मैं किशनगंज हूं, सोने की चिड़िया के सुर्खाब परों के जैसा

फिरोज किशनगंज के रहने वाले हैं, जेएनयू से स्पेनिश की पढ़ाई की है और अभी चेन्नई शहर में एक निजी शहर में कार्यरत हैं. उनके दिल में किशनगंज बसता है. वे हमेशा अपने शहर, अपने इलाके को याद करते हैं. पढ़िये, उन्होंने इस पोस्ट में किशनगंज को किस शिद्दत से याद किया है.

फिरोज आलम

मैं किशनगंज हूँ. सीमांचल की गोद मे बैठा एक अनाथ, एक अछूत हूँ, एक कमज़ोर व बीमार पहचान हूं, इसलिए साल के पहले दिन भी खामोश हूँ. अब तो बस बिस्तर पर पड़े किसी रोगी की तरह इस उम्मीद में जिन्दा हूँ कि कोई मेरा लाल मेरी खोई हुई पहचान को वापस लौटा दे. मैं, उस समय खुद को संपन्न, शक्तिशाली महसूस करता था जब भूखे, प्यासे, बेरोजगार लोग पलायन कर के मेरी आगोश में शरण लेते थे, अब मैं इतना कमजोर हो गया हूं कि मेरे लाल मुझे बीमार छोड़ कर परदेश जा रहे हैं.

आरंभ तो पता नहीं, लेकिन मेरा बचपन बहुत सुंदर, खुशहाल था जब लोग मुझे प्यार से नेपालगढ़ कहते थे, ज्यों-ज्यों जवान हुआ तो लोग आलमगंज, और अब मुझे लोग किशनगंज कहने लगे हैं.

फिरोज आलम

मेरे शरीर मे बहने वाली रक्त की कई धाराएं, जैसे महानंदा, कोल, कनकई, डोंक इत्यादि, मेरे शरीर में रक्त का संचार करने वाली धमनियां जैसी हैं. इन धमनियों में जवानी (आलमगंज) का रक्त बहुत ही प्रबलता से संचार हुआ करता था पर अफसोस कि कहीं-कहीं कोलेस्ट्रॉल (भू माफिया, बालू खनन माफिया, भट्टा इत्यादि) ने कई धमनियों में अवरोध उत्पन्न कर दिया है. लिहाजा रमज़ान जैसी महत्वपूर्ण धमनी जो रक्त को मेरे दिल तक पहुंचाती है, अब सूखने की कगार पर है. इस बीमारी का इलाज अभी तक झोला छाप डॉक्टरों से ही कराया जा रहा है, उम्र के आखरी पड़ाव में इतने रुपये नहीं कि दिल्ली से इलाज कराऊँ.

अपने बचपन और जवानी के वो सुहाने दिन कभी नहीं भूल सकता, जब मेरे चारो ओर अलग-अलग जमींदारों की इस्टेट हुआ करती थी. ऐसा लगता था कि जैसे ये जमींदार मेरे अंगरक्षक हों. मेरे अंगरक्षकों की शक्ति और प्रबलता से मैं खुद को बहुत शक्तिशाली समझ रहा था. हिन्दुस्तान अगर कभी सोने की चिड़िया हुआ करती थी तो मैं उस सोने की चिड़िया का सुंदर पंख था. इतना सम्पूर्ण, समृद्ध और सशक्त था कि दूसरे प्रान्तों से लोग यहां आया करते थे, पर आज गंगा उल्टी बह रही है.

कदम रसूल की मजार

कदम रसूल, रहमानपुर, गांगी, पनासी सूफी जैसे बुजुर्गों के अध्यात्म का केन्द्र हुआ करता था मैं, मानो इन चिरागों से मेरी अंतरआत्मा जगमगाया करती हो. उस समय शिक्षा और ज्ञान दोनों व्यक्तित्व का पहचान हुआ करते थे. अब शिक्षा है पर अध्यात्म का ज्ञान नहीं है. सर पर टोपी भी है, कपाल में सज़दे के निशान भी हैं, पर चेहरा बेनूर है. ऐसा लगता है कि काली अंतरात्मा की छाया चेहरे पर हो. बेनुगढ़ का टीला हो या ठाकुरगंज का भीम तकिया ये मेरी गंगा-जमुनी तहजीब का एक हिस्सा आज भी है.

मेरे आंगन में धूमधाम से खगड़ा मेला लगता था, चहल-पहल रौनक कुछ ऐसी होती थी मानो हर वर्ष मेरे घर शादी समारोह का भव्य एवं सुंदर आयोजन होता हो. कई महीनों तक आस-पास के जमींदार, किसान, मज़दूर, आम जनता इस प्रकार के आयोजन और पिकनिक में मस्त रहते थे. किसान अपने जरूरत की तमाम खरीदारी करते, राजस्थान से ऊंट, दूर-दराज से मवेशियों की शानदार मंडी लगती थी.

खगड़ा का किला

जैसे-जैसे इस्टेट और जमींदारों के क़िले ध्वस्त होने लगे, यह चहल-पहल भी वीरानी में बदलने लगी. किले खंडहरों में बदलने लगे, अंग्रेज मेरे सोने के आभूषणों को लूट कर ले गये. जमीन पर पूंजीपतियों ने कब्जा जमाना आरंभ कर दिया. बाहर से आ कर बसने वालों ने मेरे बच्चों के दिमाग मे साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया.

देश की आज़ादी की खुशियां अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि 1947 के बाद गुलामी के दल-दल में धंसता चला गया. आज़ादी, समृद्धि, सशक्तीकरण के नाम पर चुनाव होते गए, मेरे बच्चों ने खूब वोट दिया, दिल खोल कर मतदान किया कि शायद मेरी खोई हुई पहचान लौट आये. मगर सब लुटेरे निकले, अलग-अलग राजनीतिक दलों ने अपने-अपने एजेंट भेजे ठीक उन्हीं अंग्रेजों की तरह जो मेरी सोने की चिड़िया के पंख उखाड़ कर ले गये थे. अब तो मेरे पंख ही नहीं बचे कि फिर से उड़ान भरूँ, उस आसमान की ओर.

निगाह-ए-इश्क़ का अजीब ही शौक देखा
तुम ही को देखा और बेपनाह देखा

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