वसंत में घास के फूल

मिथिलेश कुमार राय

मिथिलेश कुमार राय की पहचान एक संवेदनशील कवि-कथाकार के रूप में है. जीवन में छोटी-छोटी चीजों के बीच खुशियां तलाश लेने की और उसके जाहिर करने की प्रवृत्ति उन्हें समकालीन लेखकों के बीच खास बनाती है.

भले ही सरसों के पीले-पीले फूलों को देखकर लोगों को वसंत के आ जाने का पता चलता हो लेकिन जब भी वसंत आता है वह घास को भी फूल का उपहार देता है. यह अलग बात है कि हमारी दृष्टि पीले चकाचौंध में फंसकर रह जाती है और हम छोटी और निचली चीजों के सौंदर्य को देखने से चूक जाते हैं. परंतु कुछ दिन पहले मेरी नज़रों ने इन नजारों को भी देख ही लिया.

शायद वो एक घास थी. या घास भी नहीं थी। कोई बेकार का पौधा था. मेड़ पर उग आया था. बेमतलब. लेकिन उसमें इतने प्यारे फूल खिले हुए थे कि निहारने का मन करने लगा. बहुत छोटे-छोटे प्यारे-प्यारे फूल. पौधा इतना छोटा था कि उसे निहारने और उसके फूलों को गौर से देखने के लिए नीचे झूकना पड़ा. झूका तो पाया कि वह भी पछिया के झोंके से झूम रहा है.

मेड़ के दोनों तरफ खेत थे. खेत में हरा-कचोर होकर गेहूं की फसल झूम रही थीं. गेहूं के बीच-बीच में सरसों के पौधे लहरा रहे थे और कहीं-कहीं मटर की लता भी सरसों के डंठल पर चढ़ती हुई ऊपर की ओर बढ़ रही थीं. अगर अभी सरसों में पीले-पीले फूल नहीं आए रहते तो गेहूं के कारण आँखों के सामने हरा-समंदर सा दृश्य रहता. लेकिन पीले-पीले फूलों ने शेष सारे नज़ारे को ढँक लिया था. रंग पीला का जलवा इस कदर था कि हरा ऐसे दिख रहा था जैसे कि उसे परदे के पीछे धकेलने की कोशिश की जा रही हो. इन सब से अगर दृष्टि फिसलती थी तो वह मटर के नीले-नीले फूलों में उलझ कर रह जाती थी.

लोग इन्हीं दृश्यों को देखकर झूम रहे थे. लोगों को ऐसा ही लग रहा था कि सरसों के पीले, खेसारी के गहरे नीले और मटर के हलके नीले फूलों ने वसंत को धरती पर बुलाया था. आँखें इन्हें निहारती और होंठों पर मुस्कराहट को पसार देतीं. जब इतना था ही तो वो जो कुछ भी नहीं था, उस पर दृष्टि कैसे जाती. लेकिन कभी-कभी दृष्टि अपने ही पैरों के पास चली ही जाती है. और जब वह पैरों के पास जाती है तो वो जो कुछ भी नहीं होता है, दृष्टि को अपनी ओर खींच ही लेता है. फिर पता चलता है कि कुछ तो जरूर है यह भी. नहीं तो सबको देखकर यह भी ऐसे क्यों खिल-खिल उठता. जिसे सुंदरता कहते हैं वह इस पर भी क्यों फ़ैल जाता! लेकिन सच यही है कि भले ही सभी मनुष्यों के लिए समय एकसाथ न बदले लेकिन जब मौसम बदलता है तो वह एक ही समय में सबके लिए बदल जाता है. चाहे वो मनुष्य हो या कोई घास या कि कोई झाड़ी! भले ही सरसों में फूल आते देखकर मौसम वसंत के आने की मुनादी करवा दे लेकिन यह पूर्ण रूप से तभी आता है जब बेकार के घास में भी फूल आ जाते हैं! वैसे बेकार है क्या? जिनकी उपयोगिता के बारे में हम नहीं जानते, वह? इस सन्दर्भ में एक कथा भी है. जिसमें यह बताया गया है कि प्रकृति ने एक भी बेकार की चीज नहीं बनाई है. अगर कोई चीज किसी को बेकार की लगती है तो यह उनकी अपनी अज्ञानता के कारण ही. एक बार एक गुरु ने सारे शिष्यों की परीक्षा लेने की सोची और कहा कि शाम तक का समय है. जंगल से कोई ऐसा पौधा लाओ जिसका कि कुछ उपयोग न होता हो. सारे शिष्य निकल गए. शाम हुई. वे लौटे तो किसी के हाथ में थोड़ा तो किसी के हाथ में बहुत सारे पौधे पड़े हुए थे. शिष्यों ने जो पौधे लाया था यह बता कर रख दिया कि इसका कोई प्रयोजन नहीं है. ये बेकार के पौधे हैं. गुरु मुस्कुरा रहे थे. एक शिष्य खाली हाथ लौट आया था. गुरूजी ने पूछा तो उसने भोलेपन से जवाब दिया कि गुरुजी, मैं कैसे कुछ लाता. मुझे एक भी ऐसा पौधा नहीं मिला जिसका कि किसी न किसी दवा के रूप में इस्तेमाल न होता हो. गुरूजी की मुस्कान चौड़ी हो गई. समझ गए कि यह एक शिष्य वैद्य की शिक्षा में परिपूर्ण हो गया है. उन्होंने उसे सफल घोषित कर मानव सेवा के लिए घर भेज दिया और बाकि शिष्यों को फिर से शिक्षा देने में लग गए.

असल में रात को जब ओस की बूंदें गिरतीं तो गेहूं मटर और सरसों के साथ-साथ उस पौधे को भी तृप्ति मिल रही थी और दिन में जब सूर्य की किरणें छिटकतीं, वे भी अंगड़ाई लेते. उसके हृष्ट-पुष्ट देह को देखने से लगता था कि प्रकृति उसे भी सबकुछ दे रही है. नहीं तो वह कब की मर-खप गई होतीं. हाँ, यह बात तो थी कि उसे मनुष्य का वह प्यार नहीं मिल रहा था और जान का जोखिम भी हमेशा बना रहता था कि पता नहीं कब किसी के पैरों के नीचे आकर इहलीला समाप्त हो जाए. लेकिन इससे क्या. कुछ जीवन ऐसे ही फलते हैं और फूलते हैं. तभी तो वह भी सुन्दर-सुन्दर फूलों के साथ वसंत का गुण गा रहे होते हैं!

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