गांव के स्कूलों-अस्पतालों और दफ्तरों में क्यों न लगे सीसीटीवी और बायोमैट्रिक अटेंडेंस सिस्टम?

P.M.
आज अखबार में एक खबर दिखी. मोतिहारी के तुरकौलिया में एक प्रभारी प्रधानाध्यापक ने अपने पैसे से अपने स्कूल में सीसीटीवी कैमरा और बायोमैट्रिक अटेंडेंस सिस्टम लगवा लिया है. उनका मकसद है कि स्कूल में शिक्षक और छात्र समय से पहुंचें और पूरे समय रहें, गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई हो. इसका नतीजा भी सामने आने लगा है. शिक्षकों की लेटलतीफी में कमी आयी है. छात्र-छात्राओं की उपस्थिति में भी बढ़ोतरी हुई है. बिहार में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति बड़ा मसला है. इनरॉलमेंट की तुलना में आधे छात्र ही स्कूल में उपस्थित होते हैं. ऐसे में यह प्रयोग बड़ा बदलाव ला सकता है.

हालांकि यह कोई नया प्रयोग नहीं है. इससे पहले भागलपुर में दो उच्च विद्यालयों में स्थानीय विधायक अजीत शर्मा की पहला पर यह सिस्टम लगाया गया था. वहां भी सकारात्मक नतीजे सामने आये. मगर शिक्षा विभाग इस सिस्टम को अपनाने के लिए बहुत उत्सुक नहीं है. मोतिहारी वाली खबर में ही दिखा कि डीईओ का बयान आया था कि यह सिस्टम तो अच्छा है, मगर विभाग की फिलहाल कोई ऐसी योजना नहीं है. भागलपुर में तो शिक्षकों ने इस कदम का खुल कर विरोध भी किया.

दरअसल बिहार के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और दूसरी सरकारी सुविधाओं की बदहाली की एक बड़ी वजह कर्मचारियों की अनुपस्थिति और लेट-लतीफी है. आप किसी भी स्कूल में, अस्पताल में या ब्लॉक के दफ्तर में चले जाइये, ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे से पहले एक भी कर्मचारी नहीं दिखेगा. डेढ़ बजे लंच हो जायेगा. और लंच के बाद दफ्तर साढ़े तीन बजे खुलेगा. चार बजते-बजते कर्मचारी बैग भरकर निकलने की तैयारी करने लगेंगे.
इसकी बड़ी वजह है कि आज की तारीख में 90 फीसदी से अधिक सरकारी कर्मचारी उन गांवों में नहीं रहते, जहां उनकी पोस्टिंग होती है. वे समीपवर्ती शहरों में परिवार के साथ रहते हैं. वहां से समय पर दफ्तर पहुंचना और समय से दफ्तर छोड़ना मुमकिन नहीं होता. वे लेट से आते हैं औऱ जल्द भागने के चक्कर में रहते हैं. इसके अलावा दूर-दराज के गांवों में दफ्तर की निगरानी करने के लिए अफसर भी नहीं पहुंचते. लिहाजा वे वहां के शहंशाह होते हैं. अपनी मरजी से काम करते हैं.

ऐसे में सीसीटीवी कैमरा और बॉयोमैट्रिक सिस्टम का इस्तेमाल और उसकी ठीक-ठाक निगरानी से बड़ा बदलाव आ सकता है. उपस्थिति, समय से पहुंचना, समय पर दफ्तर छोड़ना, भ्रष्टाचार और काम में लापरवाही, इन तमाम चीजों में सुधार आ सकता है. बर्शते इनकी फीड संबंधित अधिकारियों के टेबल पर लगातार पहुंचती रहे. जैसे कोई दुकानदार अपनी दुकान में सीसीटीवी कैमरा लगवा कर लगातार निगरानी करता है. मगर क्या हाथी की तरह सुस्त सरकारी व्यवस्था इस तरह के बदलाव के लिए तैयार है?

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