‘वह फिल्म जिसने तमिल राजनीति को फिल्मी बना दिया’

तमिल फिल्म के इस वक्त के मेगा सुपर स्टार रजनीकांत ने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा की है. और इस बात में किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा अगर उनकी पार्टी वहां की राजनीति में जड़ जमा ले या पहले ही दांव में सत्ता पर काबिज हो जाये. क्योंकि तमिलनाडु राज्य में आज उनकी हैसियत किसी ईश्वर से कम नहीं. लोग उनके नाम पर जान देने के लिए तैयार रहते हैं. रजनीकांत ऐसे पहले सिने सितारे नहीं हैं जिनको लेकर दक्षिण भारत में ऐसा जुनून हो. उनसे पहले एनटीआर, एमजीआर, शिवाजी गणेशन, जयललिता जैसे कई सितारे रहे हैं, जिनको लोगों ने उनके समय में तर्कहीन होकर प्यार किया. उत्तर भारत के लोगों के लिए यह हमेशा हैरत का विषय रहा है कि आखिर वहां ऐसा क्यों है. यह जानने के लिए यह कहानी आपकी मदद कर सकती है. यह उस फिल्म की कहानी है, जिससे दक्षिण भारत में फिल्म और राजनीति के इस जबरदस्त घालमेल की शुरुआत हुई.

पुष्यमित्र

यह 1952 में आयी तमिल फ़िल्म पराशक्ति का पोस्टर है. इस पोस्टर में आप शिवाजी गणेशन का भाव प्रवण चेहरा देख सकते हैं. यह महान अभिनेता शिवाजी गणेशन की पहली फ़िल्म थी, इस फ़िल्म से पहले वे द्रविड़ पार्टी के राजनीतिक कार्यकर्त्ता थे. तमिलनाडु में इस फ़िल्म को आज भी याद किया जाता है. हिंदी की कोई फ़िल्म पराशक्ति की शोहरत का मुकाबला नहीं कर सकती. शोले, मदर इंडिया, ddlj और लगान भी नहीं. आज भी पुराने जमाने के लोग इस फ़िल्म का एक-एक संवाद आपको मुंहजबानी सुना सकते हैं.

पराशक्ति फिल्म का पोस्टर

आपको हैरत होगी कि इस फ़िल्म को लोग शिवाजी गणेशन की जोरदार एक्टिंग की वजह से याद नहीं करते, बल्कि इसके प्रभावशाली डायलॉग की वजह से यह लोगों के मानस में बसी है. जब यह फ़िल्म आई थी तो इसके डायलॉग्स के रेकॉर्ड्स भी जारी किये गये थे. सम्भवतः किसी फ़िल्म के साथ यह पहली दफा हुआ था, ये रेकॉर्ड्स भी फ़िल्म की तरह सुपर हिट रहे, खूब बिके. इन डायलॉग्स के लेखक थे एम करुणानिधि.

एक और दिलचस्प जानकारी यह है कि इस फ़िल्म और उसके संवादों में सायास द्रविड़ पार्टी की विचारधारा को जगह दी गयी थी. फ़िल्म से जुड़े ज्यादातर लोग इसी विचारधारा को मानने वाले थे. 1914 में तमिलनाडु में स्थापित जस्टिस पार्टी और बाद में पेरियार द्वारा स्थापित द्रविड़ कषगम ने वहां के बौद्धिक समुदाय को तो काफी प्रभावित किया था मगर उसकी आमलोगों तक पहुँच उतनी नहीं थी. मगर लोगों में, खास तौर पर वहां की मझोली जातियों में ब्राह्मणवादी शिकंजे से बाहर निकलने की तीव्र छटपटाहट थी. इस फ़िल्म में द्रविड़ पार्टी के मकसद को एक झटके में पूरा कर दिया.अब पूरा द्रविड़ देश उन संवादों को पूरे इमोशन के साथ दुहरा रहा था जो ब्राह्मणवादी शिकंजे पर चोट करते थे.

