यहां आज भी अपने घर का सपना सीमेंट-बालू से नहीं बांस से पूरा होता है

कोसी के इलाके में बांस का इस्तेमाल किस-किस रूप में होता है, आप उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. यह तसवीर सुपौल के एक स्कूल की है, जो पूरी तरह बांस से बनी है. तसवीर डाउन टू अर्थ से साभार…

मिथिलेश कुमार राय

मिथिलेश कुमार राय की पहचान एक संवेदनशील कवि-कथाकार के रूप में है. जीवन में छोटी-छोटी चीजों के बीच खुशियां तलाश लेने की और उसके जाहिर करने की प्रवृत्ति उन्हें समकालीन लेखकों के बीच खास बनाती है.

बांस के बारे में कभी कुछ सुनता हूँ तो आँखों के सामने हठात् ही कुछ दृश्य कौंध जाते हैं. कुछ दिन पहले की बात है. कपलेश्वर की विधवा कह रही थीं कि उस दिन कुछ बाँस बिक गए तो थोड़े से पैसे आए हैं हाथ में. सोच रही हूँ कि एकबार शहर के डॉक्टर से दिखा आऊं. घुटने के दर्द से बेचैन हो जाती हूँ कभी भी. फिर उन्हें अपने मरहूम पति की याद आ गई. बताने लगीं कि उन्होंने बाँस के तीन झुरमुट लगाए थे. जब तब कुछ बिक जाता है तो हाथ में दो पैसे आ जाते हैं और जीवन में बड़ा सहारा हो जाता है.

आप किसी भी गांव का निरीक्षण करेंगे तो पाएंगे कि यहाँ किसी के पास दस-बीस वृक्ष न हो तब भी बाँस का एक झुरमुट जरूर होता है. इसका कारण है. गांव की एक बड़ी आबादी के पास अब भी पक्का घर एक सपना ही है. यहाँ का ज्यादातर घर आज भी बाँस के खम्भे और उसी की खपच्चियों के सहारे खड़ा रहता है. दुनिया में बाँस के और ढेरों उपयोग होते होंगे, पर यहाँ यह एक बड़े सहारे के की उम्मीद में लगाया जाता है. इस क्रम में मुझे एक गांव की भी याद आ रही है. फतेहपुर की.

फतेहपुर एक गजब का गाँव है. गांव में प्रवेश करते ही जेब में पड़े मोबाइल से टावर गायब हो जाता है. स्कूल की छत पर चढ़ जाइये तो आपके मोबाइल में टावर आ जाता है. लेकिन छत के जिस कोने में टावर आता है आप वहीं डोलते रहिये. परिधि से बाहर निकले नहीं कि टावर आपके मोबाइल को अलविदा कह देगा. तब आपको फोन लगाने या इंटरनेट कनेक्ट करने के लिए फिर से प्रयास करने पड़ेंगे.

कहते हैं कि हमारी जेब में पड़ा मोबाइल फोन हमेशा एक रे के संपर्क में रहता है जो मानव स्वस्थ्य के लिए खतरनाक होता है. लेकिन जहां रे का कोई खतरा ही न हो वहां क्या! कोई सुनता है तो उसे आश्चर्य होता है. संयोग से टॉवर आ भी जाता है तो जितनी देर की बात होती है उससे ज्यादा देर का हेल्लो-हेल्लो हो जाता है. कहते हैं कि यहाँ के लोगों को इसकी आदत सी हो गई है सो यह बात कोई खास बात नहीं है जिस पर चर्चा हो और कोई समाधान निकाला जाये ताकि आगे से बातें करने में कोई परेशानी न हो और मोबाइल में नेट भी द्रुत गति से चले.

दूर से यह गाँव बांसों का एक घना जंगल दिखता है. बांसों के झुरमुठ में जामुन के लंबे-लंबे और मोटे-मोटे पेड़ दिखते हैं. जैसे-जैसे गांव नजदीक आता जाता है-बांस और जामुन के जंगल में कच्चे-पक्के घर दिखने शुरू हो जाते है. गांव के खूब पास आ जाने के बाद ही पता चलता है कि बांस के जंगल में बसे इस गांव में पक्की सड़कें भी हैं और स्कूल और सामुदायिक भवन भी. कि गांव में बिजली भी है और गांव के घरों में एलसीडी और छतरी भी हैं. अंदर आने के बाद ही पता चलता है कि गांव में युवाओं के पास कम्प्यूटर भी हैं और कई परिवार के पास चार पहिया वाहन भी.

कहते हैं कि इस धरती पर पहले सिर्फ जंगल हुआ करता था. जंगल में ही गांव बसाये गये. जिन गांव के पास से जंगल पूरी तरह लुप्त हो गए कालान्तर में वे शहर में पतिवर्तित हो गए. जबकि जिन गांव ने अपने आस-पास कुछ पेड़-पौधों को रहने दिया-उनके पास गांव की संज्ञा रहने दिया गया.

दूर से जंगलनुमा दिखनेवाले इस गांव के पास बांस और जामुन के जंगल का किस्सा कुछ भी नहीं है. सब दादा परदादा के लगाये हुए हैं. लेकिन अब एक धरोहर के रूप में सबको इनसे मोह हो गया है. गांव की नई पीढ़ी के लोगों को भी विभिन्न तरह के वृक्षों के बागान लगाने में खूब मन लगता है. कदम आम के साथ-साथ महोगनी रबड़ और सागवान के पौधे रोपे जा रहे हैं. किसी को भी किसी के बारे में यह पता चलता है कि उन्होंने पचास पौधे लगाये हैं तो उनके मन में भी सौ पौधे लगाने के विचार उठने लगते हैं. डॉक्टर और इंजीनियर से भरे इस गांव का ग्राम देवी भी बांस के एक घने जंगल में विराजती हैं. जंगल में ही उनका मंदिर है. वहीं उनकी पूजा होती है. वहीं सालाना मेला लगता है वहीं लोग मनौती मांगते हैं. वहीं रात को मण्डली सजती हैं. वहीं कीर्तन होता.

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