॉ. प्रवीण झा लिखते हैं कि वहां रास्ते में ढेर सारी ऐसी नदियां मिलती हैं, जिन पर पुल नहीं होते. लोग गाड़ी समेत जहाज पर सवार हो जाते हैं और फिर नदी पार करते हैं. जबकि नार्वे दुनिया का सबसे संपन्न और खुशहाल देश माना जाता है. तो हम भी फिर से उसी रास्ते पर जा रहे हैं. मगर क्या सचमुच उसी रास्ते पर हैं? यह बड़ा गंभीर सवाल है.
दरअसल यह संदेह इसलिए उठता है, कि इसी बिहार में अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण का एक जहाज मई महीने से ही बक्सर में फंसा है. महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर के नाम वाला यह जहाज चौसा जा रहा था. उसे तीन दिनों में वहां पहुंचना था. मगर वह बक्सर के सती घाट पर फंस गया. क्योंकि वहां दो मीटर से भी कम पानी था. दरअसल यह स्थिति गंगा नदी में सिर्फ बक्सर के पास ही नहीं है. फरक्का से इलाहाबाद के बीच जगह-जगह यह समस्या उत्पन्न होती है. नदी की गहराई ज्यादातर जगहों पर काफी कम होती है. क्योंकि फरक्का बराज की वजह से इस इलाके में हर जगह नदी गाद से भरी है और धाराएं कई भागों में बंट गयी हैं. ऐसे में गर्मियों में इस जलमार्ग पर जो जहाज चलते हैं, उसके आगे गाद साफ करने वाली एक मशीन ड्रेजर भी चला करती हैं.
यही स्थिति कोसी और गंडक की भी है जो तटबंधों और बराज की वजह से साल के नौ महीने काफी उथली रहती है. बाढ़ के दौरान ही इन नदियों में इतना पानी होता है कि नावें चल सकें. इन नदियों में जहाज कम ही चलते हैं. हमने कभी इनमें जहाज चलने की बात नहीं सुनी. मगर सरकार हर हाल में इन दोनों नदियों में जहाज चलाना चाहती है, क्योंकि उसने नेपाल से वादा किया है कि वह उसे समुद्री मार्ग देगी. इसके एवज में भारत सरकार नेपाल से कोसी और गंडक नदी पर नेपाल के इलाके में हाईडैम बनाने की इजाजत चाहती है. अकेले कोसी पर प्रस्तावित डैम से 35 हजार मेगावाट बिजली पैदा होने की बात कही जा रही है. इस परियोजना पर जापान की काफी पहले से नजर रही है. अब शायद मौजूद सरकार के चहेते उद्योगपतियों की भी निगाह गयी है.
बहरहाल सवाल यह है कि पनिया जहाज चले, मगर चले तो कैसे चले? क्या हमारी नदियां इन जहाजों का भार सहने लायक बची हैं. पिछले दिनों पुणे की एक संस्था मंथन अध्ययन केंद्र ने बिहार के प्रस्तावित जलमार्गों का अध्ययन किया. आज उसकी रिपोर्ट पटना के गांधी संग्रहालय में आयोजित एक सभा में रिलीज की गयी. यह रिपोर्ट कई मसलों पर सवाल उठा रही है. पहला यह कि यह ठीक है कि जलमार्ग सस्ते होते हैं और पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं, मगर क्या व्यावहारिक रूप से ये वाकई सस्ते हैं. क्या इस परियोजना में केंद्र सरकार बिहार सरकार को शामिल कर रही है. क्या स्थानीय मल्लाहों और मछुआरों को भागीदार बनाया जा रहा है. क्या नदियों में इतना पानी है कि वहां जहाज चल सके.
इस रिपोर्ट को साझा करते हुए पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीपाद धर्माधिकारी ने कहा कि संभवतः इसके लिए सरकार नदियों में चार मीटर गहरी और चालीस मीटर चौड़ी नहरनुमा खुदाई करेगी ताकि इन जलमार्गों में परिवहन सुचारू रूप से हो सकेगा. तो क्या हमारी नदियां जो पहले से खस्ताहाल है, इस सर्जरी को झेल पायेगी? सवाल सचमुच गंभीर हैं.
मेरा भी एक सवाल है. क्या इस प्रस्तावित अंतर्देशीय जलमार्ग में सिर्फ मालवाहक जहाज ही चलेंगे या फिर आमलोगों को भी घाट पार करने की इजाजत होगी? यह सुझाव भी है कि पहले बिहार की नदियों को थोड़ा सेहतमंद बनाइये, इन्हें 1980 के पहले वाली स्थिति में लाइये. ताकि इनमें सुगमता से पनिया जहाज चल सकें. वरना मरती नदियां कहीं इस एक्सपेरिमेंट में और मर न जायें.

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