इस फ़िल्म ने न सिर्फ करुणानिधि की स्थिति द्रविड़ पार्टी में काफी मजबूत कर दी, बल्कि इसके असर को भुनाने के लिये अन्नादुराई ने करुणानिधि के साथ मिलकर अलग द्रविड़ मुनेत्र कषगम की स्थापना कर ली. 1967 में यह पार्टी सत्ता में आ गयी और अन्नादुरई CM बन गये. 1969 में अन्नादुराई के बाद एम करुणानिधि CM बने और द्रविड़ मुनेत्र कषगम उनकी खानदानी पार्टी बनती चली गयी.

एम करुणानिधि और अन्नादुरई

इस फ़िल्म ने राजनेताओं को यह भी सिखाया कि फ़िल्में राजनीतिक सफलता के लिये कारगर माध्यम हैं. इसी दौर में करुणानिधि ने अपनी पार्टी में उस वक़्त के सुपरस्टार एमजीआर को महत्वपूर्ण जगह दी और 1977 में जब एमजीआर ने अपनी पार्टी AIDMK की स्थापना की तो उन्होंने अपनी को स्टार जयललिता को प्रोपोगेंडा प्रमुख बनाया. वहीँ आंध्र प्रदेश में एनटीआर राजनीति पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहे थे.

दक्षिण की तर्ज पर उत्तर भारत में भी अमिताभ ने कई प्रभावशाली राजनीतिक फिल्में बनायीं. इनमें इंकलाब का जिक्र खास तौर पर किया जाता है. मगर उस फ़िल्म में वह करिश्मा नहीं हो पाया जो पराशक्ति ने किया था. लिहाजा अमिताभ के लिये राजनीति का सफर एक दुःस्वप्न साबित हुआ. दक्षिण की राजनीति में फिल्मस्टार आज भी काफी असर रखते हैं. रजनीकांत की एक अपील पर इसी जयललिता को लोगों ने ठुकरा दिया था. जबकि मुम्बईया फ़िल्म में तो आज कोई स्टार ही नहीं बचा जिसका लोगों पर असर हो.

बहरहाल इस फ़िल्मी हस्तक्षेप ने दक्षिण भारत की पब्लिक को मेलोड्रामिक बना दिया. जयललिता की मौत के बाद भी 70 लोगों के सदमे से मरने की खबर आयी. आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री YSR रेड्डी की मौत के बाद भी 69 लोगों की सदमे से मौत हो गयी थी. वहां लोग अपने नायकों को भावुकता की हद से आगे बढ़कर प्यार करते हैं. इस अतिरेक का निर्माण फ़िल्में करती हैं. रजनीकांत की फिल्मों के रिलीज के वक़्त क्या होता है वह हम कबाली की रिलीज के वक़्त देख चुके हैं. मैं 2001 में हैदराबाद में था, उस वक़्त उस शहर में 175 सिनेमा घर थे. आप समझ सकते हैं कि उस समाज में फिल्मों की जगह कितनी महत्वपूर्ण है.

जयललिता और एमजी रामचंद्रन

दो साल पहले मैं भोपाल से रांची ट्रेन से आ रहा था. उस वक़्त मेरे कम्पार्टमेंट में मेरे अलावा चार हैदराबादी थे. चारो मुझसे उम्र में बड़े थे. पूरे रास्ते वे लोग मिनी लैपटॉप पर जूनियर एनटीआर की फिल्में देखते रहे.सारी फ़िल्में उनकी देखी हुई थीं. उन्हें एक एक संवाद याद था. हर डायलॉग को वे हीरो के साथ दुहराते थे और हर बार फाइटिंग सीन आने पर वे सीट पर बैठे बैठे कूदने लगते थे. ऐसा लगता था वे खुद फिल्मों को जी रहे हों.

अब आप सोचिये जिस समाज में फिल्मों को लेकर इतना जूनून हो वहां की राजनीति पर फिल्मों और स्टारों का असर क्यों नहीं होगा. और लोगों की सोच समझ पर फ़िल्मी उद्वेग क्यों नहीं छाया रहेगा. और इसी वजह से कल को रजनीकांत तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज हो जायें तो किसी को हैरत नहीं होगी.

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