महीने में चार से बारह दिन तक कभी भूखी-कभी आधे पेट सो जाती हैं बिहार की किशोरियां

इक्कीसवीं सदी में जहां दुनिया भर की औरतें बराबरी के अधिकार के लिए अलग-अलग तरह की लड़ाइयां लड़ और जीत रही हैं, वहां बिहार की किशोरियों के जीवन का यह स्याह सच आपको हैरत और शर्मिंदगी में डाल सकता है. एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा राज्य की किशोरियों के लिये आयोजित कार्यशालाओं के दौरान यह सच निकल कर सामने आया है कि बिहार की ज्यादातर किशोरियां अक्सर दिन में एक वक्त या कभी-कभी दोनों वक्त भूखी रह जाती हैं. मुजफ्फरपुर में यह आंकड़ा महीने में चार दिन का है तो जमुई में नौ दिन और शिवहर जिले में महीने में 12 दिन तक पहुंच जाता है. हालांकि यह कोई औपचारिक सर्वेक्षण नहीं है, मगर राज्य के तीन प्रमुख इलाकों की तकरीबन सवा सौ किशोरियां के बीच हुई चर्चा से निकले ये आंकड़े परेशान करने वाले हैं.

पुष्यमित्र

पिछले दिनों एक बर्थ-डे पार्टी में जाना हुआ. वहां बीस-पच्चीस परिवार के लोग जुटे थे. केक वगैरह कटने के बाद जब खाने की बारी आयी तो पहले सभी पुरुषों को एक साथ बिठा दिया गया. मुझे थोड़ा अजीब भी लगा, बहरहाल मैं मेजबान से बहुत अधिक परिचित नहीं था इसलिए कुछ कह नहीं पाया. पुरुषों के बाद औरतें बैठीं. रात में जब हमलोग घर लौटे तो दोनों की थाली में पड़ने वाले व्यंजन अलग-अलग थे. उपमा की थाली में कुछ ऐसे व्यंजन नहीं पड़े थे, जो मैंने खाया था. उपमा ने बताया, खत्म हो गया होगा.

अमूमन यह बात बहुत सहज लगती है. हम बचपन से ऐसे ही माहौल में रहे हैं, जहां पुरुषों को पहले खिला दिया जाता है और औरतें बाद में खाती हैं. अगर किसी पारंपरिक ग्रामीण घर में औरत और मर्द एक साथ बैठकर खाने लगे तो उसे बेशर्मी माना जाता है. मगर इस पारंपरिकता का नतीजा क्या होता है? औरतें हमेशा कुछ व्यंजनों से वंचित रह जाती हैं. कई दफा उन व्यंजनों में अच्छी चीजें ही होती हैं. जैसे मिठाई, दूध, या कोई अच्छी सब्जी जो कम बनती है और पुरुष यह सोचे बगैर उसे पूरा चट कर जाते हैं कि औरतें के लिए बचा भी है या नहीं. कुछ संवेदनशील पुरुष जाकर किचेन में झांक आते हैं कि यह कितना बना है. मगर ज्यादातर घरों का यह किस्सा है कि औरतें रात में कड़ाही में रोटी पोछकर खा लेती हैं. वे मांगने पर मना भी नहीं करतीं कि उसके लिए घट जायेगा.

मगर इन चीजों का कितना फर्क पड़ता है, इसका कभी कोई आकलन नहीं हुआ था, लिहाजा कोई तसवीर हमारे दिमाग में नहीं बनती है. महिलाओं के लिए कार्यरत संस्था हंगर प्रोजेक्ट द्वारा पिछले दिनों मुजफ्फरपुर, जमुई और शिवहर जिले में कार्यशालाएं आयोजित की गयी थीं. इन कार्यशालाओं के जरिये किशोरियों से बातचीत कर उनकी सामाजिक और पारिवारिक स्थिति को समझने की कोशिश की गयी. इस दौरान कुछ गंभीर आंकड़े निकल कर सामने आये. इन आंकड़ों के मुताबिक बिहार की ज्यादातर किशोरियां अक्सर दिन में एक वक्त या कभी-कभी दोनों वक्त भूखी रह जाती हैं. मुजफ्फरपुर में यह आंकड़ा महीने में चार दिन का है तो जमुई में नौ दिन और शिवहर जिले में महीने में 12 दिन तक पहुंच जाता है.

