यहां वनभोज के लिए जमा किये जा रहे हैं दस-दस के नोट

सांकेतिक तसवीर

मिथिलेश कुमार राय

पहली जनवरी अब बिलकुल पास आ गयी है तो लोग इसके बारे में तरह-तरह की योजना बनाने में दिमाग के घोड़े दौड़ाने लगे हैं. हालाँकि हद से ज्यादा व्यस्त हो चुके जीवन में अब रोजमर्रा के रूटीन को तोड़ने और कुछ अलग करने की भावना वैसी नहीं रह गई है. लेकिन पहली जनवरी की बात ही कुछ और है. यह सुबह की अच्छी शुरुआत की तरह ही अब भी महत्वपूर्ण माना जाता है. सभी लोग चाहते हैं कि वर्ष का पहला दिन खुशी-खुशी इस तरह बीते कि बस याद रह जाये और साथ ही साल भर के अन्य दिनों पर भी इसका प्रभाव रहे. इसके लिए सप्ताह भर पहले से ही लोग तरह-तरह की योजनाएं बनाने लगे हैं और सोच-सोच कर रोमांचित भी हो रहे हैं.

मिथिलेश कुमार राय की पहचान एक संवेदनशील कवि-कथाकार के रूप में है. जीवन में छोटी-छोटी चीजों के बीच खुशियां तलाश लेने की और उसके जाहिर करने की प्रवृत्ति उन्हें समकालीन लेखकों के बीच खास बनाती है.

नए साल के पहले दिन को कुछ अलग तरह से गुजारने के लिए दुनिया भर में सबसे अधिक पिकनिक का ही आइडिया लिया जाता है. लोग इस दिन अपने-अपने ग्रुप में या परिवार के साथ घर से बाहर निकलते रहे हैं. वे यहाँ-वहाँ घूमकर और खा-पी कर शाम को खिलखिलाते हुए घर लौटते हैं और देर तक इस बारे में बातें करते हैं. अब भले ही पिकनिक का प्रकार बदल गया हो और इसे मनाने को लेकर उस उत्साह को भी नोट नहीं किया जा रहा हो लेकिन वनभोज के रूप में यह गांव-जवार में आज भी कफी लोकप्रिय है. अन्य किसी दिन न सही लेकिन पहली जनवरी को यह दूर खेत में अब भी मनाया जाता है और इसके लिए एक जनवरी से सप्ताह भर पहले ही योजना तैयार किया जाने लगता है. हालाँकि बड़ी उम्र के लोगों में इसे लेकर उतनी दिलचस्पी नहीं देखी जा रही है. लेकिन इस पृथ्वी पर बच्चे और बड़े हो रहे बच्चे यानी किशोरों की भी एक दुनिया है और इस दुनिया में रहस्य और रोमांच भरे पड़े हैं. यह शायद इसलिए कि इन्हें दुनिया और दुनिया की चीजों की असलियत के बारे में ठीक से कुछ भी पता नहीं रहता है. तभी तो ये बात-बात पर खिलखिलाने लगते हैं और हरेक चीज में एक रहस्य ढूंढ़ कर रोमांचित होते रहते हैं!

कोई भी गांव है तो उसमें टोले हैं. जैसे शहर है तो मोहल्ला है. हरेक टोले में कुछ बच्चे हैं. जहां गांव बसा है उसके चारों तरफ खेत हैं. कहीं-कहीं बांसों का विशाल झुरमुठ है. आम के बगीचे हैं. यह सब जंगल का आभास कराता है. जंगल में ही वनभोज का आयोजन होगा. कैसे होगा. क्या-क्या बनेगा? किसको-किसको साथ लेंगे. किससे कितना पैसा लेंगे. अभी हरेक टोले के बच्चे स्कूल की छुट्टी के बाद इसी में उलझे हुए हैं. अब तक सबको पता चल गया है कि ये लोग वहां वनभोज करेंगे. बड़ी उम्र के लोग ठिठोली करते हैं कि बेटा, हमे भी न्यौता दे दो. योजना बना रहे बच्चे नहीं-नहीं करते दूसरी जगह महफ़िल ज़माने के लिए भाग खड़े होते हैं. कल कोई कह रहा था कि पुरबिया टोले के बच्चे वहां आम के बगीचे में तम्बू लगाएंगे. जबकि पछवारी टोले के बच्चों ने बांस के झुरमुठ को चुना है.

पता चला है कि बारह बच्चों का एक ग्रुप बना है. सारे बच्चे दस-दस के नोट इकट्ठे कर रहे हैं. इस 120 रूपये में वे कैसे क्या करेंगे, क्या यह जानना दिलचस्प नहीं है? उन्होंने गांव की एक लड़की को अपनी समस्या बताई है. लड़की ने उसकी मदद करने का आश्वासन दिया है और लिस्ट भी फ़ाइनल कर दिया है. हलवा पूड़ी सब्जी पापड़ और सेवई बनेगा. छोटा वाला गैस एक लड़का अपने घर से लाएगा. पूड़ी के लिए आटा भी सब अपने घर ही से लाएगा. नहीं तो इतने कम पैसे में क्या होगा. सब्जी की तो मिट्ठू के पाप की खेती ही है. मिट्ठू ने कहा है कि सब्जी जितनी चाहिए वह सब अपनी मम्मी से ले आएगा. विक्की एक साड़ी लाएगा. बड़ी वाली लड़की को तम्बू बनाना आता है. वह बना देगी. सबका यह भी विचार है कि खाना बनाने से पहले एक बार चाय बनेगी. जब वनभोज होता है कई लोग देखने आ जाया करते हैं. अबकी जो भी आएंगे उन्हें चाय दिया जायेगा. लोग भी क्या याद करेंगे. इसके लिए दूध और चीनी चाय का जुगाड़ भी हो जायेगा. मोहित की माँ कह रहे थी कि आधा किलो दूध वो दे देगी. लेकिन चीनी खरीदना पड़ेगा नहीं तो थोड़ा-थोड़ा सब अपने घर से ही लेते आएगा. सिर्फ चाय की पत्ती खरीदेंगे.

वनभोज के लिए हो रहे मीटिंग पर मीटिंग में रोज ही इतनी चर्चा कर लेने के बाद इस बात पर फोकस किया जा रहा है कि यह सब तो उस दिन की बात है. अभी तो सबको दस-दस रूपये का इंतज़ाम करना है. यह रकम आपके लिए मामूली होगी, आप बड़े हैं न. बच्चे तो दिमाग लगाएंगे ही कि दस का यह नोट कैसे जुगाड़ होगा!

 

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