स्कूलों में पहले किताबें पहुंचाइये सीएम साहब, समाज सुधार का संदेश थोड़ी देर में भी पहुंचेगा तो चलेगा

डियर नितीश कुमार जी

शराबबंदी या फिर यूं कहें कि पूर्ण शराबबंदी के समर्थन में मैं भी हूं. सिर्फ पूर्ण शराबबंदी ही नहीं अपितु मैं तो पूर्ण नशामुक्ति का भी पक्षधर हूं. आपने बिहार में पूर्ण शराबबंदी करके एक नेक कार्य किया है जो निश्चित रूप से सराहनीय है. इससे न जाने कितने परिवार में फिर से खुशियां लौटी हैं. आपको उन सब की दुआएं मिल रही हैं. अधिक सम्भव है कि वो चुनाव के दौरान अथवा उसके परिणाम आने पर आपको दिखे भी.

अपने स्कूल के बच्चों के साथ आलोक आनंद

इन दिनों आप समीक्षा यात्रा पर निकले हैं. होनी भी चाहिए. जब हम कोई नेक कार्य करते हैं तो उसकी हकीक़त जानने का प्रयास भी हमें करनी ही चाहिए. आप तो सबका साथ और सबका विकास में भरोसा करते हैं. इस समीक्षा यात्रा के दौरान आपके आगमन काल से लेकर प्रस्थान के समय तक हर एक मिनट के कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी सरकार और विभाग की ओर से पहले ही जारी कर दी जाती है. शायद सुरक्षा एवं अन्य कारणों से ऐसा करना जरूरी भी हो.

लेकिन मुझे यह बात आजतक समझ नहीं आयी सर! कि क्या आपको ये नहीं लगता कि आपका आना जब किसी जगह पर तय होता है, तो वहां आनन-फानन में सबसे पहले #विकास पहुँचता है. मसलन यदि गांव के किसी वार्ड में आपका दौरा जैसे ही तय होता है. सरकार के कई मंत्रीजी से संतरी जी तक वहां खुद पहुंचने लगते हैं. प्रसाशनिक महकमा उसे चमकाने में लग जाता है. रातों रात ही सड़के बना दी जाती है. फटाफट शौचालय का निर्माण हो जाता है. तुरंत ही आस-पास की सभी सरकारी इमारतों में रंग-रोगन होने लगता है. नालियां, स्वास्थ्य शिविर जैसे न जाने कई चीजें इस गति से वहां पहुंचने लगती है कि पड़ोस के दूसरे गांव वाले को जलन सी होने लगती है कि काश मुख्यमंत्री जी ने हमारे वार्ड,पंचायत या गांव को दौरे के लिए चुना होता.

सर! आपसे विनम्र निवेदन है कि ज़रा कभी किसी को बिना बताए ही अचानक से किसी गाँव पहुंचकर देखिये फिर शायद आपको विकास के वास्तविक स्वरूप का दर्शन होगा और आप अपने कार्य की सही समीक्षा भी कर पाएंगे.

हालांकि हाल ही में बक्सर में आपके साथ हुई घटना के बाद आप शायद ही इस बारे में सोचें. लेकिन प्रजातंत्र में विरोध भी सहना पड़ता है सर. हालांकि विरोध का ये तरीका कहीं से भी उचित नहीं था. मैं व्यक्तिगत रूप से इसकी निंदा करता हूँ. आप चाहें तो इसे अपने विरोधियों की साज़िश भी बता सकते हैं. लेकिन इसने आपको भी सोचने पर जरूर मजबूर किया होगा कि आखिरकार उन महिलाओं का आपके प्रति इतना भयानक गुस्सा किसी एक दिन में तो नहीं ही फूटा होगा. जबकि आपने तो शराबबंदी, जीविका समूह गठन, जैसे कई योजनाएं चलाकर बिहार की अधिकांश महिलाओं के दिल में वो स्थान बनाने में कामयाब हुए हैं, जिसे दूसरे को बनाने में अभी सालों लगेंगे.

