“ठंड? ठंड कहां है…” ठंड की खबर लेने निकले लेखक को मिले अजब-गजब जवाब

इन दिनों बिहार में भीषण ठंड पड़ रही है. स्कूलों में छुट्टी है. शहरों में अलाव जलाये जा रहे हैं, कंबल बंट रहे हैं. सड़कें सूनी हैं और लोग रजाई छोड़ने को तैयार नहीं हैं. इन परस्थितियों में कोसी कछार के ग्रामीण इलाके में बसने वाले कवि कथाकार मिथिलेश कुमार राय ने सोचा कि जरा गांव घर में घूमकर इस कड़ाके की सर्दी का जायजा लिया जाये. वे निकले और उन्होंने कई लोगों से बातें की. इस बातचीत में उन्हें किसिम-किसिम के जवाब मिले. आप भी पढ़ें…

मिथिलेश कुमार राय

बाहर कड़ाके की ठंड पड़ रही है जो देह को जमा दे रहा है. मैंने सुना. बाहर से इसी तरह की आवाजें आ रही थीं.

मिथिलेश कुमार राय की पहचान एक संवेदनशील कवि-कथाकार के रूप में है. जीवन में छोटी-छोटी चीजों के बीच खुशियां तलाश लेने की और उसके जाहिर करने की प्रवृत्ति उन्हें समकालीन लेखकों के बीच खास बनाती है.

अभी कोई कह रहा था कि सर्दी बहुत बढ़ गई है. लग तो कुछ ऐसा ही रहा था. लेकिन सहसा मुझे विश्वास नहीं हुआ. मैंने इस बात की तस्दीक करनी चाही. यह बात मैंने एक मजूर से पूछी. वह कुल्हाड़ी से लकड़ी को जलावन का आकार दे रहा था. बगल में किसी आयोजन की तैयारी चल रही थी शायद. उसने कहा कि ठंड, कैसी ठंड. देखो, पूरे बदन से पसीना चू रहा है. और फिर वह अपने काम में लग गया. ऐसा संभव है कि उनके पास समय कम था और काम अधिक. मैं आगे बढ़ा. मैंने जिससे यह सवाल पूछा, वह कुदाल से सड़क को उंचाई दे रहा था. कहा कि हवा नरम है तो थोड़ी सी राहत मिल रही है. धूप पसीना देकर बदन को सिद्ध कर देती है.

मेरा मन नहीं माना. लोग कुछ कह रहे हैं और ये कुछ और ही अलापे जा रहे हैं. अबकी मैं खेतों में उतर गया. मैंने पूछा तो वह मुसकुराने लगा. वह जो गेंहूँ के नन्हें-नन्हें पौधों की पहली सिंचाई कर रहा था. कहा कि पता नहीं आदमी को रोज-रोज भूख क्यों लगती है.

गजबे जवाब था इनका. लेकिन काम में मशरूफ लोगों को ज्यादा नहीं कोंचना चाहिए. भड़क उठते हैं. मगर सही जवाब भी तो नहीं मिल रहा था. खेतों से निकलकर मैं सड़क पर आ गया. दूर से मुझे एक साईकिल सवार आता दिखा. मुझे कुछ पूछना था सो मैंने पूछा. वह बड़ी तेजी से साइकिल हाँक रहा था. रूका नहीं. चलता रहा और चलते-चलते कहा कि उसे जल्दी में दूर कहीं जाना है. मैंने सोच लिया था कि अब अंतिम बार किसी से पूछूंगा. मैंने देखा. नदी में कुछ मछुआरे खड़े हैं. जाल को तह लगा रहे उन लोगों से जब मैंने यह पूछा कि क्या ठंड बहुत बढ़ गई है तो कहने लगे कि यही इस मौसम की खासियत है कि यह कई-कई चीजों का स्वाद बढ़ा देता है.

मैंने वही से देखा. दूर कुछ लोग धुएं के पास बैठे थे. मैं उधर ही बढ़ गया. पास जाकर देखा तो पता चला कि असल में वे लोग घूरे को घेरकर बैठे हुए थे. मैंने पूछा तो उन्होंने एक ओर इशारा करते हुए बताया कि देखो, वे कितनी व्याकुल होकर हरी घास ढूंढ़ रही हैं. मैंने उधर देखा तो पाया कि दर्जन भर गाएं दूब को नोंच रही थीं. मैं अब लौट रहा था. लेकिन बीच रास्ते में ठिठक जाना पड़ा. असल में मेरी दृष्टि की जद में दो बच्चे आ गए थे. वे कूड़े के ढेर से प्लास्टिक बीन रहे थे.

मैंने सोचा कि सबसे पूछा तो बच्चे से भी पूछ ही लूं. मैंने सवाल दुहरा दिया. बच्चों ने एक दूसरे का मुँह निहारते हुए कहा कि हाँ-हाँ, यह हमारे काम का मंदा सीजन है. लेकिन इस मौसम में दो पैसे ज्यादा मिलने की उम्मीद रहती है. पता नहीं मेरे सवाल करने का कैसा ढंग था कि मैं पूछता कुछ और था और लोग जवाब कुछ और ही दे रहे थे. लेकिन क्या किया जा सकता है. सुनते हैं कि यहाँ सबके अपने-अपने विचार हैं जो उन्हीं की परिस्थितियों से निकलकर गाढे रूप में फैल जाते हैं. खैर.

मैं घर लौटने से पहले चाय की टपरी के पास रूककर कुछ देर सुस्ताना चाहता था. मैं जानता था कि मैं कुछ भी नहीं कहूँगा तब भी वो मुझे चाय का गिलास थमा जाएगा. मैंने सोचा कि जब तक चाय खदकती है तब तक इनके भी विचार जानने में क्या हर्ज है. मैंने पूछा तो उसने बताया कि अभी एक लड़का चाय पीने यहाँ रूका था. बेचारा सुबह से भूखा था. उसे कहीं दूर जाना था. उसकी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी. मुझे तो वह पढ़ा-लिखा और शरीफ लगा. काफी मान-मनोव्वल के बाद चाय पीने और बिस्किट खाने को राजी हुआ. जाते-जाते बोला कि यह उधार रहा. चाय भी, बिस्किट भी और आपका नेह भी. फिर वह किलककर मुझी से पूछ बैठा, कहो बाबू, दुनिया में कितने अच्छे-अच्छे लोग रहते हैं न!

जाना तो चाहिए था मुझे लोहार के पास भी. और तड़के उठकर अपने अखबार वाले और दूधवाले से भी यही सवाल दुहराना चाहिए था. लेकिन मैं भी रजाई तान पड़ा रहा और वही-वही बातें सुनता रहा जो बाहर बनाई जा रही थी.

साभार: कुछ अलग (प्रभात खबर)

Spread the love
  • 1
    Share

Related posts