दिल्ली में हर पेड़ पर्यावरण के हक में डटा सिपाही है, हम अपने ही रक्षकों की अकारण बलि कैसे दे सकते हैं

पेड़ लगाओ-पेड़ लगाओ

आओ भैया पेड़ लगाओ

सब मिलजुलकर पेड़ लगाओ

गड्ढा खोदो पेड़ लगाओ

 

पेड़ बताओ क्या देता है

पंथी को छाया देता है

सबको साफ हवा देता है

चिड़ियों को वह घर देता है.

तकरीबन 29-30 साल पहले की बात है, जब मैंने यह कविता लिखी थी. अपने स्कूल के एक प्ले के लिए, जिसका नाम था पेड़वा कटाइल हो रामा. इस प्ले का प्रदर्शन बाद में रांची के बिरसा स्टेडियम में भी हुआ था, जिसे तीसरा पुरस्कार मिला था. आज याद करता हूं तो लगता है कि इस प्ले की कहानी भी तकरीबन वैसी ही थी, जैसी कहानी इन दिनों दिल्ली में घट रही है. सरकार विकास के नाम पर 16 हजार पेड़ों को काटने में जुटी है और आमलोग पेड़ों को बचाने के लिए सड़कों पर उतर गये हैं. चिपको आदोलन की पुनरावृत्ति हो रही है.

सरकारी पक्ष का वही तर्क है. अगर विकास चाहिए तो पेड़ काटने ही पड़ेंगे. सरकार पेड़ों की कटाई का मुआवजा देने के लिए तैयार है. बदले में कहीं और एक के बदले दस पेड़ भी लगाने के लिए तैयार है. मगर दिल्ली के लोग कह रहे हैं कि कहीं और पेड़ लगा देने से क्या हमारे आसपास का पर्यावरण बेहतर हो पायेगा? सवाल वाजिब है, लिहाजा हाईकोर्ट ने चार जुलाई तक का स्टे दे दिया है.

पेड़ इसलिए काटे जा रहे हैं क्योंकि दिल्ली की छह कॉलोनियों का विस्तार होना है और वहां सरकारी अफसरों के लिए क्वार्टर बनने हैं. यह सब उस दिल्ली में हो रहा है, जहां की हवा इतनी जहरीली हो गयी है कि बार-बार ऑड-इवन जैसे फैसले लेने पड़ रहे हैं और यह कोर्ट का आदेश है कि जैसे हवा में प्रदूषण की मात्रा नियत सीमा से अधिक हो जाये तत्काल ऑड-इवन लागू कर दिया जाये. इसी दिल्ली में अक्सर धुएं के बादल छा जाते हैं. उस दिल्ली में कोई भी सरकार पेड़ काटने के बारे में कैसे सोच सकती है, यह तो हैरत-अंगेज है.

दिल्ली जैसे महानगर के लिए तो हर पेड़ एक सिपाही है, पर्यावरण के पक्ष में लड़ने वाला योद्धा है. उस दिल्ली में 16 हजार पेड़ों को काट कर हटा देने का मतलब है 16 हजार सिपाहियों की बेवजह बलि दे देना. और यह बलि दिल्ली में विकसित क्वार्टर और बंगला संस्कृति की वजह से है. एनडीएमसी के इलाके में घूम आइये एक-एक मंत्री का बंगला कई-कई एकड़ों में फैला है. हालांकि इसी वजह से उस इलाके का पर्यावरण भी ठीक है. मगर जिस शहर में लोग एक-एक इंच जमीन हासिल करने के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं, वहां जन सेवकों के पास एकड़ों में फैला बंगला होना तो एक तरह की अश्लीलता ही है.

हर अंगरेजी शासन की उस भव्य जीवन शैली से आजतक प्रभावित हैं और हमारे शासक भी उसी अंदाज में जीना पसंद करते हैं. वरना मंत्रियों के लिए अलग अपार्टमेंट क्यों नहीं हो सकते. सचिवों के बंगलों को फ्लैट्स में क्यों नहीं बदला जा सकता, जहां एक बंगले में दस-बीस सचिव रह सकें. उसी तर्ज पर सरकारी अफसरों के लिए अपार्टमेंट या रेसिडेंशियल कॉम्प्लेक्स भी बनाये जा सकते हैं, जहां हजारों अफसर एक साथ बेहतर माहौल में रह सकें. जिन छह कॉलोनियों को विकसित करने की बात है. वह विकास वर्टिकल भी हो सकता है. उस विकास का फैलाव होरिजेंटल ही क्यों हो.

अगर क्वार्टरों के उपर क्वार्टर बन जाये, सीढ़ी या लिफ्ट लग जाये तो पैसा भी कम खर्च होगा और जमीन भी. हमें आवासों के मामले में अपार्टमेंट संस्कृति को अपना लेना चाहिए और जितनी जमीन बच गयी है उसे पेड़ों और वन्य जीवों के लिए छोड़ देना चाहिए. अगर हमने तत्काल ऐसा नहीं किया तो दिल्ली में पेड़ के साथ-साथ इंसान भी खत्म हो जायेंगे.

क्या सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करके दिल्ली में पेड़ों के मामले में वही फैसला नहीं सुनाना चाहिए जो उसने तालाबों के मामले में 2011 में सुनाया था कि किसी भी तालाब को भरना या उस पर अतिक्रमण करना गैरकानूनी होगा, भले ही वह किसी का निजी तालाब ही क्यों न हो और तालाबों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी होगी. पेड़ों के मामले में कम से कम शहरों में हमें ऐसे ही कानून की जरूरत है.

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