सर! मुझे बस नेक कामों के लिए भी जबरन लोगों की सहानुभूति, प्रशंसा और वाह-वाही लूटने की बात समझ नहीं आयी. पिछले आठ-दस दिनों से बिहार के किसी भी सरकारी दफ़्तर में कोई और काम ढंग से नहीं हो रहा है. हर जगह बस मानव श्रृंखला की चर्चा जोरों पर है. विश्वरिकार्ड बनने का दावा और नासा के द्वारा चित्र लिए जाने को लेकर भी ये पहले से चर्चा में थी ही अब हाइकोर्ट के संज्ञान के बाद बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ की तरह इसकी चर्चा और जोर-शोर से होने लगी है. चूंकि शिक्षा विभाग को इसका नोडल विभाग बनाया गया है, इस कारण इसकी सफ़लता की जिम्मेदारी ख़ास तौर पर इसपर निर्भर करती है. नतीजन यह विभाग और इसके अधिकारी कुछ अधिक ही जोर-शोर से लगा हुआ है.

देखिये न कई बच्चों से न चाहते हुए भी एक घंटे खड़ा रहने को कहा गया है, उनके मन के विपरीत इस हाड़ काँपा देने वाली सर्दी में. अपने स्कूल में कई किलोमीटर दूर. शिक्षकों पर तो मानों तलवार ही लटका दिया गया है कि अगर इतने बच्चे शामिल न हुए तो आपकी ख़ैर नहीं. बच्चों के अभिभावकों के लिए भी आदेश जारी कर दिया गया है परोक्ष रूप से. कई बच्चों को मजबूरन खड़ा भी रहना पड़ा. दो घंटे तक भूखे-प्यासे, ठंड में.

लेकिन हुजूर जब बिहार के बच्चों को इस बार करीब दस महीने बीत जाने पर किताबें मिली हैं. उनका अर्धवार्षिक मूल्यांकन बिना किताबों के हुआ. पिछले महीने जितनी भी किताबें आई हैं उससे करीब आधे बच्चों को सारी किताबें नहीं मिल पायेंगी. जबकि शिक्षा विभाग ने मार्च महीने में उनके वार्षिक मूल्यांकन करने का कार्यक्रम भी जारी कर दिया है. जिसमें उन्हें पास भी होना है तभी वो आगे की कक्षा में जा सकेंगे. पिछले करीब 20-25 दिनों से बच्चों के लिए विद्यालय बंद है सर. शिक्षकों को 6 महीने से अधिक समय हो गए उनका बकाया वेतन तक नहीं मिला है. अब आप खुद ही सोचिये कि ऐसे में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की बात करना बेईमानी नहीं तो और क्या है?

मुख्यमंत्री जी! एक समय आप बिहार के विशेष दर्ज़े को लेकर मांग कर रहे थे. आजकल पता नहीं वो मांग पूरी हो गई या आप भूल गए जनता को आजतक पता न चला.

सुनने में आया है कि आपने नियोजित शिक्षकों के एक माह का बकाया वेतन जारी कर दिया गया है, ताकिे हम खुशी-खुशी इस यज्ञ में आहुति दे सकें. लेकिन साहब जब 6 माह का वेतन बकाया हो और एक माह का आये न तो वो घर तक नहीं आ पाती है रास्ते में ही लूट जाती है. क्योंकि ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती, ये आप भी भलीभांति जानते हैं. पिछली बार चुनाव के कारण आपने शत-प्रतिशत बच्चों के बीच राज्य सरकार की योजना यथा, साइकिल, पोशाक, छात्रवृति आदि बंटवा दिया और इस बार फिर आपको पचहत्तर प्रतिशत की याद आयी ऐसा क्यों?

