‘बिहार का पहला पिछड़ा सीएम तो मैं था, मगर सामाजिक न्याय के पहरुए मुझे भूल गये’

‘पिछड़ा समुदाय से पहला सीएम मैं था. मैंने ही बीपी मंडल के एमएलसी बनने का प्रस्ताव दिया और उनके लिए कुरसी छोड़ी. बाद में कर्पूरी समेत कई बने, फिर और कई. लेकिन यहां जब भी सामाजिक न्याय की बात होती है तो लालू-नीतीश से ही पिछड़ों-दलितों की राजनीति की शुरुआत मानी जाती है.’ राजधानी पटना के एक छोटे से सरकारी आवास में रहने वाले महज दस दिन के सीएम सतीश प्रसाद सिंहा एक जिंदा इतिहास हैं. पिछले दिनों निराला जी ने उनसे उस दौर और इस दौर के राजनीति के बारे में लंबा इंटरव्यू लिया था. इसका संक्षिप्त अंश तहलका पत्रिका में छपा है. इस पूरी बातचीत को विस्तार में पढ़ना अपने-आप में एक रोचक अनुभव से गुजरना है. आप भी पढ़ें…

निराला

निराला

बात पिछले बरस की है. मई की तपती गरमी थी. पटना की गरमी ऐसे ही जानलेवा टाइप होती है. सुबह के नौ बजे से पटना की सड़कों पर खाक छानने का प्रोग्राम पहले से ही तय था. पत्रकार मित्र आशीष झा साथ देने को तैयार होते हैं. गमछा-अंगोछा बांधकर. तपती दुपहरिया में दिन के करीब पौने एक बजे पटना के गर्दनीबाग मोहल्ले के पास पहुंचते हैं. उस दिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास का चक्कर काटने का ही दिन तय रहता है, सो लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी के आवास से लेकर जीतन राम मांझी और जगन्नाथ मिश्र के आवास के बाहर घंटो गुजारकर वहां पहुंचा था. पता पहले ही मालूम था. पूछते-पूछते पहुंचा. मुख्य सड़क पर एक पुलिसवाले ने बता दिया था कि सतीश प्रसाद सिन्हा का आवास है या किसका, यह नहीं बता सकता लेकिन जो आवास संख्या आप बता रहे हैं, वह सामने गली में आखिरी मकान है.

पहुंचा. कॉलबेल नहीं था. काफी देर तक मुख्य दरवाजे को खटखटाते रहे. कहीं से कोई आवाज नहीं आयी. गेट खुद ही खोल अंदर जाने की तैयारी में ही थे कि एक गार्ड की तेज आवाज आयी-रूकिये-रूकिये, आते हैं. गार्ड आया. पूछा-कौन और क्या काम? बताया-साहब हैं, उनसे मिलना है. बिहार में अधिकारियों-मंत्रियों ही नहीं, विधायकों से लेकर दूसरे तमाम लोगों को सरकारी अरदलियों द्वारा साहब कहे जाने का चलन सामान्य है, सो पूर्व मुख्यमंत्री सतीश बाबू के लिए यही शब्द अच्छा लगा. गार्ड बोला-कौन साहब? बोला कि यहां तो एक ही साहब रहते होंगे, सतीश बाबू. जवाब था- त अईसे न बोलिए, साहब मने सामने वाला आवास हो जाता है, वर्माजी का आवास है न सामने, मंत्रीजी के पति से मिलने वहीं पर लोग आता है और गलती से भभके में इधरो आ जाता है.

गार्ड अंदर जाता है. हम अहाते में खड़े रहते हैं. अंदर एक कमरे से तेज आवाज में फोन पर बात होते हुए सुनायी पड़ती है. बिजली कनेक्शन गड़बड़ा गया है, ठीक ना करवा दीजिएगा. गार्ड सूचित करने अंदर जाता है. हम अपने पत्रकार मित्र आशीष के साथ बाहर लगे इकलौते गाड़ी, कत्थई रंग के कार को देखते रहते हैं. पूर्व मुख्यमंत्री-बिहार का बड़ा-सा बोर्ड आगे होता है. अंदर से तुरंत संदेशा आ जाता है. जाते हैं. बाहर हॉल में बैठने की कोशिश करते हैं, खुद सतीश बाबू अंदर अपने बेडरूम से बाहर आते हैं. कहते हैं, अंदरे आ जाइये, एही जगह बैठ के बात करेंगे.

