नथुने में गोबर की गंध जाते ही याद आता है, अरे आज तो कोई त्योहार है

मिथिलेश कुमार राय गोबर का जिस अर्थ में प्रयोग गुड़ के साथ होता है या गणेश के साथ, गांव में यह वैसा ही नहीं रह जाता है. गुड़ अपनी जगह ठीक है और गनेश तो हैं ही. लेकिन यहां गोबर भी इससे कम महत्व का नहीं होता. विश्वास न होता हो तो त्योहार के दिनों में बगल के किसी गांव में घूम आइए. गोबर के वैसे तो बहुत से काम होते हैं. जैसे इसका उपले थोप लीजिये. इसे सड़ा कर खाद बना लीजिए. गोब गैस की परिकल्पना तो है ही.…

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विचारधाराओं की खूनी जंग से जख्मी एक बौद्ध मुल्क में हिंदुओं का सबसे बड़ा मंदिर

मिहिर झा सोशलिज्म कितना खूनी हो सकता है? पूंजीवाद कितना खूनी हो सकता है? किसी देश के इतिहास का एक ऐसा कालखंड जब विभिन्न विचारधाराओं के एक के बाद एक इम्प्लीमेंटेशन ने 30 लाख (कुल आबादी का २१%) लोग मार दिए. कुछ आंकड़ों पर नज़र डालें. कम्बोडिया को फ्रेंच उपनिवेशवाद से 1953 में आजादी मिली. राजसत्ता वापस कम्बोडिया के राजकुमार सिंहनूक के हाथ में गयी. भयंकर गरीबी में जी रही जनता के राजा का सबसे प्रिय कार्य था सिनेमा बनाना! खुद ही लिखते, खुद ही डायरेक्ट करते, खुद ही अभिनय…

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जनकपुर- परदेस में सीता का एक खूबसूरत-भव्य मंदिर और प्रेम में डूबे स्त्री-पुरुष

पुष्यमित्र नेपाल स्थित जनकपुर मिथिलांचल के लोगों के लिए एक बड़ा और भावनात्मक तीर्थ है. कहते हैं, जनकपुर ही वह जगह है, जहां सीता और राम का विवाह हुआ था. वहां एक भव्य जानकी मंदिर है. जो संगमरमर से बना है. 1910 में बने इस मंदिर का आर्किटेक्ट काफी खूबसूरत है और नेपाल और भारत के मिथिलाचंल की महिलाएं इस तीर्थ से गहरा लगाव महसूस करती हैं, क्योंकि देवी सीता का यह इकलौता सबसे बड़ा मंदिर है. विकीपीडिया बताता है कि यह हिंदू-कोइरी आर्किटेक्ट का बेहतरीन नमूना है. 50 मीटर…

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जानिये, एक बूढ़े पेड़ के लिए क्यों उमड़ पड़ा पूरा रायपुर शहर

रूपेश गुप्ता रायपुर के सिटी कोतवाली के सामने पीपल के चार सौ साल पुराने वृक्ष को काटने के खिलाफ जब शाम 7 बजे लोग सड़कों पर उतरे तो सबके हाथ में एक मोमबत्ती और आंखों में पीड़ा और आक्रोश के मिश्रित भाव थे. सबने नारेबाज़ी करते हुए पीपल पर मोमबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि दी. इसके बाद उसकी जड़ के चारों तरफ खुदी मिट्टी को पाटकर वहां पानी डाला. ताकि उसी पेड़ से नई कोंपलें फूट सके. इस अनोखे प्रदर्शन में समाज के हर तबके के लोग थे. क्या राजनेता, क्या सामाजिक…

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यहां आज भी अपने घर का सपना सीमेंट-बालू से नहीं बांस से पूरा होता है

कोसी के इलाके में बांस का इस्तेमाल किस-किस रूप में होता है, आप उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. यह तसवीर सुपौल के एक स्कूल की है, जो पूरी तरह बांस से बनी है. तसवीर डाउन टू अर्थ से साभार… मिथिलेश कुमार राय बांस के बारे में कभी कुछ सुनता हूँ तो आँखों के सामने हठात् ही कुछ दृश्य कौंध जाते हैं. कुछ दिन पहले की बात है. कपलेश्वर की विधवा कह रही थीं कि उस दिन कुछ बाँस बिक गए तो थोड़े से पैसे आए हैं हाथ में. सोच…

