विदेह से दरभंगा राज तक सहस्राब्दियों में पसरा है मिथिलांचल का राजनीतिक इतिहास

पिछले दिनों बिहार कवरेज में प्रकाशित एक आलेख को लेकर यह सवाल उठ खड़ा हुआ था कि क्या दरभंगा राज एक रियासत रही है या महज एक जमींदारी. इस सवाल को लेकर खूब चर्चा हुई. ऐसे में इतिहास के शोधार्थी सुशांत भास्कर ने हमारे लिए एक आलेख लेकर मिथिलांचल के इतिहास के अनछुए दृष्टांतों को सामने लाने की कोशिश की है. आप भी पढ़ें…

सुशांत भास्कर

पेश से शिक्षक सुशांत मूलतः इतिहासकार हैं. वे लगातार मिथिलांचल के इतिहास पर काम करते रहे हैं. दरभंगा क्षेत्र की बौद्धमूर्तियों पर उनका काम महत्वपूर्ण माना जाता है.

प्राचीन काल में उत्तरी बिहार और नेपाल की तराई में विदेह नाम का एक प्रदेश में राजतंत्र था और मिथिला उसकी राजधानी. कालान्तर में विदेह शब्द लुप्तप्राय होता गया और सम्पूर्ण क्षेत्र मिथिला से जाना जाने लगा और यहाँ के राजा या शासक मिथिलेश कहलाने लगे. यह प्रदेश पहले वैशाली गणतंत्र के अधीन रहा और फिर मगध साम्राज्यवाद के अधीन.

हर्षवर्धन के काल में तिरहुत एक प्रांतीय इकाई थी और अर्जुन या अरुनाश्व तिरहुत का गवर्नर था किन्तु हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद इसने स्वयं को स्वत्रंत घोषित कर दिया. तत्कालीन परिस्थितियों में जहाँ इस क्षेत्र में लगभग आधी शताब्दी तक तिब्बती शासन कायम रहा, वहीं हर्षवर्धन की राजधानी कन्नौज पर आधिपत्य के लिये तत्कालीन क्षेत्रीय राजाओं के लिये त्रि-दलीय संघर्ष पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूटों राजवंशों में शुरू हुआ था.

कालान्तर में दक्षिण भारत से आये सैनिकों में से कर्णाटवंशी नान्यदेव ने 1097 में एक नए राजवंश के साथ तिरहुत पर शासन स्थापित किया था. नान्यदेव ने चम्पारण क्षेत्रीय सिमरॉवगढ़ को अपनी राजधानी बनाया. कर्णाटवंशी शासक मूलतः नेपाल की तराई और बिहार के मैदानी भाग में शासन करते थे. कर्णाटवंशी शासकों के बाद ओइनवार के शासन काल तक भूगोल लगभग एक जैसा ही बना रहा जबकि ओइनवार शासन दिल्ली सल्तनत के मजबूत होने के बाद तिरहुत में बना था और जौनपुर पूर्वी क्षेत्र में अपनी स्थिति को लेकर मजबूत हो रहा था. अपने स्थिति को सुरक्षित एवं मजबूत करने के ख्याल से राजा शिव सिंह और जौनपुर के राजा के बीच की लड़ाई का दृष्टांत हमें विद्यापति के कीर्ति लता और कीर्तिपताका नामक समकालीन साहित्य में मिलता है.

जब मुग़ल सल्तनत दिल्ली में आसीन हुआ तो तिरहुत में भी स्थिति बदल गई और इस क्षेत्र में शासन ओइनवारवंशी राजाओं से बदलकर खण्डवलावंशी महेश ठाकुर के हाथों चली आई. अकबर के समय उत्तरी बिहार में सरकार चम्पारण, सरकार हाजीपुर और सरकार तिरहुत जैसे शब्द आइने अकबरी में प्रचलित हैं. सरकार तिरहुत की पश्चिमी सीमा गण्डक से पूर्वी सीमा कोसी तक तय थी.

इन समय तक इन शासकों के पास अपनी संप्रभुता थीं और अपने क्षेत्रों के शासन को लेकर कई प्रकार की शक्ति थीं और तिरहुत के शासक भी अपने साम्राज्य विस्तार के लिए अन्य राजाओं की तरह तरह तरह के युद्ध करते रहते थे. खण्डवला राजाओं की एक प्रसिद्ध लड़ाई राजा नरेन्द्र सिंह के कार्यकाल में कमला नदी तट हुई थी, कंदर्पी. कहा जाता है कि इस युद्ध मे मारे गए लोगों के लगभग 74 सेर जनेऊ को इक्कट्ठा किया गया था. हाल के दिनों में रंगनाथ दिवाकर ने 4 से 7 अक्तूबर, 1753 ईस्वी में कंदर्पी घाट की लड़ाई की तिथि तय की है.

इस युद्ध में मिथिलेश विजयी हुए और ऐसा प्रतीत होता है कि नरेन्द्र सिंह ने पहली बार नेपाल की तराई और मैदानी भाग में और अधिक अन्दर आकर बंगाल के द्वार (द्वार बंग) तक सीमा विस्तार किया और तिरहुत को दरभंगा राज के रूप में परिणत किया.

मुगलों के समय जब ईस्ट इंडिया कंपनी आई और 1757 के प्लासी की लड़ाई, 1764 के बक्सर का युद्ध हुआ, बंगाल में द्वैत शासन की शुरूआत हुई तो यह क्षेत्र कैसे बचा रह सकता था. तिरहुत के उत्तर नेपाल का महत्वपूर्ण इलाका भी तो था, देखते ही देखते 1799 में अंग्रेज तिरहुत या दरभंगा राज के सीमान्त इलाके सुगौली में एक सन्धि करते हुए नेपाल को प्राचीन विदेह या गुप्तकालीन त्रिभुक्ति या मध्यकालीन तिरहुत के कुछ मैदानी भाग देते हुए उनके कुछ पर्वतीय क्षेत्रों को लेते हुए (यथा दार्जलिंग जैसे कई तरह के क्षेत्र) सुगौली की सन्धि करते हुए तिरहुत की संप्रभुता को ख़त्म करने की सारी कोशिशें की.

इसके बाद दरभंगा राज लैंड सेटलमेंट को लेकर ट्रिब्यूनल में चले गए. धीरे-धीरे भारत के तमाम संप्रभुता सम्पन्न राजाओं के राज्यों को अंग्रेजों ने कैसे लिए कुछ कहने की जरूरत नहीं है. राजा रुद्र सिंह के आते आते तिरहुत के राजाओं की स्थिति एक बड़े जमीन्दार सी होती चली गयी, भले ही उपाधि राजाओं जैसी बनी रही क्योंकि मूलतः ये राजा ही थे. फलतः महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह भारतीय राजाओं के चुने हुए प्रतिनिधि बने थे और सर कामेश्वर सिंह संविधान सभा के सदस्य.

फलतः आज हम दरभंगा के राजाओं को मात्र एक जमींदार के रूप में ही मूल्यांकन करने की कोशिश करते हैं.

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