बस… बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ अब और नहीं

(इस टिप्पणी के साथ लगी तसवीर गुड़गांव के एक मॉल की है, तसवीर को खुद राकेश सिंह ने ही कैमरे में कैद किया है.)

 

वेबपोर्टल मधेपुरा टाइम्स के संपादक राकेश सिंह की गिनती अब उन लोगों में होती है, जो मधेपुरा और कोसी की आवाज बन रहे हैं. न्यायपालिका से जुड़े राकेश जी की सक्रियता वेब मीडिया और सोशल मीडिया में काफी अधिक है और उनकी बातों का अपना महत्व है. हमारे अनुरोध पर उन्होंने यह आलेख हमारे लिये लिखा है.

राकेश सिंह

बिहार के मधेपुरा में घटी ये घटना सिर्फ मधेपुरा या बिहार को शर्मशार नहीं करती है, बल्कि इससे पूरी मानवता शर्मशार हुई है. शुक्रवार की घटना सन्न कर देने वाली थी, जब लोगों ने सुना कि परीक्षा देने जा रही लड़कियों की मोबाइल से फोटो खींचने का विरोध करने पर मनचलों ने दिनदहाड़े भरी भीड़ के सामने लड़कियों की बेल्ट और लात-घूंसों से पिटाई कर दी और भीड़ या तो तमाशबीन रहे या फिर उससे भी आगे जाकर कुछ युवक उस घटना का मोबाइल से वीडियो बना रहे थे.

वो बेटियां थी, हमारी-आपकी बेटियों की तरह. सहरसा से आकर मंडल विश्वविद्यालय में मधेपुरा परीक्षा देने आई थी और मनचलों के कुकृत्य का शिकार हो गई. भीड़ यहाँ भी नपुंसकों की निकली और महज बेल्ट लिए चार-पांच मनचलों से भिड़ना तो दूर शब्दों से भी किसी ने यह नहीं कहा कि क्या करते हो, छोड़ दो. सच कहूं तो ऐसी घटना के बीच किसी भी सरकार का ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कार्यक्रम चलाने का कोई औचित्य नहीं है. यदि सचमुच हम बेटियों को शिक्षा तथा अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ाना चाहते हैं तो सबसे पहले उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें.

भारतीय कानून में भी खामियों से इनकार नहीं किया जा सकता. कई मामलों में पुलिस तंत्र से लेकर न्यायपालिका के कामों में भी कमी नजर आती है. घटना से पहले की तैयारी पुलिस के द्वारा तो अक्सर नगण्य है. घटना के बाद भी अक्सर बहुत कुछ ‘मैनेज’ हो जाने से अपराधियों का मनोबल बढ़ा ही रह जाता है और सबसे अधिक भुगतना सभ्य समाज को होता है.

दरअसल हमारे समाज में बहुत सारे लोगों की मानसिकता ही कुछ ऐसी ही है कि इस 21 सदी में भी वे औरतों को महज भोग-विलास की वस्तु समझते हैं. राह चलती या बाजारों में महिलाओं को गलत नजर से देखने से पहले वे शायद इस बात को भूल जाते हैं कि उन्हें भी किसी औरत ने ही गर्भ में पाल-पोस कर जन्म दिया है. उनकें भी घर में बहन-बेटियाँ हैं. वे संवेदनशील तब होते हैं जब खुद उनपर पड़ती है. इससे पहले वो भूल जाते हैं कि उनके घर से भी महिलायें बहार निकलती हैं और गंदी नजर का शिकार होती होंगी. महिलाओं के प्रति समाज को नजरिया बदलने की जरूरत है. जब हम नजरिया बदलेंगे तो नज़ारे खुद बदल जायेंगे.

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