सतीश बाबू के आवास में उनके बिस्तर पर एक छोटी सी बच्ची उनके गोद में होती है. पूछने पर मालूम होता है कि उनकी ड्राइवर की बेटी है. सतीश बाबू ही बताते हैं कि सिराज उनका धोबी था, बाद में ड्राइवर बना लिये. हमको आठ स्टाफ का स्ट्रेंथ मिला तो सिराज को, उसकी पत्नी को, उसके बच्चे को यहीं रख दिये. बढ़ियां न किये, हमरा खयाल रखता है सब. हम वेजिटेरियन आदमी हैं, ई लोग ध्यान रखता है. बातचीत शुरू हो जाती है. अतीत के पन्ने नहीं पलटते, हम सीधे वर्तमान पर ही बात करते हैं.

वे सहजता से सबकुछ बताते हैं. बताते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय समानता दल से जुड़ गये थे, बिहार में 19 कैंडिडेट उतार दिये थे, कोइयो नहीं जीता, किसी को जीतना भी नहीं था. वे बताते हैं कि इन दिनों उसी राष्ट्रीय समानता दल के ही पार्लियामेंट्री बोर्ड के अध्यक्ष हैं.उनके राजनीति में आने से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक की कहानी पर बात होती है. बहुत सहजता से सब बताते हैं. किसी निश्छल बच्चे जैसी सारी बातें बताते हैं. खुलकर बताते हैं कि कैसे घर से निकाले गये, कैसे सिनेमा बनाये.

उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए जो तिकड़म रचे गये थे, उस कहानी को भी बता देते हैं. कई कहानियों को बताते हैं लेकिन बात-बात पर लालू-नीतीश का नाम लेते हैं. गुस्से में दिखते हैं दोनों पर. हम बात की शुरुआत वहीं से कर देते हैं. उनसे कोई तीन घंटे तक बात होती है. अब सतीश बाबू के बारे में सूचना यह है कि वे भाजपा का दामन थाम चुके हैं. कुछ माह पहले जब नीतीश कुमार, लालू प्रसाद वाले मेल—मिलाप के बाद जातिय आधार पर अपने अपने कोने को मजबूत करने की कवायद चल रही थी तो सतीश बाबू को एक रोज भाजपा में शामिल करवा दिया गया था. वे जहां भी हों, यहां हम उनसे हुई बातचीत का एक छोटा सा हिस्सा साझा कर रहे हैं.

बहुत नाराज लग रहे हैं लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार से आप, क्या वजह है?

वजह क्या है? कोई व्यक्तिगत दुश्मनी थोड़ी है दोनों से. व्यक्तिगत दुश्मनी होगी भी क्यों? न कभी बात-मुलाकात है, न मेरी कोई कभी अपेक्षा रही है. नाराजगी तो है कि राजनीति में अजीब सड़ांध मचाये हुए हैं और जो सड़ांध है,उससे आगे क्या होगा राजनीति में. दोनो का आजकल फेवरिट काम भाजपा को गाली देना है और दोनो ही भाजपा के सौजन्य से बिहार की सत्ता संभाल सके हैं. लालू प्रसाद यादव भी भाजपा का सहयोग लेकर सत्तासीन हुए और नीतीश कुमार तो लंबे समय तक राज किये. अब भाजपा सांप्रदायिक लग रही है.

फिर क्या हुआ कि नीतीश कुमार दस सालों तक लालू प्रसाद को गाली देते रहे और जब सत्ता पाने में संकट मंडराने लगा तो लालू प्रसाद के साथ मिल गये. अब देखिए, नयी कहानी. नीतीश कुमार दस साल तक गांव-गांव दारू का दुकान खुलवाते रहे और अब रोज ढिंढोर पीट रहे हैं कि दारू बंद करवाके ऐतिहासिक काम कर रहे हैं. और नहीं तो कह रहे हैं कि पूरा देश उनके मॉडल को क्यों नहीं मान रहा है. दारूबंदी अच्छी बात है लेकिन इतना अकुला काहे रहे हैं नीतीश कुमार. पहिले दस साल में जो दारू का लत्त बिहारियों को लगाये हैं, उस बिहारे में तो बंद करवा दे, फिर देश भर में अपने मॉडल को स्थापित करवाने के लिए परेशान हों.

