लड़ कर लिया है खेलने का हक, अब बॉल बिहार के क्रिकेट मैनेजरों के कोर्ट में है

बीसीसीआई नहीं चाहती थी कि बिहार के क्रिकेट अपने राज्य के क्रिकेट बोर्ड की तरफ से खेलें. पहले जगमोहन डालमिया ने एसोशियेट मेंबर बनाकर किनारे कर दिया, फिर अदालत में इसी एसोशियेट मेंबर की रट लगाकर बीसीसीआई हमें रणजी खेलने से वंचित करती रही. मगर हमने लड़कर न्याय हासिल किया है. शशांक मुकुट शेखर लिख रहे हैं कि अब गेंद राज्य के क्रिकेट प्रबंधकों के पाले में है कि वे अच्छी व्यवस्था बनायें, अच्छी प्रतिभा को मौके दें, ताकि बिहार के क्रिकेटर देश भर में नाम कमायें…

शशांक मुकुट शेखर

शशांक मुकुट शेखर

याद कीजिए साल 1983 का क्रिकेट वर्ल्ड कप. कपिलदेव के नेतृत्व में वेस्टइंडीज की अजेय टीम को धूल चटाकर भारत ने वर्ल्ड कप जीता था. उस भारतीय क्रिकेट टीम को विश्वविजेता बनाने में बिहार के कीर्ति आजाद ने भी अहम भूमिका निभाई थी. बाद में सबा करीम अपने समय में भारतीय क्रिकेट टीम के महत्वपूर्व अंग बने. इनके बाद हम आज भी महेंद्र सिंह धोनी को बिहार का कहकर गर्व कहते फिरते हैं. आज बिहार के दर्जनों प्रतिभाशाली क्रिकेटर दुसरे राज्यों के लिए खेलकर अच्छा कर रहे हैं. हाल के वर्षों में बिहार के इशान किशन भारत की अंडर-19 टीम के कप्तान भी रह चुके हैं. इतनी प्रतिभा रहने के बावजूद पिछले 17 सालों से बिहार घरेलू टूर्नामेंटों में भी खेलने के लिए तरसता रहा है.

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में क्रिकेट के हित को ध्यान में रखकर एक फैसला दिया. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायाधीश एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूढ़ वाली पीठ ने बीसीसीआई को बिहार को रणजी ट्रॉफी सहित घरेलू टूर्नामेंट में हिस्सा लेने की अनुमति प्रदान करने को कहा है. इस पर भी बीसीसीआई के वकील इसके खिलाफ दलील पेश करते रहे. वे झारखंड और बिहार क्रिकेट को लेकर विवाद तथा बिहार के फुल मेंबर नहीं होने की बात दोहराते रहे.

ऐसे में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा का यह आदेश कि, ‘बिहार सत्तर के दशक से क्रिकेट खेल रहा है. झारखंड और बिहार क्रिकेट को लेकर जो विवाद चल रहा है, उसे बाद में सुलझाया जाएगा. पहले बिहार के खिलाड़ियों और टीम को खेलने दिया जाए’. अत्यंत सुखद है. सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद बिहार के क्रिकेटरों के लिए फिर से भारतीय टीम के लिए दावेदारी पेश करने का रास्ता खुल गया है. फुल मेंबरशिप की बात पर सुप्रीम कोर्ट का स्टैंड कि,’ बिहार को फुल मेंबरशिप उनके द्वारा बोर्ड के संचालन के लिए गठित कमेटी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन(सीओए) के समक्ष फुल मेंबरशिप की सूची में नए नियमों और मेमोरंडम ऑफ एसोसिएशन जैसे दस्तावेज प्रस्तुत करने के बाद दी जाएगी.’ सराहनीय है.

साल 2000 में झारखंड का गठन बिहार क्रिकेट के लिए कब्रगाह जैसा था. उस समय तत्कालीन बीसीसीआई अध्यक्ष जगमोहन डालमिया ने बिहार की बजाय झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन को पूर्ण सदस्य की मान्यता दी थी. फुल मेंबर नहीं होने के कारण बीसीसीआई ने साल 2000 के बाद बिहार के राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने पर रोक लगा रखी है. तब से ही बिहार के क्रिकेटर निर्वासन की जिन्दगी झेल रहे थे. इतने सालों में बिहार क्रिकेट की अंदरूनी कलह ने भी कितने ही प्रतिभावान क्रिकेटरों को अपना पैशन और प्यार त्याग देने को विवश कर दिया.

दरअसल यह समय क्रिकेट में बिहार के वापसी का समय है. हाल ही में सबा करीम को बीसीसीआई का जेनरल मैनेजर(क्रिकेट ऑपरेशंस) का पद सौंपा गया है. साथ ही अभी एक महीने पहले ही बिहार की अंडर-16 टीम ने बीसीसीआई के किसी भी स्तर के टूर्नामेंट में सबसे बड़ी जीत हासिल कर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को बिहार में क्रिकेट के लिए नवजीवन कहना उचित होगा.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सिर्फ बीसीसीआई को ही नहीं बिहार में क्रिकेट के नीति-निर्धारकों को भी साफ़ मन से सोचना होगा. बिहार क्रिकेट एशोसिएशन में आतंरिक कलह और डर्टी पॉलिटिक्स की बात तो जगजाहिर है. मगर खेल और खिलाडियों के हित, मेहनत व भविष्य के सम्मान के लिए खुले विचार लाने बहुत जरुरी हैं. यहाँ खिलाडियों के चयन में व्यतिगत पहुँच हावी रही है. पहले भी इसको लेकर कई खिलाडियों का दर्द सामने आता रहा है. इस कारण देश की तीसरी सबसे आबादी वाला राज्य तथा खेल में अत्यंत प्रतिभा संपन्न होने के बावजूद भी बिहार खेल के क्षेत्र में काफ़ी निचले स्तर पर है.

‘क्रिकेट एकेडमी ऑफ़ बिहार’ को बेहतर व सुविधा संपन्न बनाने पर जोर देने की आवश्यकता है. क्रिकेटरों की बेहतर ट्रेनिंग व कोचिंग के लिए प्रोग्राम तैयार किए जाने चाहिए. पटना स्थित मल्टी पर्पस ‘मोईनुल हक़ स्टेडियम’ अतीत में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों का भी गवाह बना है. 25,000 की क्षमता वाले इस स्टेडियम में तीन अंतर्राष्ट्रीय एकदिवसीय मैच हो चुके हैं. इसमें से 1996 क्रिकेट वर्ल्ड के दौरान हुआ था. मगर आज यह खस्ताहाल में पड़ा है. इसे अंतर्राष्ट्रीय मैचों के लायक बनाने के लिए सभी उपाय किए जाने चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बिहार क्रिकेट को लेकर उपरी सारे विवाद सुलझा दिए हैं. अब बारी बिहार में क्रिकेट प्रबंधकों की है. हमारे सामने दशकों से बंद सफ़लता के दरवाजे खोल दिए गए हैं. अब हमें उन खिलाडियों को भरपूर मौका देना है जो उन दरवाजों के पार खड़ी सफ़लता अर्जित कर बिहार को गौरवान्वित होने का असवर दे.

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