बजट 2018- प्राइवेट अस्पतालों का खुराक साबित होगी स्वास्थ्य बीमा योजना

बिहार कवरेज

इस बजट में हेल्थ सेक्टर को लेकर बड़ी घोषणाएं हुई हैं. पहली घोषणा है ओबामा केयर के तर्ज पर मोदी केयर जैसी स्वास्थ्य बीमा को लागू करने की. इसके तहत 10 करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपये की स्वास्थ्य बीमा का लाभ देना है. अमेरिका में ओबामा केयर काफी हिट रहा था. इस योजना के बाद ओबामा की वापसी भी हुई थी. संभवतः उसी को भारत में लागू कराकर मोदी सरकार राजनीतिक लाभ लेना चाहती है.

मगर सवाल यह है कि क्या भारत का हेल्थ सेक्टर हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम को ठीक से लागू कराने की स्थिति में है. हमने हाल ही में देखा है कि 18 लाख की बीमा राशि के बावजूद एक व्यक्ति अपनी बच्ची को डेंगू से नहीं बचा सका. बिहार में बीमा राशि को हड़पने के लिए पिछले सालों में किस तरह का बच्चादानी ऑपरेशन घोटाला हुआ है, यह हम सब जानते हैं.

दरअसल भारत में अभी सरकारी अस्पतालों को सक्षम बनाने और मशरूम की तरह जगह-जगह उग आये निजी अस्पतालों को नियम में बांधने का है. हेल्थ सेक्टर को पहले इस पर ध्यान देना चाहिए था. प्रखंड और जिला स्तर की अस्पतालों में प्रसव से लेकर छोटी-मोटी बीमारियों की ठीक से इलाज की व्यवस्था हो. जटिल रोगों के लिए प्रमंडल स्तर पर एम्स जैसा अस्पताल हो, यह जरूरी है.

निजी अस्पतालों में लाशों को रोक कर इलाज कराने की जो प्रथा चल रही है, उस पर लगाम लगाने की जरूरत है. बीमा राशि निजी अस्पतालों का खुराक है. जैसे ही उन्हें पता चलता है कि आप बीमित हैं, उनका मीटर तेज हो जाता है. पांच लाख की बीमा वाले गरीब जैसे अपोलो या मैक्स जैसे अस्पताल पहुंचेंगे उन्हें एक झटके में लूट लिया जायेगा. इसे रोकने की क्या व्यवस्था है.

हालांकि इस बजट में एक अच्छी बात यह है कि 24 नये मेडिकल कॉलेज खोलने की बात की गयी है और इस नीति पर बात की गयी है कि हर तीन संसदीय क्षेत्र के बीच एक मेडिकल कॉलेज हो. यह सही फैसला है. मगर जो सरकारी अस्पतालों का जाल देश में प्रखंड से लेकर राजधानी तक फैला है, वह कैसे कारगर हो इस पर कौन सोचेगा? और जब तक वह व्यवस्था कारगर नहीं होगी, बीमा से कोई लाभ नहीं होगा.

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