लोकतंत्र में कातर जनता की असली जगह कतार ही है #मानवश्रृंखला

पिछले साल जब शराबबंदी के खिलाफ मानव श्रृंखला का पहला आयोजन हुआ था तो यह फेसबुक पोस्ट लिखी थी. आज एक मित्र ने इस पोस्ट को शेयर करते हुए लिखा है कि इस आलेख में शराबबंदी के साथ दहेज प्रथा और बाल विवाह का विरोध भी जोड़ दें तो यह आलेख आज के लिए भी फिट है. बस इस बार के आंकड़े थोड़े अलग होंगे…

पुष्यमित्र

लोकतांत्रिक शासकों के ऊपर भी कभी-कभार मध्यकालीन सत्ताधीशों वाली सनक सवार हो जाती है. वे भी जमीनी काम छोड़ कर भांति-भांति के करतबों को अंजाम देने में जुट जाते हैं. कुछ ऐसा ही हाल हाल के दिनों में हमारे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का है जो अपनी तीसरी पाली में लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह हुए जा रहे हैं. अब ऐसे मौके पर कोई बेसुरी बात कहने से यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम् वाली स्थिति हो जाने का खतरा है, बहुत मुमकिन है कि उस निषाद की तरह अपनी प्रतिष्ठा का भी ह्रास हो जाये. फिर भी, प्रतिष्ठा को दावं पर लगाते हुए भी, कुछ कह डालने का साहस कर रहा हूं.

कल 21 जनवरी को हमारे सूबे में दो से ढाई करोड़ लोग बिहार सरकार के शराबबंदी के फैसले में 45 मिनट तक कतार में खड़े रहेंगे. इस आयोजन में भाग लेने वाले हर व्यक्ति को कम से कम सवा दो घंटा इस आयोजन के लिए खर्च करना होगा. यह कतार 11,292 किमी लंबी होगी, जो विश्व की सबसे लंबी मानव श्रृंखला होगी. इस दौरान साढ़े चार घंटे हाइवे पर गाड़ियों का परिचालन बंद रहेगा.

भाव यह है कि बिहार के लोग पिछले साल अप्रैल महीने में लागू हुई शराबबंदी से इतने प्रसन्न और भावविह्वल हैं कि वे सरकार का आभार व्यक्त करने के लिए कतार में खड़े होंगे. कतार में हर पांच में से एक बिहारी खड़ा होगा. मगर क्या यह सब इसी तरह सच है, जैसा बताया जा रहा है. अगर यह सब सच है तो इस पत्रकार को ढूंढने पर भी ऐसा व्यक्ति क्यों नहीं मिल रहा जो खुशी-खुशी कतार में खड़े होने के लिए तैयार है.

स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे और जीविका से जुड़ी स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं. कल आप जहां देखेंगे, वहां ये लोग ही खड़े मिलेंगे. कह सकते हैं कि शराबबंदी से सबसे अधिक फायदा इन्हीं लोगों को हुआ है. पुरुष तो बेवड़े हैं, दुखी हैं, वे क्यों समर्थन करेंगे. बहुत मुमकिन है, आपकी बात सच हो. हालांकि मैं खुद को शराबबंदी का सबसे बड़ा समर्थक मानता हूं और न बच्चा हूं न स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिला.

कहते हैं, नीतीश जी जीविका पर बड़ा जोर है. चुनाव के वक्त भी जीविका की तरफ से स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को निर्देश जारी होता रहा है. इस बार खबर आ रही है कि जिला शिक्षा पदाधिकारी लोग गुप्त और प्रकट तरीके से बच्चों के अभिभावकों को इशारे कर रहे हैं कि लाइन में खड़े नहीं हुए तो एडमिशन कट. और एडमिशन कट तो न साइकिल मिलेगा, न ड्रेस और न बैग. सासाराम वाले अफसर ने तो बाकायदा लेटर जारी कर दिया है.

अब चाहे जैसे जुटायें नीतीश जी के अफसरों को दो से ढाई करोड़ लोग हर हाल में जुटाने हैं. गांधी मैदान फिर से चमक रहा है. सड़कों के बीचो-बीच किमी वाले निशान बनाये जा रहे हैं. नीतीश जी की अपील वाले पोस्टर बांटे जा रहे हैं. गुरुजी का बकाया वेतन जारी कर दिया गया है, ताकि वे खुशी-खुशी इस यज्ञ में आहुति दे सकें. मगर इस यज्ञ का मकसद क्या है? हासिल क्या है? क्या कोई पूछ सकता है? क्या लोगों को यह जानने का अधिकार है कि उनके बच्चों को क्यों कतार में खड़ा किया जा रहा है? अब यह मत कहियेगा कि कतार में तो लोगों को मोदी ने भी खड़ा किया था, तब आप क्यों चुप थे.  कह ही डालियेगा तो क्या करूंगा… चुप हो जाऊंगा… लोकतंत्र में कातर जनता की असली जगह कतार ही है.

Spread the love
  • 1
    Share

Related posts