सिर्फ सत्ता के लिए तो एक नहीं हुए. वे तो कहते हैं कि सांप्रदायिकता से बिहार को बचाने के लिए और सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए एक हुए. अब तो नीतीश कुमार को फिर से पीएम प्रत्याशी की तरह पेश किया जा रहा है!

सांप्रदायिकता को ई लोग दूर करेंगे, जो खुदे भाजपा के मेहरबानी से बिहार में सत्तासीन हुए हैं और राज भोग रहे हैं. रही बात सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाने की तो उसमें ई लोग पिछड़ी जाति का ढिंढोरा पीटते हैं. पिछड़ी जाति से तो बिहार के पहला मुख्यमंत्री हम थे. कर्पूरी ठाकुर से भी पहिले बने थे. पिछड़ा जाति का राजनीति में कैसे उभार किया जाता है, उसमें लोहियाजी सबसे शार्प नेता थे लेकिन नीतीश हो चाहे लालू, लोहियाजी के विचार को तो ताक पर रख दिये. और आप का कह रहे हैं, पिछड़ा-पिछड़ा का राग गायेंगे और पिछड़ा से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन जायेंगे तो नींद हराम हो जाएगा.

नीतीश कुमार को फिर से पीएम प्रत्याशी की तरह पेश किया जा रहा है. हम भी पढ़ रहे हैं अखबार में. अब चाहे तो हम भी अपने को पीएम प्रत्याशी की तरह अपने को पेश करवा सकते हैं. रोक-टोक थोड़े ना है! बनेंगे कैसे प्रत्याशी, पहिले ईहे तो क्लीयर कर दे. कांग्रेस तो इनको अपनी पार्टी से प्रत्याशी बनायेगा नहीं. भाजपा भी अपनी पार्टी से बनायेगा नहीं. तो ले-दे के मोर्चा बनाना विकल्प है. मोरचा तीन साल से बना रहे हैं. संयोजक बनाये मुलायम सिंह यादव को, उ पहिलहीं पगहा तुरा के भाग गये. बताइये, संयोजके भाग जाये तो मोरचा कैसा बनेगा समझ सकते हैं. बिहार में तो मोरचा इसलिए बन गया, क्योंकि लालू प्रसाद चुनाव लड़ने के योग्य रह नहीं गये थे, नहीं तो नीतीश कभी मेल नहीं करते उनसे.

अच्छा इतने नाराज हैं तो बताइये न कि और कौन नेता दिखता है. क्या भाजपा का राज बिहार में आ जाता तो आपको शिकायत नहीं रहती!

ऐसा तो हम बोले नहीं. बिहार को नयी राजनीति चाहिए. वैसे लोग जब खुलकर राजनीति करेंगे, जो राजनीति में तो रुचि रखते हैं लेकिन आर्थिक कारणों से या दूसरी वजहों से राजनीति में नहीं आ रहे, तब सबकुछ बदलेगा. नहीं तो अब यही होगा कि जिसके पास पैसा होगा, वह अपना तिकड़म भिड़ा लेगा. प्रशांत किशोर को लेकर आयेगा और फिर पैसा झोंक देगा. राजनीति में विचार या सिद्धांत भी एक चीज होती है, वह खत्म हो जाएगा और सारा जोर किसी तरह बस इलेक्शन जीतने भर का रहेगा, जो बिहार के लिए खतरनाक होगा.

अच्छा छोड़िए यह सब बात, आप तो बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं और बिहार में अधिकांश लोग तो जानते तक नहीं कि एक मांझी, लालू, राबड़ी, जगन्नाथ मिश्र के अलावा एक और पूर्व मुख्यमंत्री बिहार में अभी जिंदा है. जो जानते हैं वे कहते हैं कि वे तो दो दिनों के सीएम थे.

