गांधी कहते थे, बिहारियों से बढ़कर बिहारी हैं कृपलानी

आज आचार्य कृपलानी की पुण्यतिथि है. चंपारण सत्याग्रह की कहानियों से गुजरते वक्त मुझे इनके बारे में जानने का मौका मिला था. गांधी जब पहली बार मुजफ्फरपुर जा रहे थे तो कैसे कृपलानी उनके स्वागत के लिए नारियल के पेड़ पर चढ़ गये थे? क्यों महज एक रात कॉलेज के स्टाफ क्वार्टर में गांधी को ठहराने की वजह से उनकी नौकरी चली गयी थी?  क्यों गांधी उन्हें बिहारियों से बढ़कर बिहारी कहते थे? और वह मार्मिक पत्र भी जो गांधी ने उनकी नौकरी जाने के बाद उन्हें लिखा था…

पुष्यमित्र

मूलतः सिंध के निवासी जीवटराम भगवानदास कृपलानी 1912 से 1917 तक मुजफ्फरपुर के ग्रियर भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज में प्राध्यापक थे. पटना से जब गांधी मुजफ्फरपुर के लिए निकले तो उन्होंने यह सोचकर कृपलानी को तार भेजा था कि उनकी वजह से कुछ सुविधा हो जायेगी. मगर गांधी का स्वागत और महज एक दिन की मेहमान नवाजी ने कृपलानी के जीवन की राह बदल दी.
गांधी का तार कृपलानी को रात नौ बजे मिला. खबर मिलते ही वे तैयारियों में जुट गये. वे उस वक्त जीबीबी कॉलेज के छात्रावास के वार्डेन थे, उनके पास गांधी को ठहराने के लिए बेहतर कमरे नहीं थे. ऐसे में प्रो. मलकानी के घर ठहराने की व्यवस्था हुई.
खबर सुनकर उनके हॉस्टल के छात्र भी काफी उत्साहित हो गये, उन्होंने रात के वक्त ही परिसर के सारे फूल तोड़ लिये. फिर आरती की थाल सजाने की तैयारी शुरू हो गयी. सारा सामान मिल गया, मगर नारियल मिल नहीं रहा था. कैंपस में एक नारियल पेड़ था, कहते हैं, कृपलानी खुद उस पेड़ पर चढ़ गये और नारियल तोड़ लाये. स्टेशन पर कृपलानी और उनके छात्रों ने गांधी का किस तरह स्वागत किया, यह कथा तो आपको मालूम ही है.
गांधी जब मलकानी के घर पहुंचे तो मलकानी थोड़े भयभीत थे. उस जमाने में गांधी जैसे राजनीतिक व्यक्ति को ठहराने का रिस्क लेना खतरे का काम था. कृपलानी ने कहा कि कल मैं प्राचार्य से कह दूंगा कि गांधी मेरे अतिथि हैं.
अगले दिन सुबह-सवेरे कृपलानी प्राचार्य के पास पहुंचे तो खबर सुनते ही प्राचार्य भड़क उठे, कहने लगे, आपका अतिथि वही दक्षिण अफ्रीका का बदमाश गांधी है क्या? कृपलानी ने बदमाश संबोधन पर ऐतराज जताते हुए कहा कि यह कहना ठीक नहीं है. उन्हें तो ब्रिटिश सरकार ने कैसर-ए-हिंद की उपाधि दी हुई है. मगर प्राचार्य सहमत नहीं हुए, साफ-साफ कह दिया कि आप जल्द से जल्द उनके लिए कॉलेज से बाहर व्यवस्था करा दें.
बहरहाल गांधी के ठहरने की व्यवस्था बाहर तो हो ही गयी मगर कृपलानी को इन सब का खमियाजा भुगतना पड़ा. इस घटना के चंद दिनों बाद उनकी सेवा समाप्त कर दी. जिस दिन उन्हें सेवा समाप्ति का पत्र मिला, उसी रोज उन्होंने गांधी को पत्र लिखा कि क्या चम्पारण में मेरी सेवाओं की आवश्यकता है? गांधी ने तत्काल इस पत्र का जवाब भेजा, इस पत्र को अवश्य पढ़ा जाना चाहिये.
मोतिहारी
17 अप्रैल, 1917
मेरे प्रिय मित्र,
मेंने तुम्हारे स्नेह को तुम्हारी आंखों में, तुम्हारी अभिव्यक्तियों में, तुम्हारे हाव-भाव में पढ़ा है. क्या मैं इतने गहन स्नेह के लायक हूं? हां, यह मुझे पता चला है कि तुम मेरी मदद करना चाहते हो. तुम्हारी अपनी मरजी है. चाहो तो अहमदाबाद चले जाओ और वहां प्रयोगात्मक विद्यालय में काम करो अथवा आ जाओ और यहां काम करो, बंदी बनाये जाने का जोखिम उठा कर भी. यदि मुझे बंदी बना लिया गया तो इन बातों का ध्यान रखना. यह देख कर कि तुम यहां हो, यदि तुम मुझसे अपना कर्तव्य निर्धारित कराना चाहते हो तो तुम्हारा स्वाभाविक कार्य यह होगा कि जब तक किसानों को मनुष्य की भांति सांस लेने की आजादी नहीं मिल जाती, तब तक तुम यहां से नहीं जाओगे. मेरे लिए अब चम्पारण ही मेरी जन्मस्थली है. रोजाना की पड़ताल से मेरी यह राय दृढ़ हो रही है कि परिस्थितियां कई मामलों में फीजी से भी बदतर हैं.
तुम्हारा शुभेच्छु
एमके गांधी
फिर कृपलानी चम्पारण गये. पहले उन्होंने द्वारपाल का काम संभाल कर अवांछित लोगों को गांधी से मिलने से रोकने की जिम्मेदारी ली. कस्तूरबा जब पहुंचीं तो उन्होंने सामूहिक भोजनालय में उनकी मदद की. गांधी उनके बारे में हमेशा यही कहते रहे कि ये बिहारियों से बढ़कर बिहारी हैं. चम्पारण के बाद वे गुजरात विद्यापीठ में कई सालों तक प्राचार्य रहे. स्वाधीनता आंदोलन में तो सक्रिय रहे ही. नेहरू और पटेल से मतभेद की वजह से 1951 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. वे 1977 तक राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे और जनता सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

Spread the love

Related posts