सर! इस यज्ञ में मैं भी आपके साथ हूं बस मुझे ये समझ नहीं आया कि इस यज्ञ का मकसद क्या है? क्या हासिल होगा इससे? क्या कोई पूछ सकता है? क्या लोगों को यह जानने का अधिकार है कि उनके बच्चों को क्यों कतार में खड़ा किया गया? अब यह मत कहियेगा कि कतार में तो लोगों को मोदी ने भी खड़ा किया था, तब आप क्यों चुप थे. सर! आपका मकसद सही है बस मुझे जबरन थोपने वाला ये तरीका पसंद न आया.

आम लोग आज ये जानना चाहते हैं कि जब हमारे राज्य में लोग खुलेआम पूछ रहे हैं कि दहेज और बाल विवाह के ख़िलाफ़ पहले से बने क़ानून लागू करवाने की अगर कूवत नहीं है, तो अरबों के ख़र्च पर यह सरकारी तमाशा क्यों ?

दूसरा सवाल कि बेक़ाबू भ्रष्टाचार,  महंगाई,  अपराध और घोटालों के ख़िलाफ़ यह सरकार मानव श्रृंखला का आयोजन क्यों नहीं करती? क्या यह माना जाए कि बुनियादी समस्याओं के हल में विफल सरकार का मुखिया अब समाज सुधारक के चोले में अपनी छवि चमकाने की चालाकी में जुटा है?

इसमें दो मत नहीं कि शराबबंदी से बिहार के आम जनजीवन को बड़ी राहत मिली है. लेकिन शराब के धंधेबाज़ों ने उसके बाद जो शराब के ही अवैध कारोबार की दुर्गन्ध फैला रखी है, उसे रोकने में सरकार नाकाम क्यों हो रही है? जिस राज्य में आज ऐसे हालात हों वहां के राजा को क्या सिर्फ प्रकाश पर्व, बिहार दिवस, मानव श्रृंखला जैसे आयोजन में अरबों बर्बाद करना शोभा देता है?

बिहार की वर्तमान सरकार को पिछले कुछ समय से इन तरह के आयोजन करके राज्य के नाम पर अपनी छवि चमकाने का एक चस्का से लग गया है. समाज को वास्तविक मुद्दे से भटकाकर ये इवेंट मैनेजमेंट वाली सरकार बनने के राह पर अग्रसर है. पिछले वर्ष इस आयोजन में तत्कालीन विपक्ष और वर्तमान सत्ता पक्ष भाजपा का जो रवैया था वही इस बार के वर्तमान विपक्ष और पिछले साल के सत्ता पक्ष राजद का है.

हमारे देश में राजा राम मोहन राय के समय से ही बाल विवाह का विरोध हो रहा है और सन 2006 से तो बाल-विवाह निषेध अधिनियम अस्तित्व में भी हैं. जबकि दहेज विरोधी कानून तो देश में 1971 से ही लागू है. लेकिन क्या दहेज़ बंद हुआ है? आप कह सकते हैं कि अगर बंद हुआ रहता तो हमें आज ये करने की जरूरत ही क्यों पड़ती. लेकिन आप ये सब करके नया क्या कर रहे हैं सर, हमें ये बताइये न. जनता को मूल रूप से जागरूक तो कतई नहीं. क्योंकि यदि आप वो करना चाहते तो सबसे पहले राज्य की शिक्षा व्यस्था को सुधारते और स्वरोजगार के नये अवसर पैदा करते. कहने को तो मन में बहुत कुछ है सर लेकिन कहाँ से शुरू करें और कहां खत्म ये खुद ही समझ नहीं आता.

ख़ैर आज आम नागरिक की तरह मैं भी आपके साथ खड़ा रहा. बस एक बात तय हो गयी कि लोकतंत्र में जनता की आँखें आज भी कातर हो कतार में लगने को विवश है. जनता के लिए तो सरकार में कोई भी हो उनकी स्थिति तो बस “ढाक के तीन पात” वाली ही बनी रहेगी.

आपका ही

एक आम नागरिक

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