आज के ही दिन तारापुर में अंगरेजों की गोलियों का शिकार हो गये थे 34 लोग

बिहार कवरेज देश ही नहीं बिहार के भी बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि मुंगेर के तारापुर में आज के दिन 34 निहत्थे लोग अंगरेजों की गोली का शिकार होकर अकालकलवित हो गये थे. यह आजादी के इतिहास का एक ऐसा पहलू है जो आज तक अनछुआ और गुमनाम है. इतिहास के पन्नों में यह किस्सा किसी फुटनोट्स की तरह दर्ज है. भले ही इस कहानी में देश के लोगों की सहज दिलचस्पी न हो, मगर कम से कम बिहार के लोगों को तो उन 34 लोगों की…

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1930 के दशक का एवरेस्ट मिशन, पूर्णिया और एक ऑस्कर अवार्ड विनिंग फिल्म की पूरी कहानी

सुशांत भास्कर हम यह जानते हैं कि 29 मई 1953 को पहली बार माउंट एवरेस्ट पर न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाली मूल के भारतीय नागरिक तेनसिंह नोर्गे शेरपा चढ़े थे. किन्तु आज की पीढ़ी को यह जानकारी नहीं है कि पूर्णिया जिला से 1930 के दशक में माउन्ट एवरेस्ट पर एक हवाई जहाज ने उड़ान भरा था और उसके ऊपर एक फ़िल्म भी बनी थीं जिसे ऑस्कर अवार्ड मिला था. इस उड़ान से एवरेस्ट के शिखर का न केवल पहली बार तस्वीर लिया गया बल्कि दुनिया को एवरेस्ट पर…

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आइये याद करें आदि विद्रोही तिलका मांझी को

आज तिलका मांझी की जंयती है. 268 वीं. हिंदुस्तान के आजादी के इतिहास में तिलका मांझी की हैसियत आदि विद्रोही वाली होनी चाहिए थी. इस पहाड़िया लड़का ने उस वक्त अंगरेजी राज के खिलाफ बिगुल फूंका था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में सेटल ही हो रही थी. कहा जाता है कि 1783 में उसने भागलपुर के तत्कालीन कलेक्टर क्लीवलैंड को तीर मार कर मौत के घाट उतार दिया था. वह पहाड़िया जनजाति ही थी जिससे अंगरेज सबसे अधिक खतरा महसूस करते थे. पलासी की युद्ध के बाद जब बंगाल…

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मैं भागलपुर बोल रहा हूं

यह आलेख आज से सात साल पहले भागलपुर से प्रभात खबर के प्रकाशन की शुरुआत के मौके पर छपा था. पुष्यमित्र मैं भागलपुर बोल रहा हूं. आपका अपना शहर भागलपुर. गंगा मैया के दक्षिणी किनारे पर तकरीबन पिछले तीन हजार साल से मेरा अस्तित्व कायम है. लिहाजा आप यह कह सकते हैं कि आपका शहर दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है. एक ऐसा शहर जिसके जलवे समय-सागर के थपेड़ों से वक्त बेवक्त बेरौनक जरूर हुए पर मिटे नहीं. महलों की रंगीनियां, शासकों की शौर्यगाथाएं और विद्वानों का…

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चर्चिल की भतीजी, दरभंगा का जमींदार और महात्मा गांधी की कांस्य प्रतिमा

पुष्यमित्र आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है. इस मौके पर एक अनूठा किस्सा लेकर आया हूं. इस किस्से के तीन किरदार हैं. पहली चर्चिल की भतीजी, वही विंस्टन चर्चिल को गांधी को शातिर बुड्ढा कहता था. दूसरे दरभंगा के जमींदार कामेश्वर सिंह जिन्हें अंगरेज सरकार ने सर और नाइट कमांडर की उपाधि दी थी और तीसरे खुद महात्मा गांधी हैं, जो शांति और प्रेम के वैश्विक प्रतीक हैं. यह दिलचस्प है कि चर्चिल की भतीजी क्लेयर शेरिडन 1931 के आसपास गांधी की आवक्ष मूर्ति बनायी थी. जाहिर सी बात है…

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अफसोस बिरला हाउस में उस रोज कोई बत्तख मियां नहीं था

