हमारा कैंपेन-मैथिली-भोजपुरी की किताबें छपे, पुस्तकालयों को किताब खरीदने के लिए पैसे मिले

बिहार कवरेज

क्या आप जानते हैं कि बिहार में मैथिली-भोजपुरी-मगही-अंगिका आदि स्थानीय भाषाओं की अकादमियों के पास कई सालों से किताबें छापने, छपी किताबों को फिर से छापने, कार्यक्रम आयोजित करने, पुरस्कार देने आदि के लिए सरकारी फंड नहीं जारी हो रहा है. जो किताबें छप गयी हैं, उनकी स्थिति दयनीय है. वे एक सरकारी क्वार्टर में जैसे-तैसे रखी हैं.

मैथिली की किताबें एक मकानमालिक ने कब्जा ली हैं, क्योंकि उसे किराया नहीं मिला. जो किताबें बची हैं, वे मैथिली अकादमी में बरामदा, बाथरूम औऱ शौचालय तक में भरी हुई रखी हैं. अंगिका अकादमी बन तो गयी है, मगर उसे दफ्तर नहीं मिला है. अध्यक्ष महोदय दो साल से बिना दफ्तर के यहां-वहां भटकते हैं. दूसरी अकादमियों का भी यही हाल है.

उसी तरह राज्य में पिछले 60 सालों में 497 पब्लिक लाइब्रेरी बंद हो गयी. जो 38 पुस्तकालय बचे हैं, उन्हें चार साल से किताबें खरीदने का पैसा नहीं दिया जा रहा.

एक ऐसे राज्य में जहां साल में दो बार पुस्तकमेला लगता हो, दो बार प्रकाशपर्व आयोजित होता हो, मानव श्रृखंला के नाम पर करोड़ों फूंके जाते हों, अरबों का म्यूजियम बनाया जाता हो, क्या भाषाओं को जिंदा रखने औऱ किताबें खरीदने के लिए 50-100 करोड़ खर्च नहीं किये जा सकते.

यह एक नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम सरकार को यह सुझाव दें कि पैसा इन कामों में भी खर्च हो.

तो अभी राज्य के वित्त मंत्रालय ने सुझाव मांगा है कि लोग बजट से पहले बतायें, पैसा कहां खर्च किया जाये. ऐसे में बिहार कवरेज का अनुरोध है कि आप इस लिंक पर जाकर सरकार को सुझाव दें कि कुछ पैसा भाषाओं और किताबों पर भी खर्च हो. लिंक यह है…

http://finance.bih.nic.in/

 

 

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