जब राशन कार्ड के लिए मारे-मारे फिरते हैं शहीदों के बच्चे #धमदाहागोलीकांड

बासुमित्र सन 1942, जब देश में अहसयोग आंदोलन पूरे चरम पर था, लोग अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगा रहे थे. उस समय आंदोलन का प्रभाव पूर्णियां जिले के धमदाहा और आसपास के क्षेत्रो में भी था. धमदाहा में भी 25 अगस्त 1942 को अंग्रेजों भारत छोड़ो नारे की गूंज थी. लोग तिरंगा फहराने और थाने को जलाने के लिए आगे बढ़ रहे थे तभी अचानक ब्रितानी पुलिस ने क्रांतिकारियों को रोकने के लिए फायरिंग का सहारा लिया, पुलिस फायरिंग में 14 लोग शहीद हुए और न जाने कितने लोग…

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आंबेडकर की काट भर नहीं थे जगजीवन राम

पुष्यमित्र इमरजेंसी का आखिरी दौर था. चुनाव की घोषणा हो चुकी थी. दिल्ली के मशहूर रामलीला मैदान में बाबू जगजीवन राम की सभा होने वाली थी. जबरदस्त भीड़ होने की उम्मीद थी. इस सभा को असफल करने के लिए इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर राजकपूर की मशहूर फिल्म बॉबी दिखाये जाने की घोषणा कर दी, उसी वक्त यह फिल्म दिखायी जानी थी, जब जगजीवन राम की सभा थी. उनदिनों दिल्ली में टीवी का नया-नया क्रेज था और टीवी पर ऐसी फिल्म को कोई मिस नहीं करना चाहता था. यह सरकार…

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उस फकीर उस्ताद की याद में

निराला बिदेसिया सवाल-‘‘कुछ गाते हो?’’ जवाब- नहीं उस्ताद. सवाल- कोई साज बजाने का सउर है? जवाब- ना उस्ताद. पहले थोड़ा मुंह बिचकाये. मेरे चेहरे पर निराशा के भाव छा गये. अगले ही पल वे बच्चों जैसा खिलखिलाते हुए मेरे पीठ पर हाथ फेरते हुए कहने लगे- एका मतलब ई हुआ कि एकदम बेसुरे हो तुम. तब फिर का बात करोगे संगीत पर मुझसे! फिर अगला सवाल—अच्छा ई बताओ कि गीत—संगीत पर कुछ जानते भी हो? मेरा जवाब होता है— रुचि है कला में, गीत—संगीत में, अनुरागी हूं कला का. ठहाका…

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गांधी कहते थे, बिहारियों से बढ़कर बिहारी हैं कृपलानी

आज आचार्य कृपलानी की पुण्यतिथि है. चंपारण सत्याग्रह की कहानियों से गुजरते वक्त मुझे इनके बारे में जानने का मौका मिला था. गांधी जब पहली बार मुजफ्फरपुर जा रहे थे तो कैसे कृपलानी उनके स्वागत के लिए नारियल के पेड़ पर चढ़ गये थे? क्यों महज एक रात कॉलेज के स्टाफ क्वार्टर में गांधी को ठहराने की वजह से उनकी नौकरी चली गयी थी?  क्यों गांधी उन्हें बिहारियों से बढ़कर बिहारी कहते थे? और वह मार्मिक पत्र भी जो गांधी ने उनकी नौकरी जाने के बाद उन्हें लिखा था… पुष्यमित्र…

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आज के ही दिन तारापुर में अंगरेजों की गोलियों का शिकार हो गये थे 34 लोग

बिहार कवरेज देश ही नहीं बिहार के भी बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि मुंगेर के तारापुर में आज के दिन 34 निहत्थे लोग अंगरेजों की गोली का शिकार होकर अकालकलवित हो गये थे. यह आजादी के इतिहास का एक ऐसा पहलू है जो आज तक अनछुआ और गुमनाम है. इतिहास के पन्नों में यह किस्सा किसी फुटनोट्स की तरह दर्ज है. भले ही इस कहानी में देश के लोगों की सहज दिलचस्पी न हो, मगर कम से कम बिहार के लोगों को तो उन 34 लोगों की…