चलिए कोई दो दिन का सीएम तो कहता है न, बाकि ढेर तो एक दिन का ही कहके निपटा देता है और हम तो अपने बारे में यही जानते हैं कि हम 27 जनवरी 1968 से पांच फरवरी 1968 तक बिहार के मुख्यमंत्री थे और पिछड़े समुदाय से आनेवाले पहले सीएम थे. वैसे अब उम्र 83 साल की हो गयी है और यह इच्छा भी नहीं कि फलां लोग जाने और नहीं जानते तो क्यों नहीं जानते!

कैसे बन गये थे सीएम? यह भी बताइये कि राजनीति में कैसे आ गये थे? क्या पहले से पारिवारिक परिवेश था राजनीतिक!

हमारा पारिवारिक परिवेश और वह भी राजनीतिक! बाप रे बाप, क्या कह रहे हैं आप. हुआ ऐसा था कि हम बड़े घराने से ताल्लुक रखते हैं. खगड़िया जिला में गांव है मेरा. कुरचक्का था गांव का नाम. बाढ़ में बह गया तो बाद में 1976 में उसको फिर से बसाया तो उसका नाम लोगों ने खुद से ही सतीश नगर कर दिया है यानि मेरे ही नाम पर. तो हुआ ऐसा कि मैंने अंतरजातीय विवाह कर लिया था तो घर से लोगों ने मुझे निकाल दिया. भाइयों ने मुझे बांट दिया. 400 बिगहा की जोत थी हमलोगों के पास. भाई बांट दिये.

हम उस समय बीएससी में पढ़ाई कर रहे थे. एक चैरिटेबल डिस्पेंसरी हमारा चलता था. अगले साल बिहार का एसेंबली इलेक्शन था. हम खेत बेचे और चुनाव लड़ गये परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से. स्वतंत्र पार्टी से चुनाव लडे़. राजनीति में आये तो घर के लोगों ने कहा कि कुलंगार निकल गया घर में. नाश कर देगा सब. 17 हजार वोट लाये, चुनाव हार गये. कांग्रेस की सुमित्रा देवी चुनाव जीत गयीं. फिर 1964 में बाईइलेक्शन हुआ. निर्दलीय खड़े हुए. हार गये दो हजार वोटों से.

घर में भाई से लेकर बाहर तक सबलोग कुलंगार कहता रहा. हम खेत बेचकर राजनीति करते रहे. 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने खोजकर हमको खड़ा किया. अबकी जीत गये. 20 हजार वोट से. इंदिराजी चिकमंगलुर से जीतकर आयी थी. हाउस से निकाल दिया गया था. 180 लोगों के साथ विरोध किये. बात इंदिरा गांधी तक पहुंच गयी. बात जहां तक मेरे सीएम बनने की है तो महामाया बाबू बिहार के मुख्यमंत्री थे. रईस आदमी थे. कालीन खरीदते रहने के शौकिन. हमारे एक परिचित डॉक्टर थे. मलेरिया विभाग में थे. रांची में पदस्थापित थे. उन्हें प्रोफेसर बनना था लेकिन बनाया नहीं गया. हम 17-18 विधायकों को जुटाये और महामाया बाबू के यहां पहुंचे कि यह अन्याय क्यों हो रहा है, प्रोफेसर बनाइयेगा कि नहीं. नहीं बनाइयेगा तो हम कल से विरोध करेंगे. महामाया बाबू तुरंत प्यून को बुलाये. वह प्रोफेसर बन गया.

यह बात धुरंधर नेता केबी सहाय तक बात पहुंची. उन्हेांने मुझे मिलने को बुलाया. चाय पीने का हवाला देकर. मैं गया तो उन्होंने कहा कि थोड़ा और मेहनत कीजिए सतीश बाबू. 16-17 विधायक जुटा ही ले रहे हैं तो यह संख्या 35-36 कर दीजिए, फिर राज्य के मुखिया आप! हम बोले कि क्या फालतू बात कर रहे हैं. 318 विधायक में 35-36 से क्या होगा. वे बोले कि 156 मेरी ओर से आपका साथ देंगे, हमारे विधायक हैं. हम मेहनत कर के 36 जुटा लिये, सरकार को तोड़ दिये, महामाया बाबू ने साथ दिया, सीएम बन गये. 27 जनवरी 1968 से पांच फरवरी 1968 तक.

