FM की प्रेम कहानियों में इतना प्रेम होता है कि मन भारी होने लगता है

आशुतोष कुमार पांडेय

आजकल FM रेडियो का अजब हाल है. इन पर RJ की जगह फ़िल्म अभिनेता, गायक, संगीतकार और फिल्मकार बतकही करते हैं. वैसे तो पहले भी रेडियो वाले फ़िल्मी दुनिया और सितारों के किस्से ही सुनाते-बताते थे, अब ये खुद आकर अपने किस्से सुनाने लगे हैं. क्या फ़िल्मी दुनिया में बेरोज़गारी बढ़ गयी है. क्योंकि ये लोग टीवी पर रियालिटी शोज में भी उसी तरह नजर आते हैं.

आशुतोष कुमार पांडे आरा वाले

सवेरे दस बजे बिग FM पर अनु कपूर सुहाना सफ़र लेकर आते हैं. रविवार को अनु मलिक भी एक कार्यक्रम करते हैं. इसके अलावा आज ही मैंने फ़िल्म माफ़िया करण जौहर को रेडियो मिर्ची पर फिल्मी दुनिया की बात करते सुना. शाम छह बजे से बिग FM पर सलीम भी वही बात दुहराते हैं, जो अन्य फ़िल्मकार दुहराते-कहते हैं. फ़िल्मी गायिका अलका याग्निक और इरफ़ान खान भी इसी लाइन में है.

नीलेश मिसरा की देखा-देखी अधिकतर FM वाले फ़ालतू कहानियां सुनाने लगे हैं. जिसमें कही आरा, बक्सर, पटना, बलिया, छपरा नहीं होता बल्कि सिंगापुर, बंगलोर, मुंबई, दुबई और पेरिस होता है. इन कहानियों में प्रेम इतना होता है कि मन भारी होने लगता है. कहानी कहने का बनावटी स्टाइल कुछ लोगों भले ही लुभाता और प्यार बटाता हो, मगर कही वैसा आसपास दिखाई-सुनाई नहीं देता. ऐसी कहानियां बहुसंख्यक आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करती. वैसे भी ये दो गीत सुनाने के बाद दस मिनट विज्ञापन देते रहते हैं. हिट गानों के नाम घटिया और शोरनुमा धुनों पर शब्दों की हेराफेरी सुनाते हैं.

इन एफएम चैनलों के चरित्र में आने वाले बदलाव की कहानी भी अजब है. भारत ने जब आर्थिक उदारवाद के दौर में प्रवेश किया तो साल 1993 से आकाशवाणी और दूरदर्शन ने निजी लोगों से कार्यक्रम बनवाना आरम्भ किया. उसी दौर में प्रणय रॉय दूरदर्शन के लिए विश्व दर्शन नामक कार्यक्रम बनाने लगे थे. 1995 में एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने रेडियो तरंगों पर भारत सरकार के एकाधिकार को खत्म कर दिया.

समाजवादी नेता किशन पटनायक की किताब “विकल्पहीन नहीं है दुनिया” में पेज़ नम्बर 178 पर “प्रोफ़ेसर से तमशागीर” शीर्षक से एक लेख है. इस लेख को पढ़ते हुए भारतीय प्रसारण सेवा के निजी क्षेत्र में पहुचने की कहानी मिलती है. कैसे एक प्रोफ़ेसर प्रणय रॉय दूरदर्शन के लिए विश्व दर्शन नामक कार्यक्रम बनाते हुए टीवी की दुनिया में प्रवेश करता है. इसके बाद यही प्रोफेसर NDTV इंडिया की नींव रखता है.

साल 2000 के मार्च महीने में NDA सरकार ने चालीस बड़े शहरों के लिए 128 प्राइवेट रेडियो स्टेशन के लिए खुली बोली लगायी थी. साल 2001 में भारत के बैंगलोर में पहला FM रेडियो स्टेशन खुला. करीब दस साल पहले जब पटना में पहला रेडियो स्टेशन खुला तब उसके प्रति उत्सुकता ज्यादा थी. धीरे-धीरे टीवी और अख़बारों के साथ FM रेडियो ने भी अपना रंग बदलना शुरू किया. आज टीआरपी के चक्कर में तरह-तरह के प्रयोग कर रहे है. कभी-कभी RJ का किसी वेबसाइट की ख़बर को अपने दिमाग की उपज बताकर इतराना शगल बनता जा रहा है. एक बार पटना की एक RJ ने बीबीसी के वुशुतुल्लाह खान की पेशावर डायरी को अपनी बताकर पढ़ती रही. इनकी मौलिकता गायब हो गयी है.

Spread the love
  • 1
    Share

Related posts