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1930 के दशक का एवरेस्ट मिशन, पूर्णिया और एक ऑस्कर अवार्ड विनिंग फिल्म की पूरी कहानी

सुशांत भास्कर हम यह जानते हैं कि 29 मई 1953 को पहली बार माउंट एवरेस्ट पर न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाली मूल के भारतीय नागरिक तेनसिंह नोर्गे शेरपा चढ़े थे. किन्तु आज की पीढ़ी को यह जानकारी नहीं है कि पूर्णिया जिला से 1930 के दशक में माउन्ट एवरेस्ट पर एक हवाई जहाज ने उड़ान भरा था और उसके ऊपर एक फ़िल्म भी बनी थीं जिसे ऑस्कर अवार्ड मिला था. इस उड़ान से एवरेस्ट के शिखर का न केवल पहली बार तस्वीर लिया गया बल्कि दुनिया को एवरेस्ट पर…

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आइये याद करें आदि विद्रोही तिलका मांझी को

आज तिलका मांझी की जंयती है. 268 वीं. हिंदुस्तान के आजादी के इतिहास में तिलका मांझी की हैसियत आदि विद्रोही वाली होनी चाहिए थी. इस पहाड़िया लड़का ने उस वक्त अंगरेजी राज के खिलाफ बिगुल फूंका था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में सेटल ही हो रही थी. कहा जाता है कि 1783 में उसने भागलपुर के तत्कालीन कलेक्टर क्लीवलैंड को तीर मार कर मौत के घाट उतार दिया था. वह पहाड़िया जनजाति ही थी जिससे अंगरेज सबसे अधिक खतरा महसूस करते थे. पलासी की युद्ध के बाद जब बंगाल…

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मैं भागलपुर बोल रहा हूं

यह आलेख आज से सात साल पहले भागलपुर से प्रभात खबर के प्रकाशन की शुरुआत के मौके पर छपा था. पुष्यमित्र मैं भागलपुर बोल रहा हूं. आपका अपना शहर भागलपुर. गंगा मैया के दक्षिणी किनारे पर तकरीबन पिछले तीन हजार साल से मेरा अस्तित्व कायम है. लिहाजा आप यह कह सकते हैं कि आपका शहर दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है. एक ऐसा शहर जिसके जलवे समय-सागर के थपेड़ों से वक्त बेवक्त बेरौनक जरूर हुए पर मिटे नहीं. महलों की रंगीनियां, शासकों की शौर्यगाथाएं और विद्वानों का…

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चर्चिल की भतीजी, दरभंगा का जमींदार और महात्मा गांधी की कांस्य प्रतिमा

पुष्यमित्र आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है. इस मौके पर एक अनूठा किस्सा लेकर आया हूं. इस किस्से के तीन किरदार हैं. पहली चर्चिल की भतीजी, वही विंस्टन चर्चिल को गांधी को शातिर बुड्ढा कहता था. दूसरे दरभंगा के जमींदार कामेश्वर सिंह जिन्हें अंगरेज सरकार ने सर और नाइट कमांडर की उपाधि दी थी और तीसरे खुद महात्मा गांधी हैं, जो शांति और प्रेम के वैश्विक प्रतीक हैं. यह दिलचस्प है कि चर्चिल की भतीजी क्लेयर शेरिडन 1931 के आसपास गांधी की आवक्ष मूर्ति बनायी थी. जाहिर सी बात है…

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अफसोस बिरला हाउस में उस रोज कोई बत्तख मियां नहीं था

पुष्यमित्र आज बत्तख मियां याद आते हैं. वैसे तो आज गांधी को याद करने का दिन है. आज ही दिल्ली के बिरला हाउस में गांधी की गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी. उस रोज बिरला हाउस में बत्तख मियां नहीं थे. होते भी तो गांधी को बचा पाते या नहीं, कहना मुश्किल है. बत्तख मियां उस रोज चंपारण के अपने गांव अकवा परसौनी में थे. उस रोज बिरला हाउस में नाथूराम गोडसे थे और उनके साथी थे. जिन्होंने गांधी पर गोली चलाई और गांधी की मौत हो गयी.…

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