इतने दिनों के मुख्यमंत्री काल में आप क्या कुछ कर भी सके?

एक तगाबी ऋण हुआ करता था, उसको हटवा दिया. और इतने दिनों के मुख्यमंत्री रहते मेरे असर की बात करते हैं तो इतना जान लीजिए कि हम मुख्यमंत्री बने तभी बिहार में पिछड़ों-दलितों के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हुआ. मेरे बाद भोला पासवान शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर और भी कई लोग पिछड़े समुदाय से बने. मेरे बाद के 12 सीएम तो अब दुनिया से विदा हो चुके हैं.

और मेरे सीएम बनने या राजनीति में आने का असर जानना चाहते हैं कि जिस मंडल कमीशन की रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति बदली और मंडलवादी राजनीति की शुरुआत हुई. उस मंडल कमीशन के अध्यक्ष बीपी मंडल का समय तो खत्म हो चुका था और समय बढ़ नहीं रहा था. मैंने इंदिराजी से व्यक्गित आग्रह कर के मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पूरा करवाने के लिए छह माह का समय बढ़वाया था. आज न नीतीश और लालू कूद रहे हैं और कह रहे हैं कि जो किये हैं, वही लोग किये हैं. बहुतों का योगदान रहा है.

आप फिर नीतीश-लालू पर आ गये!

नीतीश लालू पर नहीं आ रहे, सच्चाई बता रहे हैं. सामाजिक न्याय की लड़ाई को 1990 से देखा जाता है और मीडिया भी दिखाती है लेकिन सबको यह जानना चाहिए कि लालू से पहले बिहार में मैं, दारोगा प्रसाद राय, भोला पासवान शास्त्री, बीपी मंडल, रामसुंदर दास, कर्पूरी ठाकुर जैसे लोग सीएम बन चुके थे. सब पिछड़े और दलित वर्ग से ही थे. लोगों को यह जानना चाहिए कि लालू प्रसाद के आने या नीतीश के आने के बाद सामाजिक न्याय का यह अध्याय बिहार में शुरू नहीं हुआ है.

राममनोहर लोहिया 1967 में ही 100 में पिछड़ा पावे 60 का नारा दे रहे थे और माहौल बदल रहे थे. इसलिए बार-बार नाम ले रहा हूं, लालू-नीतीश का नहीं तो शौक नहीं है. इनलोगों ने भ्रम फैलाया है. अरे ई लोग तो लोहियाजी का मूल सिद्धांत ही खत्म कर दिया. लोहियाजी नियम बनाये थे कि कोई भी विधान पार्षद, पार्टी का वरिष्ठ पदाधिकारी, राज्यसभा सांसद सीएम या मंत्री नहीं बनेगा लेकिन देखिए इनलोगों को विधानसभा चुनाव तो लड़ते ही नहीं.
अब एक बार बिहार में सरकार में रामानंद तिवारी, भोला सिंह और बीपी मंडल मंत्री बने तो तीनों में से कोई विधायक नहीं था. हमलोग तो चले गये थे लोहियाजी के पास कि देखिए क्या कर रहे हैं सब. आपका नियम तोड़ रहे हैं. हम उसी समय उनको कह दिये कि पार्टी का नियम टूट रहा है, हम विरोध का झंडा उठायेंगे और उठा भी लिये.

आप तो बाद में कांग्रेसी भी हो गये थे.

हां, कांग्रेस से तो हम सांसद रहे एक टर्म. खगड़िया से. भारी वोट से जीते थे. हुआ यह कि 1980 में लोकसभा चुनाव होनेवाला था. हमको कई दोस्त लोग बोला कि तुमको इंदिराजी जानती ही हैं, कर दो अप्लाई कांग्रेस में टिकट के लिए. कर दिये. जगन्नाथ मिश्र हमारे विरोध में थे. नहीं चाहते थे कि हमको मिले. कांगे्रसी नेता दिल्ली जाकर मिल रहे थे, हमरा नाम कटवाना चाह रहे थे लेकिन इंदिराजी पूछ रही थी कि कौन कैंडिडेट है वहां. कोई कुछ बताने की स्थिति में था ही नहीं. इंदिराजी मुझसे पूछी कि चुनाव लड़ोगे. बोले-हां. पूछी-जीत जाओगे. बोले-हां. चुनाव लड़े और जीत गये.