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नालंदा के खंडहर ही नहीं दरभंगा की हेरिटेज बिल्डिंग्स भी हमारी धरोहर हैं

सुशांत भास्कर बिहार में जब पुरातात्विक एतिहासिक धरोहर की चर्चा करते हैं तो अक्सर गया, बोधगया,  नालंदा, पटना और वैशाली जैसे कुछ क्षेत्रों पर आकर ठहर जाते हैं, जबकि पुरावस्तुओं के संबंध में बने अधिनियम, 1972 के अनुसार कम से कम एक सौ वर्ष से विद्यमान सिक्के,  भवन, कलाकृतियों, ऐतिहासिक महत्व की कोई वस्तु, पदार्थ या चीज़ आदि शामिल हैं. भारत सरकार के द्वारा बनाये गये पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 सम्पूर्ण भारत मे लागू है. 1976 में बिहार सरकार ने बिहार प्राचीन स्मारक अवशेष तथा कलानिधि अधिनियम ,1976…

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वसंत में घास के फूल

मिथिलेश कुमार राय भले ही सरसों के पीले-पीले फूलों को देखकर लोगों को वसंत के आ जाने का पता चलता हो लेकिन जब भी वसंत आता है वह घास को भी फूल का उपहार देता है. यह अलग बात है कि हमारी दृष्टि पीले चकाचौंध में फंसकर रह जाती है और हम छोटी और निचली चीजों के सौंदर्य को देखने से चूक जाते हैं. परंतु कुछ दिन पहले मेरी नज़रों ने इन नजारों को भी देख ही लिया. शायद वो एक घास थी. या घास भी नहीं थी। कोई बेकार…

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पढ़िये, सच्चिदानंद सिंह की कहानी ‘पकड़वा’

इस पुस्तक मेले में साहित्यिक रचनाओं से जुड़ी कई किताबें आयीं, इनमें से ब्रह्मभोज सबसे अलग इसलिए है, क्योंकि इसकी कहानियों में पुराना क्लासिकल अंदाज तो है ही, नये जमाने की नयी सोच भी शामिल है. भूले-बिसरे दिनों की छौंक के बीच से कुछ ऐसे किस्सों को निकाल कर लेखक सच्चिदानंद सिंह लाते हैं, जो आज भी आपको उतना ही आकर्षित करती है. आज छुट्टी के दिन आप आराम से पढ़िये उनकी इस संग्रह की एक कथा पकड़वा… सच्चिदानंद सिंह भागलपुर विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के रहने के लिए छात्रावास तो…

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एक अनोखी बस यात्रा, दो संतोषों का असंतोष और बदले बिहार को देखने आये मामू्#बिदेसियाकीचिट्ठी

निराला बिदेसिया बात थोड़ी पुरानी हो चली है लेकिन जब-तब मानस पटल पर ताजगी के साथ चस्पां हो जाने को बेताब हो जाती है. हम रोहतास जिले के एक बाजार राजपुर से सासाराम पहुंचे. मैं ट्रेन से रांची निकलने के मूड में था. लेकिन साथ में चल रहे मामू ने कहा- बस का आनंद लो बबुआ, मजा आएगा. थोड़ा गाना बजेगा, कुछ देर लाइन होटल पर रूकेंगे, वगैरह-वगैरह. मैं आग्रह करता रहा कि बिना रिजर्वेशन के भी ट्रेन में चलना बस की तुलना में आरामदेह होता है और कुछ हद…

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अच्छा ही तो है कि शेषन ओल्ड एज होम में अपनी उम्र वालों के साथ ताश खेल रहे होंगे

बुढ़ापा ओल्ड एज होम में गुजारना पड़ा. अपने समाज में इसे आज तक दुखदायक स्थिति मानी जाती है. मगर जो हालात हैं उसमें किसी अनचाही स्थिति में बेटे-बहुओं के घर में पड़े रहने से बेहतर है ओल्ड एज होम में आजाद जिंदगी जीना और मजे करना. शेषन के ओल्ड एज होम में पाये जाने पर जो भावुक माहौल बना है, उसके बारे में एक नयी निगाह है, वास्तिवकता की धरातल पर लाते हुए, दुनिया भर के ओल्ड एज होम के अनुभव और अपने देश की तल्ख सच्चाई अपने ही अंदाज…

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