बिहार का भागलपुर और झारखंड का पलामू अंचल गूंजता है ब्रह्मभोज की कहानियों में

डॉ शोभना जोशी

संग्रह में कुल सत्रह कहानियाँ हैं. ये कहानियां भिन्न-भिन्न काल की हैं, जो इकट्ठा होकर समकालीन विसंगतियों का शाब्दिक कोलाज रचती हैं. ‘‘मेट’’,‘‘चाइभी’’, ‘‘पुरुष’’  कहानी को छोड़ अन्य कहानियों के सूत्र और भाषिक संरचना पर बिहार क्षेत्र का प्रभाव है, पर ‘‘पकड़वा’’ पूरी तरह बिहार की कथा है. बाकी सभी कहानियाँ हिन्दुस्तान में कहीं भी घटित हो सकती हैं, घट भी रही हैं और लगता है घटती रहेंगी भी. ये कहानियाँ स्मृतियां है, अनुभव हैं, सामाजिक यथार्थ हैं पर बगैर-शोर मचाये समाज के प्रति प्रतिबद्ध हैं.

लेखक सच्चिदानंद सिंह

ये बस कहानियां हैं; वादी-विवादी नहीं. सीधा संवाद करती हैं, कोई घुमाव-पेंच नहीं है. विमर्श के किसी पाले में खड़ी न होकर, बस सहज बताती हुईं- ऐसा हुआ, होना चाहिए या नहीं? ये बहस नहीं कर रही हैं, न यथार्थ के नाम पर कुत्सा परोस रही हैं, जबकि ऐसे अवसर कहानियों में भरपूर हैं, किंतु इसके मानी ये कतई नहीं कि ये शुद्धतावादी हैं.

कहानियों में विभिन्नता है, कथ्य के स्तर पर, एक ही गूँज नहीं है. सबसे बढ़कर ये विमर्श की दावेदारी का शोर नहीं मचा रहीं पर इनमें स्त्री, दलित, सामाजिक बर्बरताओं का विमर्श है.

अपनी सादा कहन शैली के साथ इनका भावबोध आधुनिक हैं. ये हाथ उठाकर नारेबाजी नहीं कर रहीं, पर ये सच और न्याय के साथ मनुष्यता की पक्षधर हैं. आधुनिक परिवर्तनों की पहचान इनमें है तो वहीं सामाजिक विसंगतियों का यथार्थ भी. इनका कोई विशेष रूप विन्यास नहीं यही इनका विशेष रूपविन्यास है. पाठक के रूप में मेरा यह मानना है कि भावबोध और संप्रेष्य के धरातल पर इन्हें प्रेमचंद की परंपरा में देखा जा सकता है. इनमें सपाट के भीतर खुदबुद है, जो संवेदना को जागृत तब करेगी जब पाठक में शौक से आगे बढ़कर संवेदना को ग्रहण करने की क्षमता होगी.

यह सही है कि रचना बेहतर तब होती है जब रचनाकार अपने भाव-अनुभवों से तटस्थ हो जाता है. पर इन कहानियों को पढ़ते हुए लगता है, रचनाकार निर्ममता से तटस्थ होकर रच रहा है. संवेदना का तारल्य, कथ्य के साथ बह नहीं रहा, गंभीर ठहराव के साथ मानो सावधानीपूर्वक कहानी कही जा रही हो. इस कारण सहज प्रभाव कमज़ोर हुआ है.

बहरहाल इन कहानियों से मुख़ातिब होने के लिए कहानी आंदोलनों-आलोचनाओं से गंभीर परिचय की आवश्यकता नहीं. ये आम पाठक को सम्प्रेषित होती हुई, सामाजिक विधा होने का गुरूतर दायित्व पूरा करती हैं; कथ्य वैविध्य और रचनाकार की सामाजिक चेतना संपन्न, सहभागिता के साथ.

लेखक का गंभीर रुचिपूर्ण निरीक्षण समाज की हर हलचल में है. ये कहानियाँ उन निरीक्षणों, अनुभवों, जानकारियों की है. इन्हें इस तरह कहा गया है मानो कोई बड़ा बैठकर बीती और देखी सचाईयों को कहानी की तरह सुना रहा है. इनका जन्म लेखक की अपने घर-गाँव-अंचल से मुहब्बत से हुआ है. इस मुहब्बत को अभिव्यक्त करने के लिए लिखा गया है. लेखक ने अपनी रचनात्मक क्षमता के साथ, रचने के आनंद के लिए इन्हें लिखा है और समाज से सरोकार इस आनंद के साथ सहज ही गुंथ गए हैं. बसाहट का इतिहास इनमें है. इनमें तुर्शी नहीं है, व्यंग्य भी बड़े सौम्य से हैं. दुखी, वंचित चरित्र भी उबल नहीं पड़ते हैं. एक रामनौमी का दूला साव और दंगा के अप्रत्यक्ष फ़सादी को छोड़ दें तो कहानियों में कहीं क्रोध, आवेष, उन्माद, हिंसा, प्रतिषोध, घृणा, सेक्स, अति उत्साह, आवेग का कोई दृश्य, घटना चरित्र नहीं है.