दिलचस्प बात यह है कि इनके भूखे सोने के लिए या कम खाने के पीछे सिर्फ गरीबी ही जिम्मेदार नहीं है. इन कार्यशालाओं में किशोरियों ने बताया है कि चुकि घरों में पारंपरिक रूप से पहले पुरुषों को खिलाने का और बाद में महिलाओं द्वारा बचा-खुचा खाने का चलन रहा है, इसलिए भी कई दफा ऐसी स्थिति बन जाती है. एक अभ्यास के दौरान किशोरियों ने बताया कि अगर घर में अच्छा खाना बनता है तो उसका 70 फीसदी हिस्सा परिवार के पुरुषों को ऑफर किया जाता है. तीस फीसदी हिस्से में ही महिलाएं बांट कर खाती हैं और अगर यह मात्रा कम हो जाये तो माताएं बेटी को ऑफर कर देती हैं कि उन्हें भूख नहीं है और बेटियां यह कह कर खाने से मना कर देती हैं कि उन्हें इसका टेस्ट पसंद नहीं है.

इस बातचीत को मोडरेट करने वाली हंगर प्रोजेक्ट से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता शाहिना परवीन कहती हैं कि यही वजह है कि बिहार की महिलाएं एनीमिक रह जाती हैं, वे न मातृत्व के लिए पूरी तरह तैयार रहती हैं न रोजगार और जीवन की दूसरी चुनौतियों के लिए. इसके लिए बिहार के ग्रामीण इलाकों में लगातार घट रहे आजीविका के अवसर तो जिम्मेदार हैं ही हमारा सामाजिक परिवेश भी उतना ही दोषी है. जो भोजन के स्तर पर भी स्त्रियों से भेदभाव करता है, जबकि अच्छे भोजन की सर्वाधिक आवश्यकता स्त्रियों को ही होती है. उन्हें आगे चल कर बच्चों को जन्म देना पड़ता है, परिवार संभालना पड़ता है और ज्यादातर मामलों में आजीविका के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है.

यह ऐसा मसला है जो पारंपरिकता के नाम पर महिलाओं को बीमार बना रहा है, इसलिए जब तक घर के सभी लोग एख साथ बैठकर नहीं खाते, इसका समाधान मुश्किल है. इसलिए क्यों न हम सभी लोग एक साथ बैठकर खाने की आदत डालें.

कार्यशालाओं के दौरान सामने आये आंकड़े

  1. मुजफ्फरपुर – 6-10 वीं क्लास तक पढ़ रही या पढ़ाई छोड़ चुकी, मध्य आयवर्ग की किशोरियां. हर हफ्ते कम से कम 1 दिन भूखा रहती हैं. हर माह चार दिन एक वक्त खाना नहीं खातीं.

  2. जमुई – झाझा ब्लॉक की आदिवासी व मुसलिम किशोरियां, निम्न आय वर्ग, कभी स्कूल नहीं गई या 4-5 क्लास के बाद पढ़ाई छुड़वा दी गई. हफ्ते में तीन-चार बार खाना खाये बगैर गुजारा करती हैं. महीने में ऐसे नौ दिन होते हैं, जब भूखे रहना रहना पड़ता है.

  3. शिवहर – कभी सकूल नहीं गई मुसहर व दलित समुदाय की किशोरियां. महीने में 12 दिन ऐसे गुजरते हैं, जब लड़कियां भूखी रह जाती हैं. 

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