पुष्यमित्र आज बत्तख मियां याद आते हैं. वैसे तो आज गांधी को याद करने का दिन है. आज ही दिल्ली के बिरला हाउस में गांधी की गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी. उस रोज बिरला हाउस में बत्तख मियां नहीं थे. होते भी तो गांधी को बचा पाते या नहीं, कहना मुश्किल है. बत्तख मियां उस रोज चंपारण के अपने गांव अकवा परसौनी में थे. उस रोज बिरला हाउस में नाथूराम गोडसे थे और उनके साथी थे. जिन्होंने गांधी पर गोली चलाई और गांधी की मौत हो गयी.…

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रवींद्र जैन कहते थे, ईश्वर ने अगर कभी आंखें दी तो सबसे पहले येसुदास को देखना चाहूंगा

देवांशु झा आज मंदिर की घंटियों की तरह अलौकिक आवाज वाले मलयालयी गायक येसुदास का जन्मदिन है. उनके जन्मदिन पर पत्रकार देवांशु झा ने जिन शब्दों के जरिये उन्हें याद किया है, वह इस आलेख को अलौकिक और मस्टरीड बना देता है. सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों में जब हिन्दी सिनेमा के दो बड़े गायक रफी और किशोर कुमार ढलान पर थे, तब दक्षिण से एक गायक मुंबई आया था. नाम था येसुदास. हिन्दी गानों से उनका परिचय कराने वाले संगीतकार थे रवीन्द्र जैन. रवीन्द्र जैन ने येसुदास की…

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‘जंगलराज’ तो था मगर लालू के दौर में नहीं

निराला बिदेसिया जंगलराज. राजनीति में पिछले करीब दो दशक से बेहद लोकप्रिय शब्दों में से एक है यह. यूं तो पूरे हिंदी प्रदेशों में ही शगल और सनक की तरह सर चढ़ने के बाद सबसे पॉपुलर शब्द भी है यह. जिसे कोई शब्द नहीं आता, वह फटाफट इस शब्द का इस्तेमाल करता है. विरोधी या सत्ताधारी दल को गरियाने के लिए. उसे नीचा दिखाने के लिए. आतंक-हिंसा-अराजक-अनुशासनहीन राजकाज और राजपाट को परिभाषित करने के लिए. अपने भाषण, संबोधन, वार्ता आदि में ताश के पत्ते की तरह ‘जंगलराज’ शब्द को फेंटकर…

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मधु लिमये ‘बम्बैया’, जिसने बिहार के मुंगेर औऱ बांका की जनता की रहनुमाई की

जयन्त जिज्ञासु आज भारतीय लोकतंत्र का जिस्म तो बुलंद है, पर इसकी रूह रुग्ण हो चली है. ऐसे में जोड़, जुगत, जुगाड़ या तिकड़म से सियासत को साधने वाले दौर में मधु लिमए की बरबस याद आती है. राजनीति के चरमोत्कर्ष पर हमें सन्नाटे में से ध्वनि, शोर में से संगीत और अंधकार में से प्रकाश-किरण ढूँढ लेने की प्रवीणता हासिल करने का कौशल मधु लिमये में दिखता है. प्रखर समाजवादी, उत्कृष्ट वक्ता व शानदार लेखक मधु लिमये (1 मई 1922 – 8 जनवरी 1995) की कल 22वीं पुण्यतिथि थी.…

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इस 143 साल पुरानी पार्ट टाइम आब्जर्बेटरी ने बताया, आज पूर्णिया का मौसम सबसे ठंडा है

पूरा बिहार शीतलहर की चपेट में है और इस मौसम का सबसे ठंडा दिन कल पूर्णिया में था, जब वहां का तापमान 1.2 डिग्री दर्ज किया गया. दिलचस्प है कि पूर्णिया में तापमान और मौसम के बदलाव को दर्ज करने के लिए जो आब्जर्वेटरी है, वह 1874 की बनी हुई है. तब अंगरेजों ने इसे पार्ट टाइम आब्जर्वेटरी के रूप में बनाया था. आइये जानते हैं बासुमित्र से इस आब्जर्वेटरी की दिलचस्प कहानी. बासुमित्र पूर्णिया के सबसे पुराने सरकारी कार्यालय में से एक अंग्रेजों के जमाने में स्थापित उत्तर बिहार…

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