मर रही है गंगा, चौदह फुट गहरी नदी में कैसे चलेंगे मालवाहक जहाज

बिहार कवरेज

कल केंद्रीय कैबिनेट ने गंगा में नौवहन की अपनी योजना की घोषणा कर दी है. गंगा नदी में बंगाल के हल्दिया से उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक के रास्ते को राष्ट्रीय जलमार्ग एक बताकर इसमें मालवाही पोत चलाने की योजना है. इसके लिए 5369 करोड़ खर्च होंगे और यह जलमार्ग 2023 तक तैयार होगा. इस जलमार्ग का तीन चौझाई से अधिक हिस्सा बिहार से होकर ही गुजरेगा. पहले तो इस जलमार्ग में बिहार में कोई पोर्ट नहीं था, अब पटना के गायघाट औऱ सारण के कालू घाट में भी टर्मिनल बनने की बात है.

कागज पर तो यह योजना बहुत आकर्षक लग रही है, मगर क्या केंद्र सरकार ने जमीनी सच्चाई का आकलन कराया है. क्या गंगा आज की तारीख में नौवहन के लायक रह भी गयी है? पिछले साल फरवरी महीने में साहित्यकार और गंगा सेवी निलय उपाध्याय ने भागलपुर से फरक्का तक नाव से यात्रा की थी, उनका बयान ही पढ़ लें तो हालात कुछ और नजर आते हैं.

फरक्का के पास गंगा नदी की हालत

उन्होंने उस वक्त कहा था, गोमुख तो पहले ही गिर गया था, फरक्का में इसकी पूंछ भी कट गयी है. पूरा फरक्का किसी ठहरे हुए पानी की झील जैसा बन गया है, जो फैल कर राजमहल की सीमा तक पहुंच गया है. और उस पूरे इलाके में चार हिस्सा गाद है और एक हिस्सा ही पानी है. 15 बाई 32 किमी आकार की उस झील का मुंह शंकु की तरह हो गया है. इसे देखकर नदियों की सेहत को समझने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि गंगा मृत्यु शैया पर है.

अपनी उस यात्रा के दौरान निलय उपाध्याय ने कई बिंदुओं पर गंगा की गहराई को भी मापा था. उनका कहना था कि भागलपुर से फरक्का तक गंगा की औसत गहराई सिर्फ 14 फीट रह गयी है. जबकि बाढ़ के दिनों में इस नदी की औसत गहराई 100 से 150 फीट तक रहा करती है. गाद की वजह से नदी बिल्कुल छिछली हो गयी है. ऐसे में अगर केंद्र सरकार गंगा पर राष्ट्रीय जलमार्ग बनाना चाह रही है तो यह असंभव सा प्रतीत होता है. भला 14-15 फीट गहरे पानी में जहाज कैसे चल सकते हैं. वे कहते हैं कि फिलहाल गंगा में जो जहाज चलते हैं उसके आगे-आगे एक ड्रोजर चलता रहता है वह बालू हटा कर जहाज के लिए रास्ता बनाता है. तब जहाज आगे बढ़ता है. मगर ऐसा कब तक चल सकता है.

उन्होंने आगे बताया था कि तकरीबन हर जगह गंगा अपनी तटों को छोड़ कर बह रही है. बराज के उस तरफ गंगा में एक दस साल पुराना बगीचा उग आया है. यह सब संकेत है कि गंगा पानी के घोर संकट से गुजर रही है. मगर व्यवस्था इस संकट को देखने के लिए तैयार नहीं है. सच तो यह है कि हल्दिया पोर्ट को जीवन देने के जिस मकसद से फरक्का बराज बनाया गया वह भी पूरा नहीं हुआ. अब तक इस परियोजना पर एक हजार करोड़ से अधिक खर्च हो चुका है मगर 10-12 करोड़ का रेवेन्यु भी हासिल नहीं हुआ है.

2015 की भीषण बाढ़ के वक्त से ही फरक्का बराज चर्चा में रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कई मौके पर इस बराज के औचित्य पर सवाल उठाये हैं. ऐसे में निलय उपाध्याय की इस यात्रा और आंखों देखे विवरण का अपना महत्व है. मगर क्या सरकार इस सच्चाई को स्वीकार करने के लिए तैयार है.

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