जाति-व्यवस्था का क्रूर, अमानवीय चेहरा है. पर उस चेहरे की विकृत रेखाओं का अंकन नहीं है. अवसर होने पर भी कहीं अपभाषा, हत्या, सेक्स के बारीक चित्र नहीं है. रचनाकार ‘मर्यादावादी’ है. पूरे संग्रह में बस एक वाक्य है ‘‘हिंदू हो या मुसलमान सब साले एक समान हैं’’ यह ‘‘साले’’ शब्द इस संग्रह का इकलौता अपशब्द है. कहानियों को पढ़ते हुए यह तो नहीं लगता है कि यह अनुशासन सायास है पर रचनाकार की मर्यादित मानस संरचना का ही परिणाम इन कहानियों का रूप विन्यास और चरित्र है. हालांकि कहानीकार की दृष्टि में विस्तार है. अपने परिवेश से उसका सघन परिचय है पर कल्पना का अभाव है. वहीं शायद मार्कैट में बिकने का भाव भी न रहा हो. कहानीकार प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से हर कहानी में उपस्थित है. स्वतंत्र रूप विन्यास नहीं है. लेखक की स्थानीय लोक और इतिहास में गहरी रुचि है जो लगभग सभी कहानियों में दिखाई पड़ती है.

इन्हें पढ़कर लगा कि ये जिस अंचल की है वहाँ का सामाजिक दस्तावेजीकरण कर रही है. बसाहट, बसने की प्रक्रिया, जंगल, जमीन, जाति, विश्वास, अंधविश्वास, भौगोलिक स्थिति, स्थानीय पुरातत्व, विकास सब है. ये कहानियाँ बहुत ही साफ सुथरी हैं, लिपे-पुते आंगन में मांडनों की तरह जहाँ रसोई के भीतर झाँकने पर, मंजे हुए चमचमाते हुए कटोरदान को खोलने पर रोटी का अभाव दिखता है. गड़बड़ियों-विसंगतियों को घेरे में रखकर छोड़ दिया गया है. पर सबकुछ अच्छा-अच्छा वाले साहित्य की श्रेणी में भी नहीं है. कहानीकार समाज की एक-एक विसंगति को पहचानकर रेखांकित कर रहा है.

पर ऐसा लगता है कहानीकार जल्द से जल्द अपने अनुभव, अनुभूतियों, स्मृतियों को रचना रूप में बांधने के प्रयास में है क्योंकि एक-एक अनुच्छेद में महत्वपूर्ण बात कहकर समाप्त कर दी गई जो कि एक कहानी का बीजबिंदु हो सकती थी. केन्द्रीय कहानी के आसपास बुनी कुछ कहानियाँ उसे बहुत उभारती नहीं लगती. लोककथाएं भी प्रसंगवश आई हैं.

कहानीकार ने एक-एक कहानी में एकाधिक मुद्दे उठा लिए जिन्हें वह छू भर पाया है. एक मुद्दे या घटना को यदि विस्तार से कहा जाता तो संभवतः कहानीपन अधिक सघन होता जैसे ‘‘ब्रह्मभोज’’ में मिश्राजी की नौकरी और उनके दादा की मृत्यु ‘‘जिलेबी’’, में प्रहलाद की पढ़ाई-विवाह और नौकरी का सर्वे मूल्यांकन. अलग-अलग रचना का विषय हो सकते थे. अन्यत्र भी कहीं-कहीं ऐसा है. कहानीकार पूर्णकालिक साहित्यकार नहीं है अतः गठन में बहुत बारीकी नहीं है कहीं-कहीं पर कहन में सच्चाई है. इन कहानियों को पूर्णकालिक लेखक की अथवा तथाकथित उत्तर आधुनिक कलाबाज कहानियों से तौला जाएगा तो ये अतिसाधारण ठहरा दी सकती है. पर इन्हें अंचल के रचनात्मक इतिहास की तरह देखा जाएगा तो ये अपने संप्रेष्य के साथ सफल कहानियाँ है. जिनमें बारीक कलात्मकता नहीं है पर अनुभूति और अभिव्यक्ति की ईमानदारी है.

ये कहानियाँ शार्ट फिल्म स्क्रिप्ट के लिए बेहतरीन है और यदि प्रयासपूर्वक इन्हें अंतःसूत्रबद्ध किया जाए तो ये अंचल पर एक संपूर्ण कलात्मक फिल्म का आधार हो सकती है. कहानीकार भी पुनर्पाठ कर इन्हें अंतसूत्रबद्ध करें तो एक उपन्यास रचा जा सकता है तो वहीं इनमें से छोटे-छोटे अनुच्छेदों को अलग कर और कहानियों की पुनर्रचना की जा सकती है.

 

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