आज के दिन क्यों तिल, गुड़ और खिचड़ी खाते हैं पूरे देश के लोग #makarsankranti

मकर संक्रांति, लोहड़ी और पोंगल की बात तो सबको मालूम है, आज के ही दिन नेपाल में माघे संक्रांति और बांग्लादेश में सकरेन मनाये जाने का भी जिक्र हो रहा है. मगर क्या आप जानते हैं कि एमपी, छत्तीसगढ़ और गुजरात के आदिवासी भी इस दिन को अलग तरह से मनाते हैं और पूरे दक्षिणी एशिया में सूर्य के मकर राशि से वापसी के पर्व को एक चीज जोड़ती है वह है इस दिन का खास खान-पान. गुड़, तिल और खिचड़ी का भोजन. आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान पर शोध करने…

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रसगुल्ला और सिंघाड़ा- लेखक सच्चिदानंद सिंह की स्वाद यात्रा

नये साल की शुरुआत हम स्वाद यात्रा से कर रहे हैं. वैसे तो समोसा और रसगुल्ला दोनों में से किसी का संबंध बिहार से नहीं है. मगर बिहारियों को दोनों बहुत पसंद आता है. वह समोसा को सिंघाड़ा बनाकर खाता है और रसगुल्ला को दशमलव प्रणाली से, यानी एक बार में कम से कम दस. इस सिंघाड़ा और रसगुल्ला की स्वाद यात्रा कथाकार सच्चिदानंद सिंह ने लिखी है. वे अपने बचपन में भागलपुर के उस बहंगी वाले से इस यात्रा की शुरुआत करते हैं, जो घूम-घूमकर समोसा-रसगुल्ला बेचता था. फिर…

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इस मौसम में मिस मत कीजिये बथुआ का झोर

झोर देसी शब्द है, अगर समझ नहीं आये तो इसे सूप कह सकते हैं. ठंड के मौसम में गरमागरम बथुआ का झोर मिल जाये तो समझिये स्वर्ग में ही हैं.

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वे क्या करें, जिनकी थाली दिखाने लायक नहीं है?

इन दिनों सोशल मीडिया में खाने की थाली की तसवीरें पेश करने का चलन बढ़ा है. मैं खुद उस चलन का हिस्सा रहा हूं. कई लोग भोजन की थाली या भोजन सामग्री की तसवीरें इस वजह से पोस्ट करते हैं, क्योंकि इसके पीछे उनकी एक सोच है. जैसे विनीत जी की रेसिपीज महज रेसिपीज नहीं है, इसके पीछे बैचलर किचेन का आइडिया है. एक अकेला पुरुष भी कैसे किचन में रचनाएं कर सकता है, यह विचार वे आगे बढ़ाते हैं. निराला जी और मैं जब पोस्ट करते हैं, तो हम…

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पूस का महीना है, बगिया खाये कि नहीं

उपमा कुमारी ठंड के मौसम में नये चावल के पकवान खाने का चलन पूरे पूर्वी भारत में है. हमारे यहां लोग पूस महीने में बगिया जरूर खाते हैं. दूसरे इलाकों में इस तरह के पकवान को अमूमन पिट्ठा कह कर पुकारा जाता है. बनाने की विधि में भी ज्यादा फर्क नहीं होता है, हां स्टफिंग यानी अंदर भरने की चीज अलग-अलग हो सकती है. हमारे तरफ इसमें तीसी, गुड़, खोआ भर कर मीठा बगिया तैयार किया जाता है और चना या मूंग दाल भर कर नकमीन बगिया. हमलोग पूस में…

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बंगाल को रसगुल्ला, बिहार को क्या?

हाल ही में पश्चिम बंगाल राज्य ने रसगुल्ला पर जीआई टैग हासिल किया है. इससे यह साबित हो गया है कि रसगुल्ला बंगाल की ही मिठाई है. अब कोई व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अपने लोकेशन के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकता. डब्लूटीओ का सदस्य होने के कारण भारत ने ज्योग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स एक्ट को अपने देश में लागू किया है. 2003 में लागू हुए इस कानून के तहत पहला जीआई टैग बंगाल ने दार्जिलिंग टी के नाम से लिया. तब से अब तक 308 सामग्रियों को जीआई टैग…

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रीत बनकर ‘रीत’ रहा है, नये अन्न के स्वागत का यह उत्सव

पुष्यमित्र आज लबान हैं. हमारे तरह इसे लबान ही कहते हैं मगर इसका असली नाम नवान्न है. बंगाल में इसे नबान्न कहते हैं. यह नये धान के स्वागत का त्योहार है. किसानों के लिहाज से यह पूर्वी भारत का सबसे बड़ा त्योहार है. क्योंकि इस इलाके में लगभग सभी किसान खरीफ में धान की खेती करते हैं. जब धान की पहली बाली कट कर घर आती है तो इससे निकले दाने का चूड़ा(चिवड़ा या पोहा) बना पहले पुरखों को समर्पित किया जाता है, फिर दही के साथ इसे सभी लोग…

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‘काश! हम फोड़ियों के जीवन में भी होता मखान जैसा उजाला’

पौष्टिकता से भरपूर आर्गेनिक वेफर्स मखान. आप अगर पटना में इसे खरीदेंगे तो कहीं भी चार सौ रुपये किलो की दर से कम में नहीं मिलेगा. दिल्ली-मुम्बई तक जाते-जाते तो इसकी कीमत छह-सात सौ रुपये हो जाती है. मिडिल ईस्ट में इसकी बहुत अधिक मांग रहती है. इस मखाने की फसल ने कोसी-सीमांचल के उन किसानों का खूब भला किया है, जिनके खेत साल में आठ महीने पानी में डूबे रहते थे. अब उन खेतों में मखाने की फसल उगने लगी है. इस वजह से मखाने के बीज को फोड़…

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जब एक चाय वाले से डर गयी आरा की पुलिस

यह बड़ी दिलचस्प है. जहां एक चाय वाले को लोगों ने देश का पीएम बना दिया है, वहीं एक दूसरे चाय वाले को अपने ही शहर से अपनी चाय की दुकान को समेटना पड़ा. क्योंकि जिले की पुलिस का कहना था कि आपकी चाय की दुकान की वजह से शहर की कानून व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो जाता है. साल 2014 में जब कथित चाय वाले मोदी देश के पीएम बने, उसी साल से आरा शहर के इस चाय वाले की दुकान पुलिस प्रशासन ने बंद करानी शुरू कर दी.…

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आपने सुना है लिट्टी-चोखा मेला का नाम

चरित्रवन में खुले में लिट्टी पकाती महिलाएं कल ही बक्सर का लिट्टी-चोखा मेला बीत गया. कई दिनों से योजना बना कर बैठा था, छुट्टी थी, फिर भी नहीं जा पाया. अब पता नहीं कब मौका मिले. अद्भुत है पंच कोसी मेले के आखिरी दिन बक्सर शहर में लगने वाला लिट्टी-चोखा का मेला. लोग बताते हैं कि उस रोज पूरे शहर में धुआं ही धुआं उठता रहता है. पंच कोसी यात्रा करने वाले तो जगह-जगह गोइखा सुलगाकर लिट्टी पकाते ही हैं, पूरे बक्सर शहर में हर घर में इसी तरह लिट्टी…

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