सौ मर्डर करके महायज्ञ कराने से पाप कम नहीं हो जाते कल्पना मैडम

गायिका कल्पना को तो आप सब जानते ही होंगे. भोजपुरी गीतों को अश्लीलता का पर्याय बना देने में जिन चंद लोगों की बड़ी भूमिका है उनमें निश्चित तौर पर एक गायिका कल्पना हैं. मगर अब जब भोजपुरी समाज के भीतर से इस अश्लीलता के खिलाफ आवाज उठ रही है तो गायिका कल्पना न सिर्फ खुद को भिखारी ठाकुर का तारणहार बताने में जुटी हैं, बल्कि मंच से भोजपुरिया समाज को ही डांटने डपटने लगती हैं. जानकार बताते हैं कि अश्लीलता से पैसे बटोरने के बाद अब कल्पना भेस बदलकर पद्मश्री…

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बेगूसराय में खुलेंगे ‘दयाशंकर की डायरी’ के पन्ने, पहुंचे आशीष विद्यार्थी, नादिरा बब्बर

साहित्य, रंगकर्म और जनवाद का केंद्र माने-जाने वाले बेगूसराय में आज नादिरा बब्बर के मशहूर प्ले दयाशंकर की डायरी का मंचन होने जा रहा है. और इस मंचन में भाग लेने इस प्ले की पहचान बन चुके अभिनेता आशीष विद्यार्थी बेगूसराय पहुंच गये हैं. उनके साथ प्रसिद्ध रंगकर्मी आलोक चटर्जी भी हैं. आलोक चटर्जी ने एक ढाबे से यह सेल्फी पोस्ट की है, जो इस खबर के साथ लगी है. बेगूसराय में इस फेमस प्ले का मंचन राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव रंग ए माहौल 2017 के आखिरी दिन आज होगा. पिछले…

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देखिये, चरखवा चालू रहे गीत पर चंदन के साथ कैसे झूमने लगी गांव की किशोरियां

राजधानी पटना के यूथ हॉस्टल में कल से बाल विवाह के खिलाफ उठ खड़ी होने वाली किशोरियोंका जमावड़ा है. दिन भर काम की बातें भी हुईं और मौज मस्ती भी. शाम के वक्त तब वहां का नजारा उल्लासमय हो गया, जब भोजपुरी गायिका चंदन तिवारी के गाये गीतों पर ये किशोरियां झूमने-नाचने लगीं. आइये, देखें इस वीडियो को…

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वह ‘पृथ्वी थियेटर’ का छोरा और वो ‘शेक्सपियराना’ की छोरी

P.M. तब शशि कपूर सिर्फ 18 साल के थे. तब उनके पिता की नाटक मंडली पृथ्वी थियेटर भी घुमंतू थी. वे पूरे देश में घूम-घूम कर नाटक किया करते थे. इन नाटक कंपनियों में पृथ्वीराज कपूर के बच्चे भी हुआ करते थे. पहले राज कपूर और शम्मी कपूर इस मंडली के हिस्सा हुआ करते थे. जब ये दोनों फिल्मों में आ गये तो छोटे शशि कपूर अपने पिता के साथ घूमने लगे. ऐसी ही एक ट्रिप पर वे 1956 में कलकत्ता पहुंचे, एक नाटक लेकर. वहां एक लोकल नाटक मंडली…

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जो भोजपुरी फिल्म मुम्बई के बीस-बीस थियेटरों में लगती है, उसे पटना वाले एक शो तक नहीं देते

धनंजय कुमार भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में पटकथा लेखक हैं और पूरी कोशिश में जुटे हैं कि भोजपुरी फिल्मों का कंटेंट बदले. इसमें सामाजिक मसले जगह पायें. मगर उनका दर्द यह है कि पटना का एलीट वर्ग भोजपुरी को अपनाने के लिए तैयार नहीं है. उनकी फिल्म सैंया सुपरस्टार जो गांव में भ्रष्टाचार के मसले पर बनी है, उसे बिहार के दूसरे जिलों में 70 से अधिक सिनेमाघरों में जगह मिली है. मुम्बई में भी 20 से अधिक हॉल में यह रिलीज हुई है. मगर पटना में उसे एक शो तक…

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बंगाल को रसगुल्ला, बिहार को क्या?

