मैं राजपूत हूं और मुझे आपको राजपूत कहते शर्म आती है

यह आलेख एक उन्नीस साल के युवक ने लिखा है, जिसने पत्रकारिता की पढ़ाई की है. उम्र के हिसाब से तो इसे करनी सेना वालों के पीछे तलवार उठाकर हू-हू करना चाहिए था. मगर इसने बहुत समझदारी से पूरे मसले को यहां रखा है और काफी विनम्र शब्दों में अपनी आपत्ति दर्ज की है.

प्रकाश अजेय कुमार

मैं एक राजपूत हूँ. और आज मैं जो लिखने जा रहा हूँ उससे हो सकता है कि कुछ राजपूतों की भावनाओं को ठेस पहुँचे, उसके लिए मैं पहले ही माफी मांगता हूँ.

मैं यूँ फिल्मों के बारे में बात नहीं करता, पर आज बात फ़िल्म “पद्मावत” की. एक ऐसी फिल्म जिसका कुछ जाहिल स्वजातीय लोग बिना देखे विरोध कर रहे हैं. न फ़िल्म मैंने देखी है और न ही करणी सेना वालों ने. फ़िल्म देखी है राजपरिवार के प्रो कपिल कुमार जी ने, अरविंद सिंह जी ने और डॉ चंद्रमणि सिंह जी ने. इन तीनों ने एक सीन पर आपत्ति जताई है. सीन ऐसा है कि खिलजी अपने हरम में आराम कर रहा है और महारानी पदमिनी को स्वप्न में अपनी माशूका के रूप में देख रहा है. इस बात पर इतना विवाद? ये ह्यूमन साइकोलॉजी है कि इंसान जिस भी चीज़ या इंसान को पाने की चाहत दिल से करता है वो उस चीज़ को अपने स्वप्न को उसी रूप में देखता है. मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि यह सामान्य मानव व्यवहार है.

जहाँ तक मैंने महारानी पद्मिनी की कहानी पढ़ी है उस आधार पर यही जानता हूँ कि रावल रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी के बीच एक मैत्री समझौता हुआ था जिसमें खिलजी का यह प्रस्ताव था कि उसे महारानी के दीदार करवाये जाएं सामने से नहीं तो दर्पण में ही सही. रतन सिंह इसके लिए राज़ी हो गए जिससे रुष्ट होकर स्वरूप कई मेवाड़ी वीर गढ़ छोड़ कर चले जाते हैं. तय दिन को खिलजी को महारानी के दीदार दर्पण में करवाए जाते हैं और वह दिल्ली की ओर कूच करता है. रतन सिंह उसे छोड़ने अपने राज्य की सीमा तक जाते हैं जहाँ उन्हें जबरन बंदी बना लिया जाता है और दिल्ली के बंदीगृह लाया जाता है. तत्पश्चात, एक संदेश मेवाड़ दुर्ग में आता है जिसमें रतन सिंह के बदले महारानी पद्मिनी को दिल्ली पहुँचाने की बात कही जाती है.

यह संदेश सुन महारानी विचलित हो उठती हैं और खुद रूठे हुए सेनापति गोरा को ढूंढने वन में चली जाती हैं. उन्हें गोरा एक पेड़ के नीचे मिल जाता है और वह उसे खिलजी का संदेश सुना गढ़ लौट आने और राणा को मुक्त कराने की रणनीति तैयार करने की गुजारिश करते हुए पैरों पर झुक जाती हैं. बकौल मेवाड़ के राजकवि, यह देख गोरा पीछे हटते हुए कहता है, “हे! हे! यह क्या करती हो रानी, तुम सिसोदिया कुल की जगदम्बा हो, एकलिंग की प्राणप्रतिष्ठा, ज्योति अग्निगंधा हो. तुम बैठ महलों में देखो समर भवानी, और खिलजी देखेगा केसरिया तलवारों का पानी. जब तक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीष रहेगा, महाकाल से भी राणा का मस्तक नहीं कटेगा. है एक लिंग की शपथ राणा सकुशल वापस आएंगे, प्रलय के घोर प्रभंजन भी न रोक पाएँगे.”

गोरा ने अपना संदेश वाहक खिलजी के पास भेजा और कहा कि रानी आने को तैयार हैं और उनके साथ उनकी सात सौ सखियाँ भी आएँगी. इधर 700 डोले सज गए और हर डोले में स्त्री वेश में एक-एक वीर मेवाड़ी सपूत बैठ गए साथ में 4 उठाने वाले. यानी कि कुल 3500 मेवाड़ी वीर कट मरने को दिल्ली की ओर चले. वहाँ पहुंच संदेश भिजवाया गया कि महारानी की इक्षा है कि वह एक बार रतन सिंह से मिल लें. खिलजी ने मिलन का फरमान दिया. रानी के रूप में आए लोहार ने राजा साहब के बंधन काटे और उन्हें मुक्त किया पर खिलजी के सेनापति को इसकी जानकारी हो गई और उसने युद्ध के लिए सेना को आवाज़ लगाई पर तब तक गोरा द्वारा बनाई रणनीति मूर्त रूप ले चुकी थी.

राजाजी आज़ाद थे और अपनी सीमा की ओर अग्रसर हो चुके थे. बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, राणा तो सकुशल मेवाड़ पहुँच गए पर गोरा उसका भतीजा बादल समेत सभी मेवाड़ी वीर सदगति को प्राप्त हो चुके थे. खिलजी अपनी इस हार से कुपित था और अपना प्रतिशोध पूर्ण करने के लिए उसने मेवाड़ पर चढ़ाई की और रणक्षेत्र में राणा रतन सिंह को छल से मौत के घाट उतारने के बाद जब जब किले की ओर बढ़ा तब महारानी पद्मिनी ने अपनी इज़्ज़त और शौर्य को अक्षुण रखने के लिए जौहर का विकल्प चुना. ये है महारानी पद्मिनी की कहानी जैसा कि इतिहास बताता है. किसी के फ़िल्म बना देने से इतिहास बदल नहीं सकता है.

हम राजपूत हैं और हम न सिर्फ राजव्यवस्था में पूर्ण आस्था रखते हैं बल्कि हम सहिष्णुता का भाव भी रखते हैं. ज़रूरी यह है कि हम अपने आने वाली पीढ़ियों को अपने स्वर्णिम इतिहास के बारे में बताएं-पढ़ाएं न कि फिल्मों के ऊपर विवाद का हिस्सा बनें. और इसका विरोध कर रहे स्वजातीय जाहिलों को यह संदेश देना चाहता हूँ कि हम राजपूत हैं हमारा काम लोगों की रक्षा करना है ना कि झूठे अहंकार को शांत करने के लिए निहत्थों पर, बच्चों पर हाथ उठाना. और जो लोग ऐसा करते हैं उन्हें राजपूत कहते हुए मुझे शर्म आती है. आपकी वजह से आज हमारे शौर्यवान इतिहास पर कालिख पुत गई है.

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One Thought to “मैं राजपूत हूं और मुझे आपको राजपूत कहते शर्म आती है”

  1. सही कहा प्रकाश भैया आज राजपूत अपना कर्तव्य ही भूल गए है। उनका कर्तव्य क्या है, मेरे भी जेहन में एक सवाल बचपन से मुझसे लड़ाई करते आ रहा है आखिर राजपूत इतने बुरे कैसे हो सकते है ।
    राजपूत गलती नहीं रजपूत गलती करते है।