आप तो बीच में सिनेमा भी बनाये थे.

हां. बनाया था न. अरे वह सिनेमा बनाना थोड़ी था लेकिन खबर में बने रहने के लिए वैसा किये थे. जगजीवन राम का एक चेला हरिनाथ मिश्रा हमपर केस करवा दिया. धनबाद में पाटलीपुत्र मेडिकल कॉलेज खुला था. हम उसके संस्थापकों में थे. उसी कॉलेज के ट्रस्ट के सचिव से हम पर केस करवा दिया. आर्यावर्त अखबार और इंडियन नेशन में हमारे खिलाफ छप भी गया. प्रदीप में भी छपा सेटिंग से. मुझ पर गड़बड़ी का गलत आरोप लगाया गया था. लगा कि अब तो अखबार में छप गया है मेरे खिलाफ, अब तो लोग हमको भूल जाएगा.

राजनीतिक और सामाजिक तौर पर सक्रिय रहना था. फिर सोचे कि सिनेमा बनाते हैं, अखबार में तो छपते रहेंगे न. तब हम जोगी और जवानी नाम से सिनेमा बनाना शुरू किये. सिनेमा कभी रिलीज नहीं हुआ.

बाकि सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को तो आलिशान बंगला मिला हुआ है, चकाचाक व्यवस्था भी और भारी भरकम स्टाफ-गार्ड वगैरह भी. आपको तो एक कोने में डाल दिया गया है और स्टाफ भी नहीं हैं. क्यों?

अरे हमको तो जो मिला, वही ले लिये. मेरा पटना में अपना कोई घर है क्या? नहीं. हम तो गांव पर ही ज्यादा रहते हैं चाहे अपने बच्चों के पास दिल्ली. पटना में अपना कोई घर नहीं बनाये. सरकार की ओर से सबको जमीन भी मिला है, हमारे पास तो कोई जमीन भी नहीं है. और ई भी जो आवास है, उ तो हमको सब पूर्व मुख्यमंत्री लोग के लालच के चलते मिल गया है. जगन्नाथ मिश्रा सबसे पहिले व्यवस्था किये कि पूर्व मुख्यमंत्री को आवास मिलेगा. लालू प्रसाद आये तो उन्होंने व्यवस्था कर दिया कि उसी को मिलेगा, जो कम से कम पांच साल रहा हो.

अब उसमें खाली लालू ही फिट बैठते थे लेकिन लालू की चाल सफल नहीं हुई. राज्यपाल ने इस फैसले को नहीं माना. बाद में नीतीश को लगने लगा कि क्या पता, वह भी बाद में आयेगा कि नहीं तो आठ स्टाफ और 12 हाउस गार्ड वाला भी प्रावधान जोड़ दिया किसी पूर्व सीएम के लिए. जीतन राम मांझी को मिला तो हमको भी मिल गया. हमको तो जो मिला, वह सबके आपसी लड़ाई में मिला. और हमको कभी कुछ आवास, स्टाफ वगैरह मिला ही नहीं था तो जो मिला, तुरंत आकर रहने लगे.

अब करते क्या हैं? समय कैसे काटते हैं?

गांव जाते हैं. खेती करते हैं. पटना आते हैं. कुछ दिन रहते हैं. राजनीति करते हैं. समझते हैं. फिर दिल्ली जाते हैं तो बच्चों से मिलते हैं. किताबें पढ़ते हैं. सबसे ज्यादा समय खेती को देते हैं.

बाल-बच्चों को राजनीति में नहीं लाये. खगडिया इलाके से तो राजनीति कर ही सकते थे.

सवाल ही नहीं. यह मुझे पसंद भी नहीं कि अनुकंपा पर बच्चे राजनीति करे और मैं नेता था तो मेरे बेटा मेरे उत्तराधिकारी बने. कोई कह नहीं सकता कि कभी मैंने अपने लिए या अपने बेटे के लिए कुछ भी मांग की हो. कभी मैंने कहा कि मुझे फलां बना दीजिए, कहीं एडजस्ट कर दीजिए. मैं इसके खिलाफ वाला आदमी हूं.

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