हाल ही में पश्चिम बंगाल राज्य ने रसगुल्ला पर जीआई टैग हासिल किया है. इससे यह साबित हो गया है कि रसगुल्ला बंगाल की ही मिठाई है. अब कोई व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अपने लोकेशन के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकता. डब्लूटीओ का सदस्य होने के कारण भारत ने ज्योग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स एक्ट को अपने देश में लागू किया है. 2003 में लागू हुए इस कानून के तहत पहला जीआई टैग बंगाल ने दार्जिलिंग टी के नाम से लिया. तब से अब तक 308 सामग्रियों को जीआई टैग…

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रीत बनकर ‘रीत’ रहा है, नये अन्न के स्वागत का यह उत्सव

पुष्यमित्र आज लबान हैं. हमारे तरह इसे लबान ही कहते हैं मगर इसका असली नाम नवान्न है. बंगाल में इसे नबान्न कहते हैं. यह नये धान के स्वागत का त्योहार है. किसानों के लिहाज से यह पूर्वी भारत का सबसे बड़ा त्योहार है. क्योंकि इस इलाके में लगभग सभी किसान खरीफ में धान की खेती करते हैं. जब धान की पहली बाली कट कर घर आती है तो इससे निकले दाने का चूड़ा(चिवड़ा या पोहा) बना पहले पुरखों को समर्पित किया जाता है, फिर दही के साथ इसे सभी लोग…

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आपके शहर में पंचलाइट फिल्म लगी है तो देख आइये, नहीं लगी है तो कहानी पढ़ लीजिये

फणीश्वरनाथ रेणु की सबसे मजेदार कहानी पंचलाइट पर फिल्म बनके तैयार हो गयी है और सिनेमा हॉल में चल भी रही है. निर्देशक प्रेम मोदी साहब को ढेर सारी शुभकामनाएं. सबसे कमाल बात तो यह है कि इस छोटी सी कहानी को उन्होंने फुल स्केप फीचर फिल्म बना डाला है. जब मौका मिले फिल्म देख आइये. बहरहाल अगर आपने पंचलाइट कहानी नहीं पढ़ी है तो पूरी कहानी हम आपके लिए लेकर आये हैं, पांच मिनट की रीडिंग है, पढ़ डालिये… वादा है, हंसते-हंसते लोटपोट हो जायेंगे. पंचलाइट कथाकार – फणीश्वरनाथ…

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विद्यापति गीतों को राग-बद्ध करने वाले मांगैन गवैया, जिनके ठुमरी-खयाल का देश दीवाना था

सहरसा जिला मुख्यालय से तकरीबन 20 किमी दूर है पंचगछिया गांव. हम उस गांव एक ऐसे शास्त्रीय गायक की विरासत को देखने गये थे जिन्हें विद्यापति गीतों को रागबद्ध करने का श्रेय जाता है. उनकी ठुमरी और खयाल गायकी के दीवाने फैयाज खां, पं. ओंकारनाथ ठाकुर, विनायक राव पटवर्धन और अख्तरीबाई फैजाबादी जैसे गायक थे. रामचतुर मल्लिक उन्हें मधुकंठ गायक कहा करते थे. रोचक बात यह है कि वे महज एक घरेलू नौकर थे और पछगछिया रियासत में बरतन मांजा करते थे. कहते हैं, पंचगछिया रियासत के मालिक रायबहादुर लक्ष्मीनारायण…

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पद्मावती भी तो सूर्पनखा के ही देश की थी

एक रानी सूए से पूछती है. देस-देस फिरौ हो सुअटा। मोरे रूप और कहु कोई।। (ऐ सुअटा तुम तो देश-देश घूमते फिरते रहे हो. बताओ तो मेरे जैसी रूपवाली कोई नजर आयी है?) जवाब में सुआ यानी सुग्गा यानी तोता कहता है- काह बखानौं सिंहल के रानी। तोरे रूप भरै सब पानी।। ( सिंहल की रानी का बखान करना मुश्किल है, उसके आगे तो तुम्हारा रूप पानी भरता है.) पद्मावत का एक पन्ना. यह एक अवधी लोकगाथा का हिस्सा है, जिसका नाम है, ‘पद्मिनी रानी और हीरामन सूआ’. इस लोकगाथा…

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