इस भीषण ठंड में बेगूसराय डीएम आफिस के सामने क्यों 10 दिन से डेरा डाले हुए हैं ये लोग?

बिहार कवरेज

जहाँ भीषण शीतलहरी ने पूरे राज्य को अपने घरों में दुबके रहने पर मजबूर कर दिया है. राज्य भर के स्कूलों में छुट्टियां घोषित कर दी गयी है. जगह-जगह कम्बल बांटने और अलाव जलाने का अभियान चल रहा है. वहीं सैकड़ों लोग अपना घर-बार छोड़ कर इस भीषण मौसम में पिछले दस दिनों से बेगूसराय के डीएम के दफ्तर के सामने डेरा डाले हुए हैं. वजह यह है कि इनके पास घर जैसी कोई मुकम्मल चीज ही नहीं है. ये पिछले 25 सालों से नहरों और बांधों के किनारे रह रहे हैं. गंगा नदी ने 25 साल पहले इन्हें उजाड़ दिया था.

कई सालों से ये बार-बार इसी तरह सरकार से अपने बसाव के लिये जमीन मांगने इसी तरह डेरा डालते हैं. हर बार प्रशासन इन्हें कोई भरोसा देकर वापस भेज देता है, मगर कोई समाधान नहीं निकलता. इस बार इनलोगों ने तय कर लिया है कि जब तक सरकार इनका कोई इंतजाम नहीं करती ये यहीं घेरा और डेरा डाले रहेंगे. इनका कहना है कि सरकार ने इनके पुनर्वास के लिये जमीन भी अक़्वायर कर लिया है, मगर न जाने क्यों इन्हें क्यों नहीं बसा रही. ये बेगूसराय के मटिहानी प्रखंड के बलहपुर पंचायत के लोग हैं.

पिछले 10 दिनों से इन लोगों की जंग इसी तरह जारी है. ये यहीं रहते हैं, यहीं खाते पकाते हैं और यहीं से आंदोलन भी चलाते हैं. इन्हें बेगूसराय के स्थानीय वामदलों का भी समर्थन मिला हुआ है. मगर इनका क्या समाधान निकलेगा कहना मुश्किल है.

दरअसल, बिहार राज्य में नदियों के कटाव से प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने के लिये कोई स्पष्ट नीति नहीं है. जबकि हर साल हजारों लोग गंगा, कोसी, गंडक, बागमती आदि नदियों के कटाव से पीड़ित होकर बेघर हो जाते हैं. ऐसे ही सैकड़ों परिवार इस साल पूर्णिया के बैसा प्रखंड में महानंदा के कटाव से बेघर हो गए थे, वे भी इसी तरह नदी के किनारे अस्थायी झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं. सुल्तानगंज में तो कटाव पीड़ितों का पूरा कस्बा ही है, जहां 25 हजार लोग रहते हैं. खगड़िया के धमहारा घाट के पास 400 महादलित परिवार रेलवे लाइन के किनारे 30 साल से बसा है. उनके लिये भी जमीन अक़्वायर हो गया है, मगर गांव के दबंग उन्हें बसने नहीं देता.

बिहार सरकार कटाव को आपदा नहीं मानता इसलिये इनके लिये राहत की कोई स्पष्ट योजना सरकार के पास नहीं है. ऐसे में लोग एक झटके में बेघर हो जाते हैं और 25-30 साल तक सड़कों, बांधों, नदियों और रेलवे के किनारे छोटी सी झोपड़ी बनाकर समय गुजारते हैं और सरकार से पुनर्वास की मांग करते रहते हैं. राज्य सरकार को इन कटाव पीड़ितों के बारे में स्पष्ट नीति बनानी चाहिये, क्योंकि इनकी संख्या लाखों में है. यह बाढ़, भूकम्प, सुखाड़, अगलगी से कई गुना बड़ी आपदा है. इससे उबरने में कई पीढ़ियों का